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लघु भारत का एहसास कराता है प्रयाग कुंभ - कृष्ण कुमार यादव


प्रयागराज एक अत्यन्त पवित्र नगर है, जिसकी पवित्रता गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के कारण है। वेद से लेकर पुराण तक और संस्कृत कवियों से लेकर लोकसाहित्य के रचनाकारों तक ने इस संगम की महिमा का गान किया है।  प्रयागराज को संगमनगरी, कुम्भनगरी और तीर्थराज भी कहा गया है। प्रयागशताध्यायी के अनुसार काशी, मथुरा, अयोध्या इत्यादि सप्तपुरियांँ तीर्थराज प्रयाग की पटरानियांँ हैं, जिनमें काशी को प्रधान पटरानी का दर्जा प्राप्त है। तीर्थराज प्रयाग की विशालता व पवित्रता के सम्बन्ध में सनातन धर्म में मान्यता है कि एक बार देवताओं ने सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तकुलपर्वत, सप्तपुरियाँ, सभी तीर्थ और समस्त नदियाँ तराजू के एक पलड़े पर रखीं, दूसरी ओर मात्र तीर्थराज प्रयाग को रखा, फिर भी प्रयागराज ही भारी रहे। वस्तुतः गोमुख से प्रयागराज तक जहाँ कहीं भी कोई नदी गंगा से मिली है उस स्थान को प्रयाग कहा गया है, जैसे-देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रूद्रप्रयाग आदि।  केवल उस स्थान पर जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है प्रयागराज कहा गया। इस प्रयागराज के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-’’को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष-पुंज कुंजर मृगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ।।’’ इसी प्रयाग की धरा पर हर 6 वर्ष पर कुम्भ और 12 वर्ष पर महाकुम्भ पर्व का भव्य आयोजन होता है।

      कुम्भ पर्व सनातन आस्था का प्रतीक है। शास्त्रों में कुंभ पर्व की महिमा का गुण-गान करते हुए इसके स्नान को समस्त पापों का नाशक एवं अनंत पुण्यदायक बताया गया है। स्कंद पुराण में वर्णित है-

                   सहस्त्रं कार्तिके स्नानं माघे स्नानशतानि च।

                  वैशाखे नर्मदा कोटिः कुंभस्नानेन तत्फलम्।।

        अर्थात एक हजार बार कार्तिक मास में गंगा में स्नान करने से, सौ बार माघ में संगम-स्नान करने से, वैशाख में एक करोड़ बार नर्मदा-स्नान करने से जो पुण्यफल अर्जित होता है, वह कुंभ में केवल एक बार स्नान करने से प्राप्त होता है। विष्णु पुराण में भी कुंभ-स्नान की प्रशंसा में कहा गया है-

                               अश्वमेधसहस्त्राणि वाजयशतानि च।

                           लक्षं प्रदक्षिणा भूमेः कुंभस्नानेन तत्फलम।। 

      अर्थात् हजार बार अश्वमेध-यज्ञ करने से, सौ बार वाजपेय-यज्ञ करने से और लाख बार पृथ्वी की परिक्रमा करने से जितनी पुण्यराशि संचित होती है, उतनी कुंभ में एक बार स्नान करने से प्राप्त होती है।

        कुम्भ पर्व हरिद्वार (गंगा तट), उज्जैन (क्षिप्रा तट) तथा नासिक (गोदावरी तट) में भी लगता है परन्तु प्रयाग कुम्भ की महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है कि लोगों को यहाँ तीन पवित्र नदियों के संगम में स्नान करने का सुअवसर प्राप्त होता है। प्रयाग में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम तट पर प्रत्येक बारह वर्ष के अन्तराल पर यह विश्व प्रसिद्ध पर्व मकर संक्राति से लेकर महाशिवरात्रि तक चलता है, जिसमें देश-विदेश से करोड़ां नर-नारी असीम श्रद्धा के साथ पतित-पावनी त्रिवेणी में स्नान कर न केवल अपने पापों एवं कष्टों को धोते हैं, बल्कि ऐसी मान्यता है कि इसके साथ ही विद्वानों के मुखार बिन्दु से अविरल बह रही गंगा में गोता लगाकर अपने जन्म-जन्मान्तर के पापों को भी नष्ट करते हैं। बीतरागियों, साधु-महात्माओं, संन्यासियों, मठाधीशों और शंकराचार्यों की मौजूदगी मेले को गरिमा देती है। महामंडलेश्वरों, संत-महात्माओं के अतिरिक्त अनेक कथावाचकों, मनीषियों के शिवरों में कथा, कीर्तन, प्रवचन आदि के कार्यक्रम होते है कई शिवरों में रामलीलाएं, रासलीलाएं भी होती हैं। कुंभ की भव्यता और मनमोहकता से आकृष्ट हो हजारों विदेशी पर्यटक इस अवसर पर विशेष रूप से आते हैं और कई तो सदा-सदा के लिए यहाँ की आध्यात्मिक रजकणों से अभिभूत हो अपनी भौतिक सम्पन्नता को त्याग कर भक्ति में लीन हो जाते हैं।

सामान्यतः कुम्भ का अर्थ ’घड़े’ से होता है परन्तु इसका तात्विक अर्थ कुछ और ही है। कुंभ हमारी संस्कृतियों का संगम है। कुंभ एक आध्यात्मिक चेतना, मानवता का प्रवाह एवं शाश्वत जीवन धारा है। भारतीय दर्शन में नदियाँ जल का प्रवाह मात्र नहीं हैं वरन् ये महा चैतन्य रूपी परमात्मा का शाश्वत प्रवाह है। उनका स्वरूप लोक माताओं  के रूप में पूज्यनीय माना गया है। भारतीय संस्कृति में गंगा नदी का प्रमुख स्थान है, जिसके तट पर प्रयाग में कुंभ का आयोजन होता है। वस्तुतः गंगा एक जीवन धारा है। ज्ञान वैराग्य और भक्ति का अमृत संगम में छिपा है जिसमें डुबकी लगाने से इंसान को जीते जी मोक्ष की प्राप्ति होती है। तभी तो कहा गया है-’’गंगे तव दर्शनात् मुक्तिः।’’

कुम्भ का यदि हम ऐतिहासिक दृष्टि से विश्लेषण करें तो हमें सनातन काल से मिलता है। कुंभ-पर्व का वेदों में उल्लेख मिलने से इसकी प्राचीनता का पता चलता है। ऋग्वेद (10-89-7), शुक्लयजुर्वेद (19-87), अथर्ववेद (4-34-7, 16-6-8 एवं 19-53-3) की ऋचाएं कुंभ पर्व पर पर्याप्त प्रकाश डालती है। सनातन आदि और अनादि है। इसी में समष्टि का बोध निहित है। इसी में हिन्दू संस्कृति, इसी में विश्व की संस्कृति एवं सभ्यताओं का संगम निहित है। यही कारण है कि विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृतियों में भी कुम्भ का उल्लेख एवं आकार हमें प्राप्त होता है। इतना विशाल पर्व एक दिन में तो होने नहीं लगता, शनैः-शनैः वह महान स्वरूप लेता है। कुछ ऐसा ही कुम्भ पर्व के बारे में हुआ होगा। 644 ईसवी में सम्राट हर्षवर्धन के कार्य काल में प्रयाग का यह महापर्व सर्वाधिक प्रकाश में आया, ऐसी मान्यता है। चीनी यात्री व्हेनसांग ने अपने यात्रा वृतांत का जिस प्रकार से उल्लेख किया है, उससे स्पष्ट है कि उस समय कुम्भ अथवा अर्द्धकुम्भ का ही समय रहा होगा। हर्षवर्धन द्वारा गंगा स्नान करके अपना सर्वस्व दान कर बहन राजश्री से वस्त्र मांग कर पहनने आदि जैसे वृतान्त प्रयाग के कुम्भ अथवा अर्द्धकुम्भ की ओर संकेत करते हैं। नवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा दसनामी अखाड़ों का गठन करने, कुम्भ, अर्द्धकुम्भ पर्वों की नींव डालने की बात भी उभर कर सामने आती है। आज भी अखाड़ों की मौजूदगी कुंभ को विशिष्टता प्रदान करती है। अखाड़े कुंभ मेले के सिरमौर माने जाते हैं। मेले में विभिन्न अखाड़ों के साधु, संत, महंत रेती पर धूनी रमाते हैं और वसंत पंचमी के शाही स्नानपर्व के बाद अखाड़ां के साथ ही श्रद्धालु भी विदा लेते हैं।

प्रयाग में संगम की रेती पर लगने वाला कुंभ मेला अनेक मायनों में अद्भुत और अतुलनीय है। इस पर बसने वाली तंबुओं की नगरी में देश और दुनिया से अनेक मत-मतांतर, भाषा-भाषी, रीति-रिवाज, संस्कार प्रथा-परंपरा के श्रद्धालु पुण्य और मोक्ष की कामना से जुटते और संगम में डुबकी लगाते हैं। कुम्भ पर्व अमृत स्नान और अमृतपान की कामना की बेला है। इस समय गंगा की धारा में अमृत का सतत् प्रवाह होता है। कुम्भ पर्व की मूल चेतना पुराणों में वर्णित है। यह पर्व क्षीरसागर के मंथनोपरान्त प्राप्त हुए अमृत कुंभ के लिए हुए देवासुर संग्राम से जुड़ा है। समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में सबसे अन्त में आयुवर्धिनी शक्ति वाले अमृत कुंभ को लेकर, आयुर्वेद के अधिष्ठाता भगवान धनवंतरि स्वयं प्रकट हुए। अमृतकुम्भ पाने की होड़ ने देव-दानव युद्ध का रूप ले लिया। देवताओं ने दैत्यों से छिपाने के लिए देवराज इन्द्र के पुत्र जंयत को अमृत कुंभ की रक्षा का दायित्व सांपा। इस दायित्व को पूरा करने में सूर्य, चन्द्र, गुरु और शनि भी सहायोगी बने। दैत्यों ने अमृत कुंभ को पाने के लिए दैत्यगुरू शुक्राचार्य के आदेश पर तीनों लोकों में जयंत का पीछा किया। यह युद्ध 12 दिनों तक चला। देवताओं का एक दिन मानवों के एक वर्ष के बराबर माना जाता है। इस दौरान ’अमृत कुंभ’ की रक्षा के क्रम में विश्राम के दौरान अमृत की बूंदें बारह स्थानों पर गिरीं । इन बारह स्थलों में से आठ पवित्र स्थान देवलोक में हैं और चार (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पृथ्वी पर हैं। ये चार स्थान ही अमृत की बूंदों के कारण कुंभ क्षेत्र बने। चूँकि इस अमृत कलश की रक्षा में सूर्य, चन्द्र, गुरु और शनि सहयोगी की भूमिका में थे, अतः कुंभ पर्व के दौरान उन्हीं स्थानों पर इनका दुर्लभ संयोग पड़ने पर कुम्भ पर्व मनाया जाता है। विष्णु याग के अनुसार-

                        माघे मेषगते जीवे, मकरे चन्द्रीभास्करौ।

अमावस्या तदा योगः कुम्भख्यस्तीर्थ नायके।।

अर्थात् माघ में वृहस्पति के मेष में होने तथा सूर्य और चन्द्रमा के मकर में होने पर अमावस्या को प्रयाग में कुंभ पर्व होता है।

मकर संक्रान्ति से लेकर वैशाख पूर्णिमा तक चलने वाले प्रयाग कुंभ पर्व में कुछ खास स्नान पर्व होते हैं और तीन शाही स्नान पर्व होते हैं- मकर संक्राति (प्रथम शाही स्नान), पौष पूर्णिमा, मौनी अमावस्या (द्वितीय शाही स्नान), वसंत पंचमी (तृतीय शाही स्नान), माघ पूर्णिमा, महाशिवरात्रि। विभिन्न अखाड़ों के साधु-संत कुम्भ स्थल में एकत्र होते हैं और प्रमुख स्नान पर्व पर वे एक शानदार शोभा यात्रा निकालते हुए पारम्परिक अनुशासन में बँधकर स्नान हेतु स्नान स्थल पर जाते हैं। इन अखाड़ों के प्रमुख महंतों की सवारी सोने-चाँदी तथा अन्य सजावट से सजे हाथी, भव्य रथों और पालकियों पर निकलती है, जिनके आगे-पीछे आकर्षक सज्जा से आच्छादित ऊँट, घोड़े, हाथी और बैंड भी होते हैं। इन्हें देखकर पुराने जमाने के राजा-महाराजाओं के काफिले का अक्स उभरकर सामने आता है।

कुंभ प्रयाग ही नहीं बल्कि संगम की रेती पर लगने वाला विश्व का सबसे बड़ा स्वतः स्फूर्त आयोजन है। कुंभ सिर्फ मानवीय आयोजन नहीं बल्कि एक दैवीय और आध्यात्मिक महोत्सव है। मीलों लंबे चौड़े क्षेत्र में कुंभ पर्व के दौरान जो वातावरण व्याप्त रहता है, वह महीनों और वर्षों में ढले स्वभाव को भी सहज ही बदलने में समर्थ है। यह भी इस अवसर को महत्वपूर्ण बनाता है। कुंभ ऐसा पर्व है जहाँ मानव का देव से सीधे साक्षात्कार होता है, शारीरिक-मानसिक व्याधियों से मुक्ति मिलती है। ग्रह-नक्षत्रों के सहयोग तथा गंगा और संतां पर उमड़ने वाली आस्था कुंभ रूपी सृष्टि जीवनदायी अमृत का बोध कराती है। न कोई दिखावा न आडंबर। अलग भाषा, अलग संस्कृति और अलग पहनावे के बावजूद कुंभ के समागम में सिमटती भावनाएं एक सी दिखती हैं। अनेकता में एकता का उदाहरण लिए प्रयाग कुंभ वाकई लघु भारत का एहसास कराता है। 

कृष्ण कुमार यादव,

निदेशक डाक सेवाएँ,

लखनऊ (मुख्यालय) परिक्षेत्र, उ.प्र.-226001

  ई-मेलः  kkyadav.t@gmail.com

लेखक परिचय :

कृष्ण कुमार यादव : भारत सरकार में निदेशक। प्रशासन के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लॉगिंग के क्षेत्र में भी प्रवृत्त। विभिन्न विधाओं में अब तक कुल 7 पुस्तकें प्रकाशित- - अभिलाषा (काव्य संग्रह-2005), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह-2006), इण्डिया पोस्ट : 150 ग्लोरियस इयर्ज (2006), अनुभूतियाँ और विमर्श (निबन्ध संग्रह- 2007), क्रान्ति यज्ञ : 1857-1947 की गाथा (संपादित, 2007), जंगल में क्रिकेट (बाल गीत संग्रह-2012), 16 आने 16 लोग (निबन्ध संग्रह-2014)।

देश-विदेश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और इंटरनेट पर वेब पत्रिकाओं व ब्लॉग पर रचनाओं का निरंतर प्रकाशन। शताधिक पुस्तकों / संकलनों  में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, जोधपुर व पोर्टब्लेयर (अंडमान-निकोबार द्वीप समूह) और दूरदर्शन से कविताएँ, वार्ता, साक्षात्कार का समय-समय पर प्रसारण। व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक "बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव" (सं0-दुर्गाचरण मिश्र, 2009) प्रकाशित।

उ.प्र. के मुख्यमंत्री द्वारा ’’अवध सम्मान’’, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केशरी नाथ त्रिपाठी द्वारा ’’साहित्य-सम्मान’’, छत्तीसगढ़ के राज्यपाल श्री शेखर दत्त द्वारा ’’विज्ञान परिषद शताब्दी सम्मान’’, परिकल्पना समूह द्वारा ’’दशक के श्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगर दम्पति’’सम्मान, अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, भूटान में ’’परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान’’, विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार द्वारा डॉक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की मानद उपाधि, भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’डॉ0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘ साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ”हिंदी भाषा भूषण”, वैदिक क्रांति परिषद, देहरादून द्वारा ‘’श्रीमती सरस्वती सिंहजी सम्मान‘’, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘, आगमन संस्था, दिल्ली द्वारा ‘‘दुष्यंत कुमार सम्मान‘‘, विश्व हिंदी साहित्य संस्थान, इलाहाबाद द्वारा ‘‘साहित्य गौरव‘‘ सम्मान, सहित विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु शताधिक सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त।

संपर्क : कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, लखनऊ (मुख्यालय) परिक्षेत्र, उ.प्र.-226001   ई-मेलः kkyadav.t@gmail.com

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