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कहानी - दलदल - हरीश कुमार ‘अमित’

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वार्षिक परीक्षा के लिए चार दिन पहले भरे अपने एग्जामिनेशन फॉर्म को वह अभी-अभी तीसरी बार अच्छी तरह जाँचकर आया है. फॉर्म देखते वक़्त वीरेन्द्र ...

वार्षिक परीक्षा के लिए चार दिन पहले भरे अपने एग्जामिनेशन फॉर्म को वह अभी-अभी तीसरी बार अच्छी तरह जाँचकर आया है. फॉर्म देखते वक़्त वीरेन्द्र भी उसके साथ था. अपनेआप को अब वह काफी आश्वस्त-सा महसूस कर रहा है. उसे लग रहा है जैसे उसके सिर से एक भारी बोझ उतर गया है. मन-ही-मन उसने इस बात का फैसला किया है कि अब वह किसी भी वहम-शहम के चक्कर में नहीं पड़ा करेगा और एक सामान्य ज़िंदगी जीने की कोशिश करेगा.

लेकिन इस बोझ के उतर जाने की ख़ुशी का अहसास अभी उसे पूरी तरह हो भी नहीं पाया है कि अपने अंदर से एक मंद-सी आवाज़ उभरती उसे महसूस होने लगी है कि कहीं फार्म में अपना नाम लिखना तो वह नहीं भूल गया. कुछ देर उसने सोचा है ओर फिर सिर झटककर इस आवाज़ को दबाने की कोशिश की है. वीरेन्द्र और उसने सारा फार्म अच्छी तरह जाँचा था - यह बात उसे अब भी याद है. मगर इसके बावजूद अपने अंदर की आवाज़ को वह दबा नहीं पा रहा. सिर को ज़रा ज़ोर से झटककर इस ख़याल को दूर हटाने की एक और कोशिश उसने की है. पर इस ख़याल का एहसास और तेज़ होता जा रहा है.

वीरेन्द्र उससे अगले हफ़्ते शुरू होने वाली दिसम्बर की टर्मिनल परीक्षा के बारे में बात कर रहा है. लेकिन जवाब में उसके मुंह से सिर्फ ‘हूँ’, ‘हाँ’ ही निकल पा रहे हैं. दिसम्बर के इम्तिहानों की बजाय उसके दिमाग़ में तो बस यही बात तेज़ी से चक्कर काटने लगी है कि वार्षिक परीक्षा के एग्जामिनेशन फॉर्म में अपना नाम उसने लिखा हुआ है कि नहीं. उसके जी में आ रहा है कि इस बारे में वीरेन्द्र से एक बार पूछकर तसल्ली कर ली जाए. पर उसे लगता है कि ऐसा करने पर वह उसका मज़ाक उड़ाने लगेगा. इसलिए वह अपने जी को कड़ा करने की कोशिश करने लगा है.

यह बात तो वह अच्छी तरह से समझता है कि अगर वह एग्जामिनेशन फॉर्म के चक्कर में ही पड़ा रहा तो सालाना इम्तहान में जरूर गोल हो जायेगा. पर साथ ही अपने दिल में उठ रही इस बात को भी वह दबा नहीं पा रहा था कि अगर सिर्फ फॉर्म में किसी ग़लती की वजह से वह इम्तहान में फेल हो गया या उसके नम्बर कम आए तो वह भी तो अनर्थ से कम नहीं होगा. यह सोच वीरेन्द्र से फॉर्म के बारे में पूछ ही लेने की बात उसके दिमाग़ में और ज़ोर मारने लगी है. अपनी इस भावना को काबू में रखने की कोशिश तो उसने बहुत की है पर वह है कि उस पर छाती ही जा रही है. उसका सिर घूमने लगा है और आखिरकार उसे वीरेन्द्र से पूछना ही पड़ा है,‘‘यार...वो... फॉर्म में... मैंने अपना नाम तो लिखा था न?’’

‘‘यार रवि, तू फॉर्म के बारे में इतना ज़्यादा सोचने की बजाय छह दिन बाद शुरू होने वाले एग्जाम्स के बारे में सोच. तीन बार तो तू फॉर्म चेक करके आ चुका है. इनमें से दो बार मैं भी तेरे साथ था. फिर भी तुझे तसल्ली नहीं हो रही. मैं भी तो हूँ तेरे सामने. दूसरे लड़के भी तो हैं जिन्होंने फॉर्म भरा है. सिर्फ तू ही तो ख़ुदा का अकेला बंदा नहीं है जिसने ऐसा किया है. सब लोग फॉर्म भरकर भूल भी गये हैं. और तू है कि फॉर्म-फॉर्म की रट लगाए हुए है. मेरे ख्याल से तो तेरा नाम लिखा हुआ था और मान लो अगर नहीं भी लिखा हुआ तो आफिस वाले तुझे बुलाकर लिखवा लेंगे. वे फॉर्मों को अच्छी तरह चेक करके ही यूनिवर्सिटी भेजते हैं यार!’’

मगर वीरेन्द्र की इन बातों से उसे तसल्ली नहीं हो रही. अपना फॉर्म एक बार और देख ही लेने की बात उसके दिमाग़ में ज़ोर पकड़ने लगी है. घबराहट-घबराहट-सी महसूस होने लगी है उसे. उसे लगने लगा है कि बिना एक बार और फॉर्म देखे उसकी यह घबराहट दूर होने वाली नहीं. लेकिन यह ख़याल आने पर कि ऐसा करने से वीरेन्द्र और कॉलेजवाले उसकी खिल्ली उड़ायेंगे, उसे सनकी और न जाने क्या-क्या करेंगे, इस विचार को झटक देने में ही उसे अपनी भलाई दीख रही है.

अपना ध्यान दूसरी बातों की तरफ़ लगाने की भी उसने बहुत कोशिश की है. मगर यह बात उसके दिमाग़ से हट ही नहीं रही. वह बार-बार अपने फॉर्म में लिखे हुए शब्दों को याद करने की कोशिश कर रहा है. कभी तो उसे लगने लगता है कि अपना नाम उसने फॉर्म में लिखा हुआ था, मगर तभी उसे यह भी लगने लगता है कि हो सकता है न भी लिख हुआ हो. जितना ज़्यादा वह इस बारे में सोचता जा रहा है, उतना ही उसका यह शक पक्का होता जा रहा है कि अपना नाम उसने नहीं लिखा हुआ.

अपने इस शक के खिलाफ वह अपने-आप को तर्क दे रहा है कि फॉर्म भरते वक़्त आदमी सबसे पहलेवाला नाम का कॉलम ही तो भरता है. तब भला यह कैसे हो सकता है कि उसने वह पहला-पहला कॉलम ही न भरा हो. और फिर जबकि वह तीन-तीन बार, जिनमें दो बार वीरेन्द्र भी उसके साथ था, अपने फॉर्म की जाँच करके आ चुका है, शक की कोई गुंजाइश रहनी ही नहीं चाहिए. अगर ग़लती से अपना नाम लिखना वह भूल भी गया होता, तो किसी-न-किसी बार तो यह बात सामने आ ही जाती.

किन्तु इस बात का जवाब उसे अपने अंदर से ही मिल गया है कि हो सकता है जब प्रोफेसर लाल लड़कों से फॉर्म भरवा रहे थे, तो नाम वाला पहला-पहला कॉलम भरने के वक़्त उसका ध्यान अभी फॉर्म के पीछे छपे नियमों में ही अटका हुआ हो, क्योंकि फॉर्म भरने से पहले प्रोफेसर लाल ने सभी लड़कों से वे नियम ध्यान से पढ़ लेने को कहा था और इस तरह अपना नाम लिखना वह भूल गया हो. इसके बाद तीनों बार फॉर्म जाँचते वक़्त यह सोचकर कि अपना नाम लिखना कोई कैसे भूल सकता है, उसने और वीरेन्द्र ने नाम वाले कॉलम की तरफ ध्यान ही न दिया हो.

जितना ज़्यादा वह इस बारे में सोचता जा रहा है, उतना ज़्यादा उसे यह लगने लगा है कि अपना नाम उसने फॉर्म में नहीं ही लिखा हुआ. उसकी घबराहट और बेचैनी बढ़ती जा रही है. इसका इलाज उसे फॉर्म को बस एक बार और देख लेना ही लग रहा है. यह बात उसके दिल में बार-बार आ रही है कि अगर सिर्फ एक बार और फॉर्म देख लेने से ही उसकी बेचैनी दूर हो सकती है और वह पढ़ाई में पूरी तरह अपना दिल लगा सकता है तो क्यों न ऐसा कर ही लिया जाये. इसमें बुराई ही क्या है. और थोड़ी देर बाद ही ऐसी हालत आ गयी है कि उसे यह ज़रूरी लगने लगा है कि किसी को साथ ले जाकर यह देख ही लिया जाये कि फॉर्म में अपना नाम उसने लिखा हुआ है या नहीं.

उसे याद आ रहा है कि पिछले डेढ़-दो सालों से वह ऐसे ही ऊलजलूल वहमों के चंगुल में जकड़ा हुआ है. इतना ज़रूर है कि शुरू-शुरू में यह वहम उसे ज्यादा परेशान नहीं किया करते थे और वह जल्दी ही इन पर काबू पा लिया करता था.

बात शायद तब शुरू हुई थी जब एक दिन अचानक उसे ख़याल आया था कि रात को रोटियाँ बनाने के लिए जब छत पर तंदूर जलाते हैं, तो आग की कोई चिंगारी उड़कर कुछ दूर पड़ी लकड़ियों के ढेर पर न जा पड़े और रात को आग न लग जाये. आग लग जाने से होने वाले नुकसान का ज़्यादा डर उसे नहीं था. डर उसे था तो अपने ताऊजी का, जो बहुत ग़्ास्सेवाले थे. आग लग जाने पर उन्होंने तो घर में कोहराम मचाकर रख देना था.

दरअसल उसके सारे परिवार और उसकी दादी माँ का सारा खर्च उसके ताऊजी ही उठाया करते थे. उसके बाबूजी तो कुछ महीने पहले नौकरी से रिटायर हो चुके थे. वे थल सेना में थे और किसी ऊंची पदवी पर न पहुंच पाने के कारण करीब 48 साल की उम्र में ही नौकरी से छुट्टी पा गये थे. उन्हें मिलने वाली पेंशन की राशि भी साधारण ही थी. अब वे सब लोग उसके ताऊजी के पास करनाल में आ गये थे, जिनका वहाँ पर बहुत बड़ा मकान और किराये का काफी बड़ा व्यापार था. ताऊजी वहाँ उसकी दादी मां के साथ रहते थे. उनके बीवी-बच्चे कुछ साल पहले एक रेल दुर्घटना में गुजर गये थे.

उसके बाबूजी फिलहाल तो सारा दिन घर पर ही रहते थे. न तो ताऊजी की दुकान में उनके लिए कोई जगह थी और न ही गुड़-तेल वाला यह धंधा करना उनके बस की बात थी. ताऊजी को कोई काम-धंधा जमा देने के लिए कहने पर उनकी तरफ से सिर्फ आश्वासन, सलाहें और कटाक्ष ही मिले थे. पैसे उसके बाबूजी के पास इतने थे नहीं कि वे ख़ुद कोई काम शुरू कर सकते. साथ ही वे थे भी कुछ दब्बू किस्म के आदमी. इसके अलावा उसकी दो बड़ी बहनें भी शादी के लायक होती जा रही थी. इस तरह कुल मिलाकर वे लोग उसके ताऊजी पर ही निर्भर थे. इसी वजह से वे उन लोगों पर हमेशा ख़ामख़्वाह रौब झाड़ते रहते थे, जिसे सहने के अलावा उन लोगों के पास और कोई चारा नहीं था.

जब से यह ख़याल उसके दिल में आया था कि कहीं रात को चिंगारी से आग न लग जाये, उसने रोज़ रात को सोने से पहले छत पर जा लकड़ियों के ढेर को देखकर अपनी तसल्ली करनी शुरू कर दी थी. शुरू-शुरू में तो ढेर पर एक नज़र मारकर ही वह आश्वस्त हो जाया करता था, मगर बाद में सीढ़ियाँ उतरते वक़्त यह आशंका उसके दिल में सिर उठाने लगी कि क्या पता उसने लकड़ियों के ढ़ेर को अच्छी तरह देखा ही न हो और किसी तरफ से धुआँ निकल ही रहा हो. शुरू-शुरू में इस आशंका को किसी तरह दबाकर वह सीढ़ियाँ उतर आया करता था. नीचे आने के थोड़ी देर बाद ही लकड़ियों, धुएं और आग वाली बात उसे भूल जाया करती. मगर धीरे-धीरे उसे यह बात याद रहने का दौर बढ़ता गया और फिर तो यह आशंका उसे रात-रात भर बेचैन रखने लगी. सारी-सारी रात उसे यह लगता रहता कि ‘आग-आग’ का शोर अभी सुनाई दिया कि दिया. और तब मजबूर होकर उसने लकड़ियों को तीन-तीन बार ध्यान से देखना शुरू कर दिया था.

और उसके बाद तो लकड़ियों को देखने की उसकी गिनती लगातार बढ़ती ही गई थी. धीरे-धीरे एक ऐसी हालत आ गई कि रात को तंदूर बुझा देने के थोड़ी देर बाद वह लकड़ियों के ढेर के पास जाकर खड़ा हो जाता और उसे एक बार ध्यान से देखकर आँखें बंद कर लेता. कुछ देर बाद आँखें खोलकर वह फिर लकड़ियों के ढेर को ध्यान से देखकर आँखें मूँद देता. ऐसा वह तब तक करता रहता जब तक उसे पूरी तसल्ली न हो जाया करती कि लकड़ियाँ बिल्कुल सही-सलामत हैं और उन्हें आग-वाग बिल्कुल नहीं लगी है. अब वह लकड़ियों को करीब दस-दस बार देखा करता था.

आग लग जाने के वहम के साथ ही एक और आशंका ने भी उसे परेशान करना शुरू कर दिया था. उसने किसी से सुना था कि अगर पंखा काफी देर तक चलता रहे, तो यह बहुत गर्म हो जाता है और उसे आग लग जाया करती है. इसलिए रात को सोने से पहले घर के सभी पंखों (ताऊजी के पंखे को छोड़कर) के बटनों की जांच करनी भी उसने शुरू कर दी थी. लकड़ियों वाली बात की तरह यहाँ भी उसका वही हाल हुआ था. शुरू-शुरू में जहाँ बटनों को एक बार देख लेने भर से ही वह संतुष्ट हो जाया करता था, अब दसियों बार हाथ लगा-लगाकर देखने पर भी नहीं हो पाया था. इस असंतुष्टि के कारण उसका दिमाग़ मारे तनाव के चटखने लगता.

बात सिर्फ लकड़ियों और पंखों तक ही सीमित नहीं रही थी. उसके दिल में तो रोज़-रोज़ नये-नये वहमों ने जन्म लेना शुरू कर दिया था.

अब उसे यह डर भी रहने लगा था कि कहीं रेडियो खुला ही रह गया और रात को जब सब लोग सो रहे हों, तो वह कहीं इतना गर्म न हो जाये कि आग पकड़ ले. इसलिए इस ख़तरे से भी बचने के लिए उसने हर रात सोने से पहले रेडियो बंद करनेवाले बटन को एक बार परख लेना शुरू कर दिया था. लेकिन बाद में सिर्फ़ ऐसा करने से उसे हो जाने वाली तसल्ली की मात्रा घटने लगी थी. बटन को जाँचने की उसकी संख्या तो बढ़ती गयी ही थी, जिस सॉकेट में रेडियो का प्लग लगा होता था, उसके बटन को बंद करना भी उसने शुरू कर दिया था.

पर बाद में यह बात भी उसके मन में आने लगी कि उसके बटनों की जाँच करके सोने के बाद घर का कोई जना रेडियो सुनने के लिए अगर उन दोनों बटनों को खोले और फिर बटन बंद करने से रह जाए, आग तब भी तो लग सकती है. इसलिए उसने रात को रेडियो के प्लग को ही सॉकेट से निकाल देना शुरू कर दिया था.

प्लग निकाल देने के बाद उसे बटनों की जाँच-पड़ताल करने की ज़रूरत नहीं रह जानी चाहिए थी. मगर फिर भी यह डर उसे बराबर लगा रहता था कि कहीं गलती से दोनों बटन खुले न रह गए हों और कोई यह देखकर कि प्लग सॉकेट से बाहर निकल गया हुआ है, उसे स्विच में डाल दे और... इसलिए दोनों बटनों की जाँच करना भी उसने जारी रखा था. अब रात को वह बीस-बीस, तीस-तीस बार तक बटनों की जाँच किया करता.

अपने-आप को यह समझाने की कोशिश उसने बहुत की थी जो कुछ वह कर रहा है, वह ठीक नहीं है. ऐसा करते रहने से उसका आत्मविश्वास घटता जायेगा और बारहवीं कक्षा तक जहाँ वह क्लास में हमेशा पहले नम्बर पर आता रहा है, इस साल नहीं आ सकेगा. मगर हालत तो धीरे-धीरे इससे भी बदतर होती गई थी. लकड़ियों के मामले में तो अब यह आलम हो गया था कि वह उन्हें चाहें कितनी बार भी ध्यान से क्यों न देख लिया करता, उसे तसल्ली होती ही नहीं थी. लकड़ियों के ढेर की ओर देखते-देखते आखि़र तंग आकर वह यह सोच सीढ़ियां उतर आता कि जो होगा, देखा जायेगा. उसने घरवालों का ठेका थोड़े ही ले रखा है जो वह उनके लिए दिन-रात चिंता में घुलता रहे. मगर इसके बावजूद उसका दिमाग़ इस डर से सुलगता रहता कि कहीं रात को आग लग ही न जाये.

यही बात पंखों और रेडियो पर भी लागू होनी शुरू हो गई थी. स्विचों को अब वह चाहे कितनी बार भी क्यों न देख लिया करता, उसे तसल्ली हो ही नहीं पाती थी. उसका जी चाहता रहता कि बटनों को एक बार तो और देख ही लिया जाये. आखिर में परेशान होकर वह लकड़ियोंवाली बात यहाँ भी आजमाता और ‘जो होगा देखा जायेगा’ सोचकर स्विचों के पास से हट आता.

यह बात वह अच्छी तरह से जानता-समझता था कि उसके ये वहम बिलकुल ऊलजलूल और बेबुनियाद हैं, मगर इसके बावजूद इन पर काबू पाने में वह कामयाब नहीं हो पा रहा था. जब-जब वह सोच लेता कि आज रात वह छत पर लकड़ियों को देखने नहीं जायेगा या पंखों और रेडियो के स्विचों के बंद होने की तसल्ली नहीं करेगा, तब-तब उसकी हालत खराब होने लगती. रात होने से पहले ही उसकी आंखों के आगे घर में आग लगी होने के दृश्य घूमने लगते और साथ ही आँखों के आगे आ जाता ताऊजी का ग़्ास्से से भरा भयानक रूप. उसे लगता कि घर में आग लग जाने पर हालाँकि वह व़क्त पर बुझा ली गयी है, पर आग लग जाने की बात से ही उसके ताऊजी का पारा बहुत गरम हो गया है. आग की वजह वे घर के बाकी लोगों की लापरवाही समझ रहे हैं और उन सबको बुरा-भला कहते हुए उन्हें अपने घर से निकल जाने के लिए कह रहे हैं.

अब तो उसे कुछ दूसरी किस्म के वहम भी सताने लगे थे. जैसे कि उसे यह डर रहने लगा था कि कहीं सिरहाने की तरफ वाली खूँटी पर टँगी छतरी या कोई और चीज़ रात को नीचे न गिर जाये और उसकी आँख में या कहीं और लगकर उसे नुकसान न पहुंचा दे. इसलिये उसने सोने से पहले अपनी चारपाई के आसपास की खूँटियों पर टंगी चीजे़ं उतारकर रखना शुरू कर दिया था.

इन ऊलजलूल वहमों में अपने को जकड़ा हुआ पाकर वह बहुत चिंतित-सा रहता. इस बात की समझ उसे अच्छी तरह से थी कि आत्मविश्वास की कमी के कारण ही ये सब उलझनें उसे सता रही हैं. वह जानता था कि इन वहमों की वजह से हमेशा रहने वाला तनाव आदमी को उच्च रक्तचाप, अल्सर और हृदय रोग जैसी कई भयानक बीमारियों का शिकार बना देता है. वहमों के कारण उसे रहने वाले तनाव को ऐसी किसी बीमारी के हो जाने का तनाव और भी बढ़ा देता. वह समझ नहीं पाता था कि ऐसे में उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं.

कई बार घर का कोई जना उसे रेडियो या पंखों के बटनों को पागलों की तरह बार-बार टटोलते देख लेता. ऐसा करने की वजह पूछने पर वह कोई बहाना मार जाता, जैसे कि वह देख रहा था कि कितनी ताकत लगाने पर ये बटन खुल सकते हैं. या फिर उससे पूछने से पहले ही वह कोई ऐसी हरकत करने लगता जिससे उसके घर के सदस्यों को कोई शक नहीं होने पाता था. मगर उसके जी में यह ज़रूर आता रहता कि क्या ही अच्छा हो अगर उन्हें उसके इन झूठे-मूठे बहानों से तसल्ली न हुआ करे और वे उसे इतना कुरेदें कि मजबूर होकर उसे सारी सच्चाई उनके सामने उगल देनी पड़े. फिर वे उसे समझायें, डाँटें या कुछ भी करें.

अक्सर उसके जी में यह भी आता कि वह कभी ख़ुद ही घरवालों को अपन इन वहमों के बारे में बता दे. शायद वे लोग, जो उम्र और तजुर्बे में उससे काफी बड़े हैं, उसे कोई ऐसी राह सुझा दें कि इन वहमों के चक्कर में वह आसानी से छूट जाए. पर बहुत चाहने पर भी ऐसा कर पाना उसके लिए मुमकिन नहीं हो पाता था. कई बार उसने तय कर लिया था कि आज तो वह किसी-न-किसी तरह वहमों वाली यह बात अपने घरवालों को बता ही देगा. पर ऐन मौके पर उसकी जुबान को काठ मार जाया करता और वह कुछ भी न कह पाता.

घर के बाकी जनों और कॉलेज के सहपाठियों को वह बड़ी हसरत से देखा करता कि वे किस तरह ऐसे ऊलजलूल वहमों से बचे आज़ाद-से घूमते-फिरते हैं. कइयों से कुरेद-कुरेदकर यह जानने की कोशिश उसने की भी थी कि क्या उन्हें भी ऐसे-वैसे वहम सताया करते हैं. मगर यह जानकर उसे बहुत हैरानी हुई थी कि उन्हें तो इस बात की कोई चिंता ही नहीं है कि घर में रेडियो या पंखा खुला रहने से आग लग जाएगी या रात को सोते वक़्त पास की किसी खूँटी पर टँगी कोई चीज़ उन पर गिरकर उन्हें नुकसान पहुँचा देगी.

अपने वहमों को अपने तर्कों से दबाने की भरपूर कोशिश वह किया करता, मगर सफल न हो पाता. उसके वहम उसके तर्कों पर हमेशा वज़नी साबित होते.

वह अपनेआप को समझाता कि जब दूसरे लोगों के रेडियो, पंखे और लकड़ियाँ यूं बैठे-बिठाये आग नहीं पकड़ा करते, तो उसके घर के क्योंकर पकड़ेंगे. पर इसका जवाब उसे उसके वहम देते कि आग जब लगा करती है तो यूँ भी लगा करती है. माना कि इस घर में रेडियो या पंखों के बटन रोज़ाना बंद कर दिये जाते हैं और तंदूर की आग पानी से अच्छी तरह बुझा दी जाती है, लेकिन फिर भी किसी दिन तो लापरवाही हो ही सकती है. और उस दिन अगर उनके घर में आग लग गई तो? ऐसे में उसके ताऊजी तो उन लोगों को कच्चा ही चबा जायेंगे. दूसरे घरों के लोग किसी के टुकड़ों पर नहीं पला करते. उनकी सब चीजें उनकी अपनी कमाई की होती हैं. लेकिन यहाँ तो हालत ऐसी नहीं हैं. इसलिए इस पराए घर और यहाँ की ज़्यादातर पराई चीजों की हिफाज़त की ही जानी चाहिए.

यह बात भी उसके दिमाग़ में आया करती कि अगर ताऊजी ने गुस्से में आकर उनको घर से निकाल दिया, तो उन लोगों का क्या होगा. रिटायर हो चुके उसके बाबूजी कोई छोटी-मोटी नौकरी ही पा सकते थे. ताऊजी की मदद के बगैर वे कोई कारोबार शुरू कर सकने की हालत में भी नहीं थे. खुद वह अभी बी.कॉम. प्रथम वर्ष में ही था. ऐसे में उसकी नौकरी लग पाना भी बड़ी मुश्किल बात थी. और अगर उसके बाबूजी और वह, दोनों, कहीं कोई छोटी-मोटी नौकरी पा भी लेते, तो इससे उनके घर का खर्च भले ही चल जाता, उसकी बहनों की शादी के ख़्वाब भी नहीं देखे जा सकते थे. ऐसे में दर-दर की ठोकरें खाने के सिवा उनके सामने और क्या चारा रह जाना था. इसलिए उसे लगता कि रात को दस-पंद्रह मिनट तक दिमाग़ खराब करना कोई मंहगा सौदा नहीं.

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और आखि़र अपने दिल की इस आवाज के आगे वह मजबूर हो ही गया कि एक बार और, सिर्फ एक बार और अपने फॉर्म की जाँच कर ही ली जाए. फॉर्म को आखि़री बार जाँचने की बात उसने अपनी डायरी में लिख भी ली है. उसने यह तय कर लिया है कि फॉर्म को अच्छी तरह जाँचकर संतुष्ट हो जाने पर अपनी संतुष्टि की बात भी वह डायरी में लिख लेगा ताकि कल को कोई वहम अगर उसे फिर से अपने शिकंजे में कसना चाहे, तो डायरी में लिखा हुआ पढ़कर वह उससे बच सके.

गवाह के तौर पर अपने साथ वीरेन्द्र को तो वह ले ही जाना चाहता है. पर साथ ही उसकी इच्छा यह भी है कि अगर कोई तीसरा भी साथ चल पड़े, तो ज्यादा अच्छा हो. ऐसा करने से बाद में शक की कोई गुंजाइश बिल्कुल नहीं रह जायेगी. ले जाना भी वह किसी ऐसे आदमी को चाहता है जिस पर उसे पूरा-पूरा विश्वास हो ताकि बाद में अगर उसे फिर से कोई वहम सताने लगे तो दो-दो आदमियों का कहा भी उसे अपने-आप को उस वहम के चंगुल से छूटने में सहारा दे सके. काफी सोच-विचार के बाद अपने बाबूजी ही इस बात के लिए उसे सही आदमी लगे हैं.

अब सवाल यह है कि बाबूजी को इस बारे में कहा कैसे जाये. उन्हें यह कैसे बताया जाये कि वह इस तरह के पागलपन के दौर से गुजर रहा है. आखिर काफी सोच-विचार करके उसने बाबूजी को यह कहा है कि कॉलेज में अपना एग्जामिनेशन फॉर्म भरते वक़्त शायद कुछ कॉलम्स उससे छूट गये थे, इसलिए उसे अपना फॉर्म पूरा करना है. कॉलेज के दफ़्तर का बाबू अब पता नहीं उसे उसका फॉर्म दे या न दे, क्योंकि कल शाम तक ही फॉर्म पूरे किये जा सकते थे. फॉर्म पूरा करने की बात उसके दिमाग़ से उतर ही गई थी. इसलिए अब अगर वे उसके साथ कॉलेज तक चल पड़ें तो बाबू से फॉर्म लेने में उसे आसानी हो जायेगी. बाबूजी उसके शर्मीले और दब्बू स्वभाव को जानते हैं, इसलिए उसके साथ चलने को राज़ी हो गए हैं.

उधर वीरेन्द्र को भी उसने कह दिया है कि वह कॉलेज में उन लोगों को इस स्टाइल में मिले कि उसके बाबूजी समझें कि वह उन्हें अचानक ही मिल गया है.

अपने बनाए प्रोग्राम के मुताबिक वह बाबूजी के साथ कॉलेज गया है. वहाँ वीरेन्द्र भी उन्हें मिल गया है. तब उन तीनों ने अच्छी तरह उसका फॉर्म जाँचा है. वह बिल्कुल ठीक और पूरा भरा हुआ है. बाबूजी को उसने बहाना मार दिया है कि उसे ग़लतफहमी हो गई थी कि फॉर्म अधूरा है. फॉर्म बिल्कुल सही-सही भरा हुआ देखकर वह पूरी तरह संतुष्ट हो गया है. अब बस घर जाकर डायरी में अपनी संतुष्टि की बात लिखनी ही बाकी है. पर तभी यह बात बिजली की-सी तेजी से उसके दिमाग़ में कौंधी है कि घर जाकर यह सब लिखने से पहले ही फॉर्म के बारे में कोई वहम उसे फिर से अपनी चपेट में न ले ले. इसलिए अपने संतुष्ट हो जाने की बात अभी से एक कागज पर लिख लेना ठीक रहेगा. यहाँ बाबूजी और वीरेन्द्र के सामने तो ऐसा करते शर्म आयेगी. हाँ, बाथरूम में जाकर ऐसा किया जा सकता है. इसलिए वह उन्हें ‘जरा बाथरूम होकर आ रहा हूँ’ कहकर चल पड़ा है. मगर तभी पीछे से उसे वीरेन्द्र की आवाज सुनाई पड़ी है, ‘जरा रूकना यार, मुझे भी जाना है.’ फिर वह भी, ‘अंकल, आप जरा ठहरिए. हम अभी एक मिनट में आए.’ कहते हुए उसके साथ हो लिया है.

वीरेन्द्र का साथ चल पड़ना उसे अखरा है मगर अब चारा भी क्या है. बाथरूम में पहुंचकर वह पेशाब करने का नाटक करने लगा है. देर लगाना ज़रूरी है, क्योंकि वीरेन्द्र के सामने कागज़ पर कुछ लिखकर वह उसके सामने और छोटा नहीं होना चाहता. इसलिए उसके हाथ धोकर बाहर चले जाने तक वह उसी मुद्रा में खड़ा रहा है. उसके बाद उसने पैंट की जेब से कागज और पैन निकाले हैं और यह लिखना चाहा है कि मैंने आज 7.11.2007 को बाबूजी और वीरेन्द्र के साथ अपने एग्जामिनेशन फॉर्म को अच्छी तरह चैक किया है और मैं इस बात से पूरी तरह संतुष्ट हो गया हूं कि फॉर्म बिल्कुल सही-सही व पूरा भरा हुआ है. लेकिन यह सब लिखने से पहले ही यह बात बिजली की तरह उसके दिमाग़ में कौंध गई है कि पेपर देने का माध्यम उसने अंग्रेजी के बजाय कहीं हिन्दी तो नहीं लिख दिया.


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संक्षिप्त परिचय

नाम हरीश कुमार ‘अमित’

जन्म मार्च, 1958 को दिल्ली में

शिक्षा बी.कॉम.; एम.ए.(हिन्दी); पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

प्रकाशन 800 से अधिक रचनाएँ (कहानियाँ, कविताएँ/ग़ज़लें, व्यंग्य, लघुकथाएँ, बाल कहानियाँ/कविताएँ आदि) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित


 
एक कविता संग्रह ‘अहसासों की परछाइयाँ’, एक कहानी संग्रह ‘खौलते पानी का भंवर’, एक ग़ज़ल संग्रह ‘ज़ख़्म दिल के’, एक लघुकथा संग्रह ‘ज़िंदगी ज़िंदगी’, एक बाल कथा संग्रह ‘ईमानदारी का स्वाद’, एक विज्ञान उपन्यास ‘दिल्ली से प्लूटो’ तथा तीन बाल कविता संग्रह ‘गुब्बारे जी’, ‘चाबी वाला बन्दर’ व ‘मम्मी-पापा की लड़ाई’ प्र‍काशित

एक कहानी संकलन, चार बाल कथा व दस बाल कविता संकलनों में रचनाएँ संकलित

प्रसारण लगभग 200 रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण. इनमें स्वयं के लिखे दो नाटक तथा विभिन्न उपन्यासों से रुपान्तरित पाँच नाटक भी शामिल.

पुरस्कार (क) चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट की बाल-साहित्य लेखक प्रतियोगिता 1994,

2001, 2009 व 2016 में कहानियाँ पुरस्कृत

(ख) ‘जाह्नवी-टी.टी.’ कहानी प्रतियोगिता, 1996 में कहानी पुरस्कृत

(ग) ‘किरचें’ नाटक पर साहित्य कला परिष्‍द (दिल्ली) का मोहन राकेश सम्मान 1997 में प्राप्त

(घ) ‘केक’ कहानी पर किताबघर प्रकाशन का आर्य स्मृति साहित्य सम्मान दिसम्बर 2002 में प्राप्त

(ड.) दिल्ली प्रेस की कहानी प्रतियोगिता 2002 में कहानी पुरस्कृत

(च) ‘गुब्बारे जी’ बाल कविता संग्रह भारतीय बाल व युवा कल्याण संस्थान, खण्डवा (म.प्र.) द्वारा पुरस्कृत

(छ) ‘ईमानदारी का स्वाद’ बाल कथा संग्रह की पांडुलिपि पर भारत सरकार का भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र पुरस्कार, 2006 प्राप्त

(ज) ‘कथादेश’ लघुकथा प्रतियोगिता, 2015 में लघुकथा पुरस्कृत


 
(झ) ‘राष्‍ट्रधर्म’ की कहानी-व्यंग्य प्रतियोगिता, 2017 में व्यंग्य पुरस्कृत

(ञ) ‘राष्‍ट्रधर्म’ की कहानी प्रतियोगिता, 2018 में कहानी पुरस्कृत

(ट) ‘ज़िंदगी ज़िंदगी’लघुकथा संग्रह की पांडुलिपि पर किताबघर प्रकाशन का आर्य स्मृति साहित्य सम्मान, 2018 प्राप्त

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सम्प्रति भारत सरकार में निदेशक के पद से सेवानिवृत्त

पता 304, एम.एस.4 केन्द्रीय विहार, सेक्टर 56, गुरूग्राम-122011 (हरियाणा)


ई-मेल harishkumaramit@yahoo.co.in

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अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,684,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,719,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,72,साहित्यम्,4,साहित्यिक गतिविधियाँ,193,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ 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रचनाकार: कहानी - दलदल - हरीश कुमार ‘अमित’
कहानी - दलदल - हरीश कुमार ‘अमित’
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रचनाकार
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