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प्यार सौगात है – कवि मनीष की कविताएँ

दु:ख आती है तो आने दो,
अन्धियारे आते हैं तो आने दो,
आख़िर कब तक ये आएँगे,
आख़िर कब तक ये सताएँगे,

ख़ामोश बादल ग़र छाते हैं,
तो बूंदे पानीं की भी उसी में भरते हैं,
ये तो चरित्र है ज़िन्दगी का,
इसे यूँहीं चलने दो,

दु:ख आती है तो आने दो,
अन्धियारे आते हैं तो आने दो,

बहारें आती हैं तो,
बिखरते ख़ार भी हैं,
समन्दर में आते हैं भाटा,
तो उठते ज्वार भी हैं,

ये तो चरित्र है प्रकृति का,
इसे यूँही चलने दो,
दु:ख आती है तो आने दो,
अन्धियारे आते हैं तो आने दो


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प्यार वो सौगात है,
जो पैदा करता है जीवन,
प्यार वो सौगात है,
जो सजाता है जीवन,

मुरझाये कली को फिर से,
जिंदा कर दे जो,
प्यार वो सौगात है,
जो सजाता है बहारों का दामन,

प्यार एक समन्दर, एक नदी, एक ताल है,
प्यार में ना होता कोई सवाल-जवाब है,
प्यार तो बस पवन का झोंका है,
जो आता-जाता रहता है,

प्यार एक खुशनुमा सवेरा, ग़ुलाबी शाम और हसीं रात है,
प्यार बिना सजता नहीं मधुवन,

प्यार वो सौगात है,
जो पैदा करता है जीवन,
प्यार वो सौगात है,
जो सजाता है जीवन


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अपनी मनमानी क्यों है करना,
बेमतलब नादानी क्यों है करना,
जब है संविधान हमारा बेहद सशक्त,
गुनाहों को सलामी क्यों है करना,

जो फूट डालते हैं उन्हें डालने दो,
हमें उनकी बातों में क्यों है आना,
हम हैं इन्साँ जब ये है मालूम हमको,
तो वहशियों में जाकर हमें क्यों है मिलना,

भाईचारा सिखाता है संविधान हमारा,
तो लड़-लड़ के क्यों है मरना,
जब समन्दर खड़ा है बाँहें पसारे,
तब रेत की ग़ुलामी क्यों है करना,

अपनी मनमानी क्यों है करना,
बेमतलब नादानी क्यों है करना,
जब है संविधान हमारा बेहद सशक्त,
गुनाहों को सलामी क्यों है करना


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जान देते हैं,
फिर भी जीते हैं,
हम फौजी हैं,
हम फौजी हैं,

खून देकर हम,
मिट्टी सींचते हैं,
भारत माँ के हम,
प्रहरी हैं,

जान देते हैं,
फिर भी जीते हैं,
हम फौजी हैं,
हम फौजी हैं,

प्यास जीवन की,
हमको नहीं,
हम मरने से कभी,
डरते नहीं,

जान देते हैं,
फिर भी जीते हैं,
हम फौजी हैं,
हम फौजी हैं,

हम फौजी हैं,
हम फौजी हैं,
हम फौजी हैं,
हम फौजी हैं


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नदी की तरह बहता है जीवन,
चट्टानों से टकराकर आगे बढ़ता है जीवन,
जहाँ से है गुजरता वहाँ खुशहाली ले आता है जीवन,
नदी की तरह बहता है जीवन,

पग-पग ठोकर भी है खाता,
फिर भी मुश्किलों को पार कर जाता है जीवन,
शातिरों की चाल समझता है जीवन,
नदी की तरह बहता है जीवन,

कोई साथ न हो फिर भी अकेला रहता नहीं जीवन,
बहार साथ चलती है जहाँ भी जाता है जीवन,
उजड़े आशियानों को बसाता है जीवन,
नदी की तरह बहता है जीवन,

नदी की तरह बहता है जीवन,
चट्टानों से टकराकर आगे बढ़ता है जीवन,
जहाँ से है गुजरता वहाँ खुशहाली ले आता है जीवन,
नदी की तरह बहता है जीवन


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मन में है आत्मविश्वास तो कौन रोकेगा तुम्हें,
मन में है आत्मविश्वास तो कौन रोकेगा तुम्हें,
सामने हो पहाड़, नदी हो विशाल,
कौन रोकेगा तुम्हें,
मन में है आत्मविश्वास तो कौन रोकेगा तुम्हें,

है साथ तुमको तुम्हारा तो कौन रोकेगा तुम्हें,
मन में है आत्मविश्वास तो कौन रोकेगा तुम्हें,

बड़ा ही तंग होता है, मंज़िल ए वफ़ा का रास्ता,
पर है आत्मविश्वास तो हो जाता है आसाँ हर रास्ता,
है बुलंद हौसला तो कौन रोकेगा तुम्हें,
है आत्मविश्वास तो कौन रोकेगा तुम्हें,

मन में है आत्मविश्वास तो कौन रोकेगा तुम्हें,
मन में हैं आत्मविश्वास तो कौन रोकेगा तुम्हें,
मन में है आत्मविश्वास तो कौन रोकेगा तुम्हें


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लिखता हूँ मैं हर किसी के लिए,
कहता हूँ मैं हर किसी के लिए,
फ़लसफ़ा है मेरे जीवन का बस यही,
अमन चाहता हूँ मैं हर किसी के लिए,

हर कोई है गुणवान,
हर कोई है गुणवान,
पर अपने दिल की आवाज़ को पहचान,
तभी इरादा बनेगा तेरा अटल चट्टान,

चाहत से कोई क्या नहीं कर सकता,
अपने और हर किसी के लिए,
जो पर्वत तोड़ रास्ता बना दे,
वो भी तो है इन्सान,

पर वो है अटल इन्सान,
क्योंकि दु:ख सहा उसनें सबकी खुशी के लिए,
जिसने भारत माँ की ख़ातिर सब कुछ लुटा दिया,
वो सुभाष चंद्र हुआ कुर्बान सिर्फ़ हमारी हँसी के लिए,

लिखता हूँ मैं हर किसी के लिए,
कहता हूँ मैं हर किसी के लिए,
फ़लसफ़ा है मेरे जीवन का बस यही,
अमन चाहता हूँ मैं हर किसी के लिए


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ग़ैरों को भी जो अपना समझे,
उसको इन्सान कहते हैं,                         
बेपनाह मुहब्बत हो जिसके दिल में,
उसको इन्सान कहते हैं,
इन्सानियत ही है इन्सान की पहचान,
वो क्या ख़ाक समझेंगे इन्सानियत को,
जो इन्सान होने पर रोते हैं,

अरे ! आँख है तो ज़रा आँसू बहा,
हिम्मत है तो ज़रा उसको दिखा,
क्या बैठा है डर के,
डर को मार और आगे बढ़,
जो डर को ले जीत,
बहादुर उसे ही कहते हैं,

ग़ैरों को भी अपना समझे,
उसको इन्सान कहते है,
बेपनाह मुहब्बत हो जिसके दिल में,
उसको इन्सान कहते हैं,
इन्सानियत ही है इन्सान की पहचान,
वो क्या ख़ाक समझेंगे इन्सानियत को,
जो इन्सान होने पर रोते हैं


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कारवाँ है चल रहा मंज़िल की ओर,
रेत, पत्थर, बर्फ से है गुजर रहा,
चल रहा है साहिल की ओर,
कारवाँ है चल रहा मंज़िल की ओर,

मैं देख रहा हूँ जो मंज़िल,
वो सिर्फ मंज़िल नहीं,
वो मंज़िल ए वतन है,
वो मंज़िल ए चमन है,
वो मंज़िल ए क़ायनात है,
वो मंज़िल ए वफ़ा है,

वो मंज़िल है साहिल ए मुहब्बत की डोर,
कारवाँ है चल रहा मंज़िल की ओर,
कारवाँ है चल रहा मंज़िल की ओर,
कारवाँ है चल रहा मंज़िल की ओर


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नदी की तरह बहता है जीवन,
चट्टानों से टकराकर आगे बढ़ता है जीवन,
जहाँ से है गुजरता वहाँ खुशहाली ले आता है जीवन,
नदी की तरह बहता है जीवन,

पग-पग ठोकर भी है खाता,
फिर भी मुश्किलों को पार कर जाता है जीवन,
शातिरों की चाल समझता है जीवन,
नदी की तरह बहता है जीवन,

कोई साथ न हो फिर भी अकेला रहता नहीं जीवन,
बहार साथ चलती है जहाँ भी जाता है जीवन,
उजड़े आशियानों को बसाता है जीवन,
नदी की तरह बहता है जीवन,

नदी की तरह बहता है जीवन,
चट्टानों से टकराकर आगे बढ़ता है जीवन,
जहाँ से है गुजरता वहाँ खुशहाली ले आता है जीवन,
नदी की तरह बहता है जीवन


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है मन में हौसला तो उड़ान भर,
इन्सान है तो इन्सान की पहचान कर,
रेत है फैला समन्दर की शक्ल में,
तू आज समन्दर की पहचान कर,

बंदिशों में बंध ना तोड़ उसे,
है शरीर जिंदा तो ज़मीर से जोड़ उसे,
भँवर में क्या है फंसता साहिलों पे गौर कर,
है मन में हौसला तो उड़ान भर,

सर पे है फैला नील गगन तू उसकी उड़ान भर,
बनके आवारा पंछी तू सरहदों को पार कर,
बनके अटल हिमालय तू धरा पर राज कर,
है मन में हौसला तो उड़ान भर,

है मन में हौसला तो उड़ान भर,
इन्सान है तो इन्सान की पहचान कर,
रेत है फैला समन्दर की शक्ल में,
तू आज समन्दर की पहचान कर

 ---------------.

कवि मनीष
पता- मनीष कुमार

पिता-श्री सतीश शर्मा

पूर्वी नंदगोला नागा बाबा का बंगला मालसलामी पटना सिटी,

पिन-800008

कविता 5197166391802276663

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