370010869858007
नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

****

Loading...

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 324 // तौल // मीनाक्षी दुबे


प्रविष्टि क्रमांक - 324

मीनाक्षी दुबे


तौल
"अटाले- वाला, अटाले- वाला' कबाड़ी की आवाज सुनकर मैं बाहर बरामदे में आ गई। दीपावली पर एक डेढ़ साल बाद कस्बे के इस पुराने  मकान पर आ पाई थी सफाई करवा रही थी , सोचा पुरानी  पड़ी अखबार की रद्दी और यहां वहाँ पड़ा छोटा मोटा कबाड़ इस अटाले वाले को दे ही डालूँ। मैंने इशारे से अटाले वाले को रोका,और कंधों से गली,पैबंद लगी कमीज पहने उस कबाड़ी से कबाड़े की चीजों का भाव पूछा,तो वह रटे हुए अन्दाज़ में बोला- 'लोहा और प्लास्टिक तीस रुपया किलो लेते है,काँच तीन रुपया किलो और रद्दी के दो भाव है, कॉपी किताब की रद्दी  का अलग भाव है और अखबार की रद्दी का अलग। बाकी चीजों के भाव ठीक बताने की वजह से मैंने  सबसे पहले लोहे और प्लास्टिक के अटाले को उठा के उसे अलग-अलग तुलवा दिया फिर सॉस व शरबत की  कांच की बोतलों  को तुलवाया ।  कबाड़ी ने दो सेकेण्ड में वजन के हिसाब से इन सबका हिसाब जोड़ लिया और मुझे इनके दाम चुका दिए  ।

    अब केवल अखबारी रद्दी का बड़ा गट्ठा बचा था । उसकी टटोलती निगाहें उस गट्ठे पर थीं ।
     'अखबार की रद्दी क्या भाव चल रहा है?' सहसा मैंने पूछा।
     'बहनजी,नौ रुपये किलो चल रहा, लेकिन ये तो दो साल पुराने अखबार है।' उसका उत्तर था।
     'अरे नहीं ,पंद्रह चल रहा है, कम से कम दस रुपये तो लगाओ' मेरा स्वर तनिक आवेश में अनायास ही ऊँचा उठ गया था।

     ' ठीक है बहन जी, दस रूपये किलो लगा लूँगा'। यह कह कर वह गट्ठे को ध्यान से देखने लगा। यकायक उसने अपनी जेब से ढाई सौ रूपये  निकाले और कहने लगा 'लो बहन जी रद्दी के पैसे, मेरा अन्दाज़ है कि पच्चीस किलो होगी।
   'यह क्या? बिना तौले ही'। मैं थोड़ा झल्लाहट में थी।
       'हमारे तो,हाथ और  निगाहों में तौल होता है, यह पूरी पच्चीस किलो  ही होगी। पैसे सम्हालो हमें कहीं जाना है।' वह बोला।

      'तो क्या बेईमानी करोगे? मुझे कैसे पता चलेगा कि तुम्हारा तौल सही है या नहीं'। मैं बोल पड़ी।
    आज तक अपने साथ हुए घर, परिवार, समाज के सारे ठगी के किस्से यकायक मुझ पर हावी हो गए थे और मैं बिना तौले इस रद्दी बेचने के लिये बिल्कुल भी तैयार नहीं थी  । मुट्ठी बाँधे खड़ी थी उसके सामने । टस से मस भी  नहीं हो रही थी।

       'देखो बहन जी,मान जाओ ।आज मैं पाँच किलो का बांट घर पर ही भूल आया हूँ, केवल एक  किलो का बाँट ही साथ ला पाया हूँ। इस तरह तौलने में बहुत समय लगेगा' उसने अपनी बेचारगी व्यक्त की।
         ' तो एक  किलो के बांट  से दो  किलो बना लो,और तौल दो। मैं बिना तौले तुम्हें रद्दी नहीं देने वाली किसी और को दे दूंगी' मैं अपनी बात पर अड़ी थी सो उसे टका सा जवाब दे दिया।
      मुंह पर ढेर सारी उदासी लादे वह चुपचाप बैठ कर एक तरफ एक  किलो रद्दी के साथ एक  किलो का बांट रखकर तौलने लगा। इस तरह उसे अधिक समय लग रहा था। समय काटने  मैं पड़ोसन से बतियाने लगी।
'देखो, बेटी ने ये पैंटालून का कुर्ता भेजा है मेरे लिए।' मैंने अपने पहने हुए कुर्ते की ओर इशारा किया।

       'कितने का' उसने पूछा।

ऑनलाइन अठारह सौ में मिला'। मैंने कुछ गर्वानुभूति से कहा
   '  किसी भी दुकान पर हजार में ही मिल जाता, अठारह  सौ ज्यादा दे दिए बेटी ने।' पड़ोसिन की बात सुनी तो मैंने लापरवाही से कहा- ' कुर्ते जैसी छोटी चीज के लिए क्या भाव ताव देखना '

       बातचीत करते हुए मेरी सतर्क निगाहें रद्दी के तौल पर थीं जो बीस किलो तौली   जा चुकी थी। मैं, मन ही मन सोच रही थी कि, बची हुई रद्दी पांच किलो से अधिक निकलेगी, रद्दी वाला झूठा साबित होगा... लेकिन यह क्या ....सारी रद्दी साढ़े तेईस किलो  पर ही  खत्म हो गई।

मुझे लगा इसी की बात मान लेती, हो गया डेढ़ किलो रद्दी के पंद्रह रुपयों का नुकसान।  खुद कबाड़ी  अंदाजे से पच्चीस   किलो बता रहा था। मैंने लापरवाह हो के उड़ती सी निगाहें, उस कबाड़ी पर डाली, विचार आया ...ऊँह एकाध बार तौल सही बैठ भी गया तो क्या... ये लोग तो  आंखों के सामने तौलते हुए  भी, वैसे भी बेईमानी कर गुजरते  हैं।

         कबाड़ी ने उठ के मेरे हाथ में पूरी पच्चीस किलो रद्दी के ढाई सौ रुपये पकड़ाये,और बिना कुछ बोले, बिना मेरी ओर  देखे, सारा अटाला अपनी साइकिल पर लाद अपने रास्ते  चला गया.....

  मैं कुछ हैरान होकर कभी हाथ में पकड़ाये उन रुपयों को देखती... कभी जाते हुए कबाड़ी को... तो कभी अपने  पहिने हुये अठारह सौ के पैण्टालून के कुर्ते को....।

                                            मीनाक्षी दुबे
                               41 ,अग्रसेन नगर
                              सिव्हिल लाइन्स एरिया
                              देवास DEWAS (455001)
लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 6103072969212337417

एक टिप्पणी भेजें

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव