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महेश राजा की 2 लघुकथाएँ

जंजीर वाला कुत्ता

पहले कुत्ते ने दूसरे कुते की तरफ देख कर कहा,-"यार,इस तरह दूसरों की जंजीर मे बंध कर अपना जीवन क्योँ बरबाद कर रहे हो?मेरी तरह आजाद रहो...कब तक अपनी वफादारी दूसरों के टुकड़ों पर बेचते रहोगे?"
दूसरा कुत्ता बैला-"पार्टनर, मैं तो अपने मालिक को छोड़ना चाह रहा हूं, पर मालिक ही मुझे नहीं छोड़ता। कल कह रहा था,अब तुम ट्रैंड हो गये हो...याद है न तुम्हें, मैंने जिन लोगों की लिस्ट तुम्हें दी है,उन पर तुम्हें मुझसे पूछे बिना ही भौंकना है।"
पहला कुता फिर बोला,"यानि कि तुम आदमी के इशारों पर जी रहे हो?भौंकना तो हमारा जातीय संस्कार है बास....लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि आदमी हमेँ सिखाये कि हमें किस पर भौंकना है।"
दूसरा कुत्ता संयत स्वर में बोला,"सही कहते हो भाई....जंजीर की विवशता वही समझ सकता है,जिसके गले में जंजीर होती है। अपने मालिक की रोटी पर पलने पर भी मैं तुम पर भौंक नहीं रहा हूं, यही क्या कम है।"

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पोस्टर

सरकार भंग होते ही दुकानदार ने अपनी दुकान पर लगे पार्टी के पोस्टर निकाल दिये।
मैंने कहा,-"आप तो इस पार्टी के समर्थक रहे है...फिर...आपने पोस्टर क्योँ निकाल दिये?"
वह बोले,-'आजादी के बाद हम पोस्टर बदल बदल कर ही तो अपनी दुकान चला रहे है।

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*महेश राजा*वसंत 51,कालेज रोड।महासमुंद।छत्तीसगढ़।।

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