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लघुकथा - दुर्गा मेमसाब - डॉ. अंजु लता सिंह

(ऊपर का चित्र - डॉ. सुरेन्द्र वर्मा की कलाकृति)


दुर्गा  मेमसाब

मेरी दुर्गा मेमसाब  सचमुच बड़ी अच्छी हैं. मुझ नन्ही , मुलायम,रोएंदार भूरे  रंग की मासूम का नाम उन्होंने ही तो रखा है 'शेरनी'. भला अब कौन पालता है हमें. पर मेमसाब तो मुझे परछाई  की तरह साथ ही रखती हैं.

उनकी चित्रकला प्रदर्शनी ने दूर-दूर तक उन्हें जाना माना कलाकार बना दिया है अब तो पर हाय री किस्मत! राज बाबू ने

ऐसी भली, पढ़ी लिखी, सुंदर और  कुशाग्रबुद्धि बीवी को सालभर में ही अकेला छोड़ किसी ओर से नैन मटक्का कर लिया है.

हिम्मत वाली हैं मेरी मेमसाब खूब मेहनत करती हैं और मुझे बड़े ही जतन से रखती हैं.

जब भी यहां उनकी ड्रेसिंग  टेबुल के पास उनके रंग और ढेर से ब्रश देखती हूं तो इन अदना सी कूचियों के कारनामों पर मैं गर्व  से फूली नहीं समाती.

मेमसाब आजकल शेरनी की यह पेंटिंग बड़े जतन से बना रही हैं सुना है कहीं दुर्गोत्सव पर विशेष  मांग पर भेजनी है.

भगवान करे इस बार सबसे बड़ा  इनाम मिले मेमसाब को ...

दर्पण में तो मैं भी छोटी शेरनी लगती हूं...बस मैं अपनी दुर्गा मेमसाब  को पीठ पर बैठाकर राज बाबू जैसे असुरों का संहार करना चाहती हूं.

     दैव्य शक्ति का अहसास तो अब होना ही चाहिये असुरों को. जरूरी है धरती से इनका समूल नाश हो.

      ____


डा. अंजु लता सिंह

नई दिल्ली

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