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रोचक निबंध - कुम्भ - डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

आजकल इलाहाबाद में कुम्भ मेला लगा हुआ है। दूर-दूर से लोग यहाँ संगम पर कुम्भ स्नान के लिए पधारते हैं और स्नान करके धन्य हो जाते हैं। मान्यता की बात है। संगम पर स्नान तो यहाँ हर दिन होता ही रहता है, लेकिन कुम्भ पर स्नान पर्व-स्नान है। कहते है कि यह कुम्भ-पर्व हर साल नहीं होता। हर बारहवें वर्ष पर पड़ता है। लेकिन इस बार राजनीति के चलते इसने बारह वर्ष का इन्तजार नहीं किया।

कुम्भ उत्सव पर स्नान करने का महत्त्व ही अलग है। जहां तक नहाने का मामला है। जाड़े के दिनों में स्नान के लिए लोग कम ही जागते हैं। “नहाना” शब्द ही ऐसा है। इसके दोनों और नकारात्मक “न” लगा है। लेकिन मामला अगर कुम्भ-स्नान का हो तो लोग मौक़ा नहीं गवांते और नहा-धो कर सस्ते में पुण्य कमा लेते हैं।

उस रोज़ एक छोटा बच्चा एक बड़ा मार्मिक प्रश्न पूंछ रहा था। लोग कुम्भ नहाने अपने घर से इतनी दूर संगम क्यों जाते हैं ? कुम्भ-स्नान तो घरपर ही बड़ी आसानी से अपने गुसलखाने में ही किया जा सकता है। धीरे धीरे, मग्गे या लोटे से नहाने के बजाय इकट्ठा एक घड़ा-भर पानी अपने सर पर डाल लें। लो, हो गया कुम्भ स्नान ! कुम्भ का अर्थ आखिर घड़े से ही तो है !

कुम्भ है तो कुम्भकार भी हैं जो घड़े बनाते हैं। मिट्टी के घड़े, जिन्हें हम गर्मियों में पानी ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल करते हैं, कुम्हार ही बनाते हैं। मुख सुख के चलते कुम्भकार ही कुम्हार हो गया है। कवियों ने तो ईश्वर तक को कुम्भकार की उपमा दी हुई है। उसने भी तो किसी न किसी मिट्टी से इस सारी दुनिया को बनाया है।

कुम्भ तो कुम्भ ठहरा। घडा ही तो है बेचारा। छोटा घडा कुम्भी कहलाता है। कुम्भ या कुम्भी में कुछ भी रख दो। पानी रखो, धान रखो, अचार रखो। कुछ भी रखो। कैसे भी रख दो। लोग गुजले-गुजले कपडे पहन कर जब घूमते हैं तो अक्सर कहा जाता है, क्या घड़े में से कपडे निकाल कर पहन लिए हैं ? न लोहा न इस्तरी ! कुम्भ को कभी कभी मदिरा पात्र भी बना दिया जाता है। तब इसे मधु-कुम्भ कहते हैं। बच्चन जी ने इसका ज़िक्र अपनी मधुशाला में किया है।

कुम्भ नाम का एक राक्षस भी हुआ था। उसका पूरा नाम था कुम्भकरण। रावण का भाई था। रावण जितना ही तेज़-तर्राक़, कुम्भकरण उतना ही सुस्त। नींद लग जाती थी तो बस जागने का नाम ही नहीं लेता था। वह अपनी नींद से ही मशहूर हो गया। ज्यादह सोने वाले और देर तक सोने वाले हर शख्स को, तंज कसते हुए, कुम्भकरण कहा जाने लगा।

नींद की वजह से नहीं, फिर भी न चाहते हुए भी कुम्भ मेरे साथ भी जुड़ गया है। पर थोड़ी सी उलझन भी है। पंडितों की राय ठीक से बन नहीं पा रही है। कोई मुझे तुला राशि का बताता है तो कोई मीन राशि का। लेकिन जो नाम से राशि तय करते हैं वे कुम्भ राशि को ही मेरी राशि घोषित करते हैं। उनके अनुसार ‘सु’ से आरम्भ होने वाले नाम कुम्भ राशि के ही होते हैं। वैसे मेरी राशि को लेकर अगर कुछ भ्रान्ति है भी तो इससे मुझे कोई लेना-देना नहीं है। यह परेशानी पंडितों की ही है।

एक बहुत बड़े आचार्य, द्रोणाचार्य, हुआ करते थे। पता नहीं उनकी पैदाइश किसी घड़े में हुई थी, या कोई और वजह थी, उनका एक नाम ‘कुम्भज’ भी था। कुम्भज नाम से द्रोणाचार्य इतने मशहूर हो गए कि कई लोग अपने बच्चों का नाम ‘कुम्भज’ रखने लगे। द्रोणाचार्य नाम तो शायद ही अपने बच्चे का किसी ने रखा हो !

कुम्भ राशि है। कुम्भ पर्व है। कुम्भ मेला है। कुम्भ स्नान है। कुम्भ सिर्फ घड़े का पर्याय ही नहीं है।

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--डा. सुरेन्द्र वर्मा –

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद (उ. प्र.) -२११००१

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  1. कुम्भ के बारे में आपने रोचक जानकारी देने के लिए धन्यवाद. आलेख रोचक बना है...

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