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चला वक़्त धरती चली चाँद-ओ-तारे खड़ा शख़्स पीछे जो है वह वहीँ था. देवेंद्र पाठक 'महरूम' की गज़लें


ग़ज़ल
नरपशुअन कै होडा -होड़ी.
देखें भौचक धनिया-होरी.

कौनो आपन छाती तानै;
कौनो ने धर बाँह सिकोड़ी.

मुस्टंडन के संगै पण्डा;
बैर भुलाय करैं गँठजोड़ी.

कौनो बारी कूद रहा हय;
कौनो ने मरजादा तोड़ी.

कौनो कमतर न कौनो से;
कोउ लखटकिया कोउ करोड़ी.

हँय कितनौ दल दल में दागी;
केहिका थामी,केहिका छोड़ी.

कौनो ना गरीब-गुरबा का;
केहि के ड्योढ़ी माथा फोड़ी.

रकत-माँस रहि गवा नाहिं तन;
ससुरि सियासत हाड़ चिंचोड़ी;

छाँड़ि चुनाव चकल्लस 'महरूम';
आपन भाँटा-मिरचा गोड़ी.


ग़ज़ल

कुछ नहीं सुनता वो अपनी ही कहे बहरा नहीं.
क्यूं दिलों पर ख़ौफ़ काबिज़ जब कोई पहरा नहीं.

पीठ-कंधा हो किसी घायल का या हो लाश पर
पाँव रख वो बढ़ गया आगे कभी ठहरा नहीं.

झिलमिलाता है यहाँ नज़रों में पानी चौतरफ
लू,जलन,सूखी हवा है पर कोई सहरा नहीं. 

छिलका-छिलका प्याज-सी उसकी समूची शख्सियत  

दरअसल उसका कोई इक तयशुदा चेहरा नहीं. 

डूब जाते हैं फिसलकर लोग इस तालाब में
सच है ये 'महरूम' कि पानी यहाँ गहरा नहीं.

*********************************************
ग़ज़ल


अब वह ज़मीन छोड़ चुका है उड़ान पर.
अरमां है उसका हुकूमते-आस्मान पर.

अपनी ज़ुबान पर लगाम तू लगा के रख
वो साधने लगा है तीर को कमान पर.

इस बार भी जो फिर से पायदान बना तू
चढ़ जायेगा शिकारी वही फिर मचान पर.

होना था क़द बुलंद जितना हो चुका उसका
अब गिर रहा है रोज़ वो अपने बयान पर.

कभी गाय,गंगा,जात-पाँत,कौम पर कभी
करते हैं सियासत शहादते-जवान पर.

ओहदों के रुतबे, रौबो-दाब,-ज़ुल्म आज भी
हैं ढा रहीं कुछ खुदगर्ज़ ख़्वाहिशें इंसान पर.

लुटती जो रोज़ अस्मतें उन पर कहोगे क्या
'महरूम' बोलो ख़ुदकुशी करते किसान पर.

ग़ज़ल
मुझे खुद से ज़्यादा जिस पर यकीं था.
मेरे ग़म में वह साथ मेरे नहीं था.

तलाशा किया ताउमर जिसको बाहर
मुझे ढूंढता मुझमें ही वह कहीं था.

ज़मीं-आस्मां,चाँद-सूरज हैं वैसे
मगर वैसा रुख अब हवा का नहीं था.

चला वक़्त धरती चली चाँद-ओ-तारे
खड़ा शख़्स पीछे जो है वह वहीँ था.

जिधर भी निगाहे-मुहब्बत से देखा
'महरूम' मंज़र उधर का हसीं था


आत्मपरिचय-देवेन्द्र कुमार पाठक
म.प्र. के कटनी जिले के गांव भुड़सा में 27 अगस्त 1956 को एक किसान परिवार में जन्म.शिक्षा-M.A.B.T.C. हिंदी शिक्षक पद से 2017 में सेवानिवृत्त. नाट्य लेखन को छोड़ कमोबेश सभी विधाओं में लिखा ......'महरूम' तखल्लुस से गज़लें भी कहते हैं....................
. 2 उपन्यास, ( विधर्मी,अदना सा आदमी ) 4 कहानी संग्रह,( मुहिम, मरी खाल : आखिरी ताल,धरम धरे को दण्ड,चनसुरिया का सुख ) 1-1 व्यंग्य,ग़ज़ल और गीत-नवगीत संग्रह,( दिल का मामला है, दुनिया नहीं अँधेरी होगी, ओढ़ने को आस्मां है ) एक संग्रह 'केंद्र में नवगीत' का संपादन. ......  ' वागर्थ', 'नया ज्ञानोदय', 'अक्षरपर्व', ' 'अन्यथा', ,'वीणा', 'कथन', 'नवनीत', 'अवकाश' ', 'शिखर वार्ता', 'हंस', 'भास्कर' आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित.आकाशवाणी,दूरदर्शन से प्रसारित. 'दुष्यंतकुमार पुरस्कार','पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पुरस्कार' आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित....... कमोबेश समूचा लेखन गांव-कस्बे के मजूर-किसानों  के जीवन की विसंगतियों,संघर्षों और सामाजिक,आर्थिक समस्याओं पर केंद्रित......
सम्पर्क-1315,साईंपुरम् कॉलोनी,रोशननगर,साइंस कॉलेज डाकघर,कटनी,कटनी,483501,म.प्र.  ईमेल-devendrakpathak.dp@gmail.com

ग़ज़लें 9049849786213352060

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