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लघुकथा - समय का कर्ज - शशि दीपक कपूर

(ऊपर का चित्र - सुरेन्द्र वर्मा की कलाकृति)

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‘तुम्हारे पिताजी क्या काम करते हैं?’

‘जी, मजदूर हैं मनरेगा में’

‘तुमने एम.बी.ए. की पढ़ाई कैसे की?”

‘सरजी, दिन-रात एक कर मेहनत करके’

‘ तब फिर, दूसरे लोग इस डिग्री को पाने के लिए मेहनत क्यों नहीं   करते?’

‘ सबकी अपनी आकांक्षाएं, महत्वाकांक्षाएं और परिस्थितियां होती हैं, वे उसी के अनुरूप चेष्टा करते हैं…’

‘ठीक है, हम आपको अपनी कंपनी में  शुरू में पांच हजार प्रति माह वेतन पर नौकरी दे सकते हैं, पर हमारी कंपनी को वर्ल्डवाइड पहचान बनाने में क्या क्या कर सकते हो ?’

‘जी सर, अपनी लग्न व मेहनत से आपकी आशा को पूर्ण करने की कोशिश करूंगा। आपसे निवेदन है कि इस मास वेतन एडवांस में दे दीजिये, क्योंकि मुझे अपनी पढ़ाई हेतु जो कर्ज लिया था उसकी पहली किश्त चुकानी है।’

‘यह लो पांच हजार रुपये एडवांस, मगर शर्त है कि तुम अब इस कंपनी की चारदीवारी से बाहर पूरे एक मास के बाद ही जाओगे। अपने माता-पिता, भाई-बंधु ,रिश्तेदारों व मित्रों सभी को सूचित कर दो, बाद में हम किसी झंझट में नहीं पड़ना चाहते…’

‘जी सर, अभी सूचना दे देता हूँ, धन्यवाद।’

‘आप सभी को प्रसन्नता होगी , मुझे इस कंपनी में पांच हजार प्रति माह की नौकरी प्राप्त हुई है । मुझे आप सबके सहयोग की अति आवश्यकता है। मैं आप सभी को इस कंपनी के संबंध में एक विज्ञापन बना कर आज ही भेज रहा हूं, इस विज्ञापन को यथाशीघ्र अपने अपने गांव, शहर, नगर, महानगर, विदेश आदि में रह रहे सगे संबंधी व मित्रों को अवश्य भेज दीजिएगा और वे भी इसी तरह से आगे यह संदेश भेज दें, , इस कष्ट के लिए मैं आप सभी से क्षमा चाहूंगा। आपके द्वारा इस कष्ट को मैं सदैव याद रखूंगा, यह कार्य संपन्न होते ही अपने पिता जी के मनरेगा में आठ घंटे काम करूंगा, उसके बाद का जो समय है उसे मैं अपने हिसाब से मनभर जीऊँगा। आपका हितैषी…’

           .. . शशि दीपक कपूर...

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