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व्यंग्य आलेख - नहला दिया (कुम्भ स्नान) - डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

जहां तक नहाने का सम्बन्ध है जाड़ों के दिनों में दो तरह के अतिवादी लोग होते हैं। एक तो वे जो सर्दियों में अदबदाकर नहाना अपना परम कर्तव्य मानते हैं। उन्हें स्नान करने से कोई रोक नहीं सकता। गुसलखाने में कपड़े उतार कर ठंडा पानी अपने बदन पर डालते हैं और हु हू करके बेसुरा गाना शुरू कर देते हैं। दूसरी तरह के वे लोग होते हैं जो इन दिनों नहाना तो कतई नहीं चाहते। पर जब चार-छ: रोज़ बिना नहाए हो जाते हैं तो उनके घर वाले या साथी संगी उन्हें कचोटते हैं कि बहुत हो गया, चलो अब आज तो नहा ही डालो। लेकिन इधर कुम्भ क्या आया है सभी का मन स्नानवादी हो गया है। जिसे देखो संगम के किनारे नहाने की मुद्रा में डुबकी लगाने के लिए उद्यत खड़ा है। हर कोई सोचने लगा है कि उसके मैल (पढ़ें,पाप) का घडा भर गया है और समय आ गया है कि अब वह नहा ही डाले। क्या संत क्या असंत, क्या साधु क्या महात्मा, क्या सामान्य जन क्या विशिष्ट, क्या मंत्री, क्या संतरी, सभी स्नानातुर हैं। वे जो कभी सीधे मुंह बात नहीं करते थे वे भी साथ साथ प्रेम से नहा रहे हैं, और 'देखो, तुम्हें भी नहला दिया' की मुद्रा में एक दूसरे को देख रहे हैं।

कुम्भ ने अच्छे अच्छे को नहला दिया है। जो सोचते थे की उन्होंने कोई पाप किया ही नहीं है और उन्हें धोने-धाने की ज़रूरत ही नहीं है, वे भी अपने अनजाने पाप-कर्मों के प्रति जागरूक हो गए हैं, और खूब मल मल कर, रगड़ रगड़ कर, नहा रहे हैं। आस्था की बात है। उन्हें पूरी तरह विश्वास दिला दिया गया है कि एक हज़ार अश्वमेघ यज्ञ, सौ वाजपेय यज्ञ और एक लाख पृथ्वी की परिक्रमा करने से जो पुण्य फल प्राप्त होता है वह एक बार कुम्भ स्नान से मिल सकता है। अब आप ही बताइए कि जब इतनी आसानी से, और इतना सारा पुण्य प्राप्त किया जा सकता है तो भला वो मूर्खानंद कौन होगा जो इसका फ़ायदा न उठाए और अनगिनत यज्ञ और पृथ्वी-परिक्रमा इत्यादि, करता फिरे। अत:आज हर अक्लमंद तथा मंद-अक्ल इंसान, कुम्भ के दौरान स्नान करने को अपने पूरे मनोयोग से तत्पर है। घाट आबाद हो गए हैं और और लोग डुबकियां लगा रहे हैं।

देखते देखते लोगों ने अपना इतना पाप धो डाला है कि नदियों के साथ साथ संगम की नाक (संगम-नोज़) तक प्रदूषित ओ गई है। उसे इस ज़ुकाम से बचाने के लिए शासन को सिंचाई विभाग के अभियंताओं को आवश्यक चिकित्सकीय कार्यवाही करने के लिए निर्देश देने पड़े हैं, ताकि श्रृद्धालुओं के ध्यान-स्नान में कोई बाधा न आये और वह यथावत संपन्न होता रहे। लोग अच्छे से डुबकी लगा सकें और केवल गले तक ही नहाकर वे संतोष न करें।

परम्परागत रूप से भारत में सुबह उठ कर हाथ-मुंह धोने के बाद, स्नान एक आवश्यक कर्म माना गया है। परम्परावादी लोग आज भी इस परम्परा से चिपके हुए हैं। लेकिन एक अच्छी बात यह है कि युवा लोगों ने इस तथाकथित आवश्यक कर्म और परम्परा के विरोध में सवाल उठाना शुरू कर दिए हैं। आखिर क्यों नहाया जाए ? और खास तौर पर जाड़े के दिनों में क्यों नहाया जाए ? और जब मन न करे तो क्यों नहाया जाए ? ऐसा भला कौन से मैल ने हम सबको आ जकड़ा है जो स्नान को लाज़मी बना दिया जाए ? “नहान” के आगे –पीछे “न” है, फिर “हां” पर ही इतना जोर क्यों दिया जाए ? सोचने की बात है।

लेकिन इधर कुम्भ क्या आया, सबके सार्थक सोच डगमगा गए हैं। ये लक्षण ठीक नहीं हैं। कुम्भ अपनी जगह है। स्नान अपनी जगह है। दोनों की देश, काल और परिस्थितियाँ अलग अलग हैं। घाल-मेल आवश्यक नहीं है। फिर क्यों ज़बरदस्ती उन्हें साथ साथ रखने की कोशिश की जाती है ? बात समझ से परे है।

एक बात और। क्या ज़रूरी है कि कुम्भ-स्नान गंगाजी में या संगम पर ही किया जाए। आप अपने स्नानागार में भी तो कुम्भ-स्नान कर सकते हैं। बस, लोटे या मग्गे की जगह घड़े से सिर पर पानी उड़ेल लीजिए। लीजिए, हो गया कुम्भ-स्नान ! आखिर कुम्भ का मतलब घड़े से ही तो है ना !

हमारे एक मित्र ने एक बड़ी मजेदार लेकिन बड़ी सार्थक बात कही। बोले, नहाने के लिए कुम्भ का इंतज़ार करना मुझे तो बड़ा अट- पटा लगता है। कुम्भ बारह साल में आता है और अर्ध कुम्भ छ:वर्ष बाद आता है। क्या यह मुमकिन है कि आदमी छ: वर्ष या बारह साल तक बेचारा स्नान के लिए बैठा रहे? यह असंभव है। आपका जब मन कटे नहा लीजिए। कुम्भ की प्रतीक्षा न कीजिए। रोज़ नहाना चाहें रोज़ नहाइए। मन हो तो कभी-कभी नहाइए। कुम्भ का इंतजार करते रहेंगे तो कम से कम छ: वर्ष की प्रतीक्षा करने पड़ेगी आपको। कर सकेंगे? नहीं ना ! सो कुम्भ-वुम्भ का इंतज़ार न कीजिए। जब जी चाहे नहा डालिए। गंगा न तरे, कोई बात नहीं ; पर तर जाएंगे।

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--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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