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जन चेतना - ओम प्रकाश अत्रि की कविताएँ

१.कविता-- 'जन - चेतना'

राजनीति
हर घर की दहलीज़ पर
दस्तक देने लगी है,
प्रचार की चहल-पहल
गाँव-गाँव और
शहर-शहर में
होने लगी है।

बढ़ा-चढ़ा कर
भाषणों की ज़ुमले बाजी
भोली-भाली जनता
कुछ-कुछ समझने लगी है,
अब नहीं आएगी
बहकावे में यारों
वह सीधे
तु्म्हारे फेंके गए वादों से
आँखें मिलाने लगी है।

अब तक
ठगते रहे हो तुम
चिकनी-चुपड़ी बातों से
अब देश की जनता
तुम्हारी जु़बान की सत्यता
पहचानने लगी है,
नहीं कर सकोगे
उनके अरमानों पर राजनीति
उनको तुम्हारे अनीति की
भनक लग गयी है।

जवाब देगी
तुम्हारी करतूतियों का
और हाँ!
वह भी
तुम्हारे सियासी दांव पर
दांव मारने लगी है,
जनता
अपने अधिकार
अपनी अस्मिता को
अब बखूबी समझने लगी है।


२.कविता-- नज़ारा

स्टेशन पर
किसी तरुणी की
मुस्कान अच्छी
लगती है,
गुजरती हुई
गाड़ियों की
आवाज़ अच्छी लगती है।

व्यक्ति से
व्यक्ति की
पहचान अच्छी लगती है,
किसिम-किसिम
की बोलियों में
बात अच्छी लगती है।

प्लेटफार्म पर
घोंसलों में
बैठे हुए,
कबूतर की
गुटरगूं अच्छी लगती है,
पेड़ पर
बैठी हुई
गिलहरियों की
चिचियाहट अच्छी लगती है।

गुजरते हुए
यात्रियों की
चाल अच्छी लगती है,
चलती हुई
ट्रैन में ,
बैठे हुए बच्चे की
खिलखिलाहट अच्छी लगती है।

३.कविता-- वृक्ष की टेर

रखो न
मुझको प्यासा,
मेरे बिना
तेरा
जीवन निराशा ।

भिक्षुकों सा
जीवन बिताऊं,
ठण्डी- ठण्डी
छांव...
नित नया
जीवन दिलाऊं।

तेरे बिना
मेरा
जीवन विधूरा,
मैंने ही
तेरा
जीवन संवारा।

न काटो मुझे
मेरे विधाता,
न करो
मेरा तिरस्कृत
मै हूं
तेरा पुरस्कृत
मेरे प्राणदाता।

अरे!
थोड़ी दया कर
मेरी दीनता पर,
यही होगा
उचित
परिणाम
मेरे कुटुम्ब पर।

४. कविता- रिक्शा वाले

रिक्शा वाले रिक्शा चलाते
तीन सवारी लेकर चलते
जाम लगे या कड़ी धूप हो
कभी न अपना साहस खोते।

बड़ा मार्ग या संकरी गली हो
ऊबड़खाबड़ उजड़ी डगर हो
दिन भर वे चलते हैं रहते
तब जाकर वे रोटी पाते।

राह ताकते रहते हरदम
नहीं छोड़ते अपना दम- खम
मिले सवारी हर्षित होते
हंस-हंस कर उनको पहुंचाते।

गाली और मार वे खाते
दिन भर उल्टी बातें सुनते
किसी बात का ध्यान न करके
हर क्षण हर पल चलते जाते।

सर्दी गर्मी वर्षा हो भारी
ढोते हैं हर दिन की सवारी
पूछ-पूछ कर सभी पथिक से
कभी नहीं वे विचलित होते।

रोजी-रोटी के खातिर वे
धूल छानते हैं शहरों की
भीड़-भाड़ जितनी हो चाहे
अपना साधन वहाँ पहुंचाते।

रिक्शा वाले की यह गाथा
उसका जीवन उसकी आशा
थक कर भी वे नही हारते
गली-गली में चलते जाते।

५. कविता-- आजादी

तू कहाँ है
मैंने तुझको
बहुत ढूंढा
पर न मिली
मेरी प्यारी आजादी ।
हां एक बार
आयी थी,
मेरे सपनों के
बसेरे में
हाय! 
न जाने कौन
उसमें चिंगारी लगा दी
मेरे अरमानों
की राख
पूरे भूखण्ड में उड़ा दी।
मैं ढूंढता हूं
आज भी
किसान, मजदूर
और हर असहाय
के जीवन में
लेकिन क्या करुं,
लगता है तुमने
मेरे बलिदान की
बाते भुला दी।
कब आओगी
मेरे पास
अन्तरतम में
दीपक बनकर
प्रकाश करने,
तुम्हारी बाट जोहता हूं
हरेक सन में,
कब आओगी
मेरे जीवन का
उद्धार करने।
लगता है घनान्द की तरह
हमको भी
झेलना  पड़ेगा
तुम्हारे न आने का दर्द
मर जाना पड़ेगा
तुम्हारे विरह में
अरे हाँ !
मैं भूल गया था
बिल्कुल सुजान की
तरह है
मेरी आजादी ।

६. कविता-- 'रोटी की कीमत'

उससे क्या
पूछ रहे हो लाला?
उसका तो
सब है आला-आला
रोटी की कीमत
उससे पूछो लाला
जो खेत गोड़ते हुए
हो गया है काला-काला।
तपती हुई दोहरी में
प्यास लगी है उसको
चिलचिलाती धूप में
पानी मिला न उसको
सोचता है कि इतना
खेत गोड़ना है मुझको
पूरा काम नहीं किया मैंने
जो खेत रह गया गोड़ने में
तो शाम को रोटी का
पड़ जाएगा लाला
उससे क्या
उसका तो सब है आला-आला।

७.कविता-- 'विकास लिख रहा हूं'

सुलगते हुए
सत्य की
पीड़ा लिख रहा हूं
अध-पके
बच्चों की
क्रीड़ा लिख रहा हूं ।

एंड्राइड से
फैलती,
बीमारी लिख रहा हूं
बच्चों में
उपजते
मानसिक,
विकार लिख रहा हूं ।

कुछ गुप्त
न रहने की
बात लिख रहा हूं
बाप से अधिक
बेटे की,
होशियारी
लिख रहा हूं ।

बिगड़ते रिश्ते
पनपते
असंतोष की
घात लिख रहा हूं
देश में
हो रहा
विकास लिख रहा हूं ।

८. कविता-- 'कर्ज हूं मैं'

जन्मों से
तुम्हारे पुरखों
के द्वारा
लिया गया
ऋण हूं मैं,
तुम्हारे जीवन में
कुण्डली
मारकर बैठा
सांप हूं मैं।

तुम्हारे खेत
बीज
खाद
सिंचाई
के लिए
आता हूं ,
पर
सब कुछ
देकर,
हर लेने वाला
जुआ हूं मैं।

तुम्हारा
खून पीकर
हड्डियाँ सुखाकर
जीता हूं मैं,
एक बार
पास आकर
न जाने वाला
मेहमान हूं मैं।

न संभलने
देता हूं
जीवन भर
हर क्षण
चिंता में
जलाने वाली
आग हूं मैं,
आखिर
पीढ़ी दर पीढ़ी
चला आने वाला
कर्ज हूं मैं।

९. कविता-- 'पूंजी का असर'

उर्वर है
जमीन उनकी
जो
बिना मशक्कत के
रुपया
उगाते हैं,
भूख से
मरते हैं
वे लोग
जो
दिन-रात
काम में
जीवन खपाते हैं।

नसीब में
होता है उनके
फाइव स्टार
होटल का भोजन,
एक वे हैं
जो
जीवन भर
रोटी के
चक्कर में
श्रम को बेचते हैं।

उनके पास
रहने के लिए
हरेक शहरों में
बड़ी-बड़ी कोठियां हैं,
एक वर्ग
ऐसा है
जिनके पास
घर सिर्फ
रोड की फुटपाथ
और
नाले के किनारे
बनी खोलियां हैं।

मनुष्य तो
दोनों हैं
पर एक
पूंजी पति है,
दूसरा
उनके पूंजी के नीचे
दबकर
हुआ अधमरा है।

धन से सम्पन्न
लोगों से
बड़े से बड़े
सत्ताधारी लोग
मिलकर चलते हैं,
एक
वे लोग हैं
जो काम करते-करते
सड़कों
नालों
खदानों में
फंस कर मरते हैं।

१०. कविता-- 'मौसमी हवा'

हवा भी
रुख देखकर
बहती है
मौसम के साथ,
जाड़े में सर्द
गर्मी में गरम
झूम कर नाचती है
बरखा में
पानी के साथ।

बसन्त में
मादकता से भरी
हरेक फूलों पर
मंड़राती
भंवरों के साथ,
नई-नई कलियों को
उकसाती
हंसने को
कोपलों को देखकर
मुस्काती
वृक्षों के साथ।

खेतों से
इठलाती
गेहूँ से बतलाती
सरसों से लजाती
फूलों के साथ,
पकड़कर
मटर को
जोर से हिलाती
फलियों के साथ।

नदी में
जाकर
पानी से मिलकर
थपाथप मचाती
लहरों के साथ,
खेतों में
काम करते
लोगों के
पसीने को सुखाती
झकोरों के साथ।

पंखों पर
बैठकर
गाँव-गाँव घूमती
परिंदों के साथ,
पुराने
छप्पर पर चढ़कर
खेलती
उसपर बिछे
फूस को
उड़ाती
थपेड़ों के साथ ।

- ओम प्रकाश अत्रि
शिक्षा - नेट/जेआरएफ(हिन्दी प्रतिष्ठा ),शोध छात्र विश्व भारती शान्तिनिकेतन (प.बंगाल )
पता- ग्राम -गुलालपुरवा,पोस्ट-बहादुरगंज, जिला- सीतापुर (उत्तर प्रदेश)

ईमेल आईडी- opji2018@gmail.com

कविता 8835354123524956778

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