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कहानी – अम्मा का साथ - शिक्षा धारिया

ये कहानी लखन की है, जिसे लगता है कि उसकी अम्मा ने आखिरी वक्त में उससे झूठ बोला था.

क्या थी वो मां बेटे की कहानी? देखते हैं उन्हीं की जुबानी -

ये बात उन दिनों की है, जब आज की तरह सुख सुविधा नहीं थी. हम गाँव में रहा करते थे. उस समय मैं करीब नौ साल का था, जब मेरी अम्मा हमें छोड़कर तारों की दूनिया में न जाने कहाँ गुम हो गई. बहुत चाहती थी अम्मा हमको. और हम भी तो थे उनका आंचल पकड़कर सारा गांव घूमा करते थे. हमें आज भी याद है वो दिन, वो डरावना दिन , जो हमें आज भी कंपा देता है. वो निश्चित ही काली रात थी बादल गरज रहे थे और अम्बर मानो रूआंसा हो गया था. हल्की हल्की दीए की रोशनी में अम्मा की दोनों आंखें किसी तलाश में थी शायद हमें ही खोज रही थी ।

" लला ओ लला तनिक हमारे पास आओ और अपने दद्दा को भी बुला लियो ". अम्मा की आवाज थी, कंपकंपाती हुई आवाज में बोली थी. हमने कहा - हओ अम्मा तुम बोलो न हम बुला रै दद्दा को तुम आराम करौ. हम भाग कर दद्दा को बुला लाए, दद्दा और हम जल्दी आए.

"का हैं लखन की अम्मा " इतना कहते हुए दद्दा कमरे में अंदर आ गए , कमरे में सन्नाटा छा गया हमारे उस मिट्टी के कमरे में एक अजीब खुशबू फैल गई. वो दोनों आंखों से एकटक हम दोनों को देख रही थीं , मानो अपनी आंखों में हमारी तस्वीरें कैद कर साथ ले जाना चाहती हो. हम दोनों भी उन्हें गौर से देख रहे थे. वो आंखों में ही कुछ कहना चाहती थी मुझसे, लेकिन मैं समझ नहीं पाया था दद्दा तो कुछ बोले ही नहीं बस अम्मा के सिर को आराम से सहलाते रहे, उस दिन रोया नहीं था, मैं बस नाराज था कि वो अकेले ही चली गई, मुड़कर मेरी तरफ एक बार भी नहीं देखा बचपन में ये मन कितना भोला होता हैं न, ज्यादा कुछ समझने की कोशिश ही नहीं करता हैं, मैं अपने मन की भोले पन की चादर में एक जवाब की तलाश में खुद को उस दिन के बाद बहुत अकेला महसूस करने लगा था।

अचानक ही कुछ आवाज आई मैंने पीछे देखा पीछे को कोई नहीं था और मेरा ध्यान टूट गया मैंने अपने हाथों को किसी चीज में बंधा हुआ पाया. मेरा अपहरण कर लिया गया था, मैं किसी घने जंगल एक पेड़ से बंधा था, लेकिन मुझे कुछ याद नहीं आ रहा था बस सर में हल्का सा दर्द हो रहा था, दरअसल अम्मा के गुजर जाने के मैं और दद्दा एकदम अकेले हो गए थे. दद्दा बीमार रहने लगे और काम की जिम्मेदारी मेरे सर आ गई थी । मैं लोगों का छोटा -मोटा काम जैसे खेत में पानी लगाना, बकरी चराना, जानवरों को गांव के बाहर ले जाना ले आना आदि था, कोसों पैदल चलना पड़ता था.और फिर एक दिन मैं इसी वजह सें गांव से बाहर गया और वापस आने में शाम हो गई थी , मैं अकेला रात के सन्नाटे को अपने साथ लेकर आगे बढ़ रहा था ।

अचानक किसी ने मेरे सर पर वार किया और मैं बेहोश हो गया जब आंख खुली तो खुद को यहां पाया मैं बहुत डरा हुआ था, बस अम्मा को याद कर रहा था और बस यहीं प्रार्थना कर था की " भगवान जी हमाई अम्मा को लौटा दो " "हमाई अम्मा को लौटा दो ", मैंने पिछले दो दिन से कुछ नहीं खाया था और भूखा -प्यासा एक पेड़ के सहारे बैठा केवल अपनी अम्मा को याद कर रहा था, इतने में मेरी थकी हुई आंखों में एक परछाई चमकी हल्की धुंधली धुंधली सी दिखी मुझे समझ नहीं आ रहा था क्या हैं, फिर वो परछाई धीरे धीरे मेरे पास आने लगी और सीसे के समान मेरी आंखों से वो बादलों का धुंआ छट गया और तस्वीर एकदम साफ दिख रही थी, वो और कोई नहीं मेरी अम्मा थी लखन की अम्मा, जिनका पल्लू पकड़ मैं सारा गांव घूमा था , उन्होंने बड़े प्यार से अपना हाथ मेरे सर पर फेरा फिर मुझे अपने हाथों से खीर खिलाई उन्होंने मुझसे ढेरों बातों की , उन्होंने वहाँ से मुझे छुड़ाया और अपना आंचल पकड़ा कर पीछे चलने को कहा मैं उनके साथ चलता चला गया और न जाने कब मेरी नींद टूटी मैं जंगल के पास एक गांव में था ।। वो डकैतों से बचा लाई थी मुझको, वाकई मां तो मां होती हैं आज मुझे विश्वास हो गया था, उस बात पर, उस दिन वो मुझसे और दद्दा से कह रही थी "सुनौ लखन के दद्दा और लला तुम दौनऊ एक दूसरे को ख्याल रखिओ और लला तुम दद्दा को खुशी से रखिओ उन्हें उदास न होन दियो ", और जब मैं उनसे नाराज हो गया था तो उन्होंने बड़े प्यार से मेरे माथे को चूमा था और बोली थी, " हम कऊं दूर थोड़ी न जा रै, तुमै जब हमाई याद आए तो हमै बुला लियो.

हम दो मिनट में आजें ", और इतना कहकर आखिरी बार मुस्कुरा दी थी, वो सच बोल रही थी, और मैं पागल ये समझता रहा कि हमाई अम्मा हमसै झूठ बोल कै अकेले अकेले चली गई लेकिन आज मुझे विश्वास हो गया था , कि वो हर पल हर क्षण मेरे ही साथ थी, अपने लखन को अपने आंचल के स्पर्श में लिए, मेरा हाथ थामे।।।

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