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हास्य-व्यंग्य - मेरे उपन्यास की नायिका - दीपक गिरकर

मैं अपने लिखने-पढ़ने के कमरे में एक महारथी की आत्मकथा लिखने में तल्लीन था। मेरे घर की डोरबेल बजी। मेरी धर्मपत्नी ने दरवाजा खोला और वह आंगतुकों की ओर आश्चर्य से देखने लग गयी। उसने मेहमानों को आदरपूर्वक सोफे पर बिठाया और मेरे पास आकर मेरे कान में फुसफुसाई "आपके उपन्यास की नायिका आई है।” मैंने कहा "ठीक है, तुम उसे चाय-पानी के लिए पूछो, मैं दो मिनट में आता हूँ।"

हमारी श्रीमती फिर से हमारे कान में फुसफुसाई "आप समझ नहीं रहे हो। अरे आपका जो पिछले साल उपन्यास प्रकाशित हुआ था रामगढ़ की झबरी, उसी उपन्यास की नायिका आयी है और साथ में एक महिला भी है।" “अरे !” मैं बुरी तरह से चौक पड़ा। मैंने कहा "उपन्यास के पात्र तो काल्पनिक थे। ऐसा कैसे हो सकता है?” मैं बुरी तरह से घबरा गया था और बर्फीली सर्दी वाले दिन भी पसीने से तरबतर हो गया था। मैं डरते-डरते मेरी धर्मपत्नी के साथ ही ड्राइंग रूम में गया और मेरे उपन्यास की नायिका के साथ आयी महिला को नमस्कार किया। वह आगंतुक महिला कुछ बोलने के लिए अपना मुँह खोलती उसके पूर्व ही नायिका ने अपनी भूरी-चमकीली आँखों को गोल-गोल घुमाते हुए कहा " म्याऊं… म्याऊं…” नायिका के साथ आयी महिला ने अपना और नायिका का परिचय दिया।

“हम लोग रामगढ़ में रहते थे। रामगढ़ में पानी की टंकी के पास ही हमारा बंगला था। मैं गब्बर सिंह के परिवार से हूँ। मैं उनकी बहू हूँ। मेरे ससुर जी विनोदी स्वभाव के थे। उन्हें होली का त्यौहार बहुत पसंद था। वे हमेशा पूछते रहते थे होली कब है? होली कब है? वे अपने साथ हमेशा बन्दूक रखते थे। जिसकी आवाज से वे गाँव के बच्चों को सुलाने का काम करते थे और इसके बदले वे गाँव वालों से थोड़ा सा अनाज लेते थे। आपको तो मालूम है कि बच्चों को रात में सुलाना आसान काम नहीं है। रात में बच्चे अपने दादा-दादी से ढेरों कहानियां सुन लेते थे उसके बाद भी नहीं सोते थे। जब मेरे ससुर गाँव के बाहर बन्दूक से गोलिया दागते थे उन गोलियों की आवाज से ही बच्चे सोते थे। लेकिन गाँव के ठाकुर साहब को यह पसंद नहीं था और हमेशा मेरे ससुर के पीछे ही पड़े रहते थे।

क्या मालूम किस जन्म का बदला लिया था ठाकुर साहब ने मेरे ससुर से? पिछले वर्ष मेरे पति का देहांत हो गया। हमारे कोई संतान नहीं थी। मेरे पति ने इस स्वीटी को लगभग सात साल पहले मेरी गोद में लाकर डाला था, तब स्वीटी छोटी थी अब तो यह बड़ी हो गयी है लेकिन मेरे लिए तो स्वीटी अभी भी छोटी है। बच्चे कितने भी बड़े हो जाए वे माँ-बाप के लिए छोटे ही होते हैं। रामगढ़ की सारी प्रॉपर्टी बेचकर हम इसी शहर में शिफ्ट हो गए हैं। गिरकर जी, मैंने आपका उपन्यास रामगढ़ की झबरी पढ़ा था।

उपन्यास मुझे बहुत ही दिलचस्प और रोचक लगा। आजकल आप बड़े लेखक बन गए हो। बड़े व्यस्त रहने लगे हो। बड़े-बड़े लोगों की आत्मकथाएं लिख रहे हो। चलो अच्छा है। आत्मकथा लिखने में अच्छा पैसा मिल जाता है। उपन्यास में और अन्य किताबों में आजकल रॉयल्टी नहीं के बराबर मिलती है। आपके सारे फोन बंद आ रहे थे, इसलिए तो हमें आना पड़ा।” मैंने अपनी पत्नी को इशारा किया कि मेहमानों के लिए नाश्ते का बंदोबस्त करो। मेरी पत्नी जैसे ही रसोईघर की ओर जाने लगी, उस आगंतुक महिला ने कहा " भाभीजी, तकलीफ मत करना। मैं और स्वीटी आजकल डाइटिंग पर हैं और हम यहाँ से सीधे जीम जा रहे हैं। ” तभी स्वीटी गुर्राई " म्याऊं… म्याऊं…” वह महिला समझ गई और मेरी पत्नी से बोली स्वीटी थोड़ा सा दूध पीयेगी। पत्नी कुछ ही समय में लगभग दो लीटर मलाई वाला दूध तपेले में गुनगुना गर्म करके ले आयी और साथ में एक परात भी ले आयी।

परात को टी टेबल पर रखकर उसमें पूरा दूध उढेल कर टी टेबल स्वीटी के सामने रख दी। स्वीटी परात का सारा दूध चट कर गई और एक लम्बी डकार लेकर बोली “म्याऊं… स्वीटी को खुश देखकर वह महिला मेरी ओर मुखातिब हुई "गिरकर जी स्वीटी को यह अमूल का गोल्ड वाला दूध ही पसंद है।" मैंने कहा "जी मैडम और सुनाए।" मैडम ने अधिकारपूर्वक कहा "गिरकर जी आपको स्वीटी की आत्मकथा लिखनी पड़ेगी।" मैं चौक पड़ा। “स्वीटी की आत्मकथा ! स्वीटी की आत्मकथा मैं कैसे लिख पाउँगा?” मैडम बोली “मैं स्वीटी की भाषा समझती हूँ और स्वीटी मेरी। स्वीटी अपनी आत्मकथा सुनाती जायेगी, मैं उसका अनुवाद करके आपको बता दूँगी। फिर आपको लिखने में क्याँ तकलीफ है?”

मैंने कहा "जी अवश्य लिखूंगा।" जो मेरा हाथ का काम है उसे पूरा करने के बाद ही मैं स्वीटी की आत्मकथा पर काम करूंगा।" मैडम ने आदेश दिया "गिरकर जी हाथ का काम छोड़ों। सबसे पहले स्वीटी की आत्मकथा लिखकर पूरी करो उसके बाद ही दूसरा काम करोगे। और कल शाम को पांच बजे मेरे बंगले पर आकर मेरे से मिलो। यह मेरा आदेश नहीं, निवेदन है। मैं धीरे से बोला "जी मैडम।” मैडम ने अपना विजिटिंग कार्ड मेरे हाथ में थमाया और बोली अच्छा अब हम चलते हैं, हमें जीम जाने के लिए देरी हो रही है।

मैडम और स्वीटी जैसे ही हमारे घर के गेट से बाहर निकले उनकी गाडी के ड्राइवर ने बीएमडब्ल्यू गाडी का पिछला गेट खोला, स्वीटी ठसक के साथ मैडम की गोद में सर रखकर पिछली सीट पर पसर गई। हम पति-पत्नी दोनों ने मैडम और स्वीटी को बाय-बाय किया, मैडम ने ड्राइवर को इशारा किया और उनकी गाडी चल पड़ी।

जब तक गाडी हमारी नज़रों से ओझल नहीं हो गई तब तक हम मैडम और स्वीटी को हाथ हिलाकर बाय-बाय करते रहे।

दीपक गिरकर

व्यंग्यकार

28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,

इंदौर- 452016


मेल आईडी : deepakgirkar2016@gmail.com

व्यंग्य 1153208419809395366

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