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नचाए सबको पैसा (लघुकथा) -सुरेश सौरभ

नचाए सबको पैसा (लघुकथा)

     "भाई साहब कल आप बीजेपी की रैली में थे परसो सपा की रैली में थे। आज बसपा के जुलूस में जा रहे हैं.  क्या बात है, आप रहते  कहॉ हैं?
  'अरे यार हम लोग धंधे वाले लोग हैं, इसलिए एक ठिकाना कहॉ-जहॉ पैसा  मिलता है, उसकी टोपी लगा लेते हैं. उसका बैनर लगा लेतें हैं, पैसा बोलता है भाई । नचाता है। इसलिए मैं नाच रहा हूं । मेरे साथ तमाम नाच रहे हैं । तुम्हें नाचना हो तो तुम भी आ जाओ।" यह कहते- कहते वह आगे बढ़ गया। मैं ठगा सा उसे ताकता रह गया।
   

लेखक-सुरेश सौरभ
निर्मल नगर लखीमपुर खीरी पिन-२६२७०१
कापीराइट -लेखक

लघुकथा 5178953200772701636

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