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इश्क मरने का तसव्वुर तो नहीं, ज़ख़्म गहरे हैं समन्दर तो नहीं। तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें


-एक-

आज का इंसान जब भी लौटकर घर आता है,

टूटा बदन, हारा-थका विश्वास लेकर आता है।

​​

कि धर्म की मीनार पर बैठा समूचा आदमी,

बौना तो बौना, दरअसल शैतान नजर आता है।

​​

कि पीते-पीते ता-उमर दस्तूर का मिथ्या गरल,

आदमी तो आदमी, दस्तूर तक मर जाता है।

​​

देखकर वादों की माला मालिकों के हाथ में,

भुखमरी की माँग में सिन्दूर सा भर जाता है।

​​

हादसों के शहर में न ‘तेज’ इतना मुस्करा, कि

देखकर सहसा हँसी यहाँ आदमी डर जाता है।

​​

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-दो-

इश्क मरने का तसव्वुर तो नहीं,

ज़ख़्म गहरे हैं समन्दर तो नहीं।

​​

हमने जाना कि लोग दुनिया के,

बहुत जालिम हैं सिकंदर तो नहीं।

​​

उनके आने का इंतिजार तो है,

उनकी राहों में मिरा सिर तो नहीं।

​​

वो जो बैठा है मेरी चौखट पे,

माना अपना है मुंतजिर तो नहीं।

​​

इश्कबाजी में ख़ाक होने का,

रंज बेशक है तहस्सुर तो नहीं।

​​

कि बातों- बातों में सिमट जाएगा,

’तेज’ इतना भी मुख़्तसर तो नहीं।

​​

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-तीन-

सत्तासीन मग़रूर हो गये,

बन्दर अब लंगूर हो गये।

​​

थके पाँव टूटी राहों पर,

चलने को मजबूर हो गये।

​​

नई सभ्यता के आँगन में,

अस्त-व्यस्त दस्तूर हो गये।

​​

गाँव और शहरों के रस्ते,

एक दूजे से दूर हो गये।

​​

‘तेज’ बदलते युग में दंगे,

मानव को मंजूर हो गये।

​​

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-चार-

उनके घर में भी आज पत्थर हैं,

जिनके अपने भी काँच के घर हैं।

​​

जिनके पापों का सफर लम्बा है,

उनके कन्धों पे आज भी सिर हैं।

​​

फूल पूजा के सुगन्धित है मगर,

खुशबू - खुशबू में पगे ख़ंजर हैं।

​​

जब भी लिखते हैं खून लिखते हैं,

कि लोग दुनिया के बड़े शातिर हैं।

​​

सहरा - सहरा में ‘तेज’ चर्चा है,

बस्ती - बस्ती में घने बंजर हैं।

​​

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-पांच-

अनुबन्धों सा टूट रहा मैं,

हक अपनों का लूट रहा मैं।

​​

विज्ञानी होकर भी नाहक,

ठंडा लोहा कूट रहा मैं।

​​

काल-चक्र की शुष्क धरा पर,

रोज बमों सा फूट रहा मैं।

​​

नित्य बदलते गतिमानों में,

हर पल पीछे छूट रहा मैं।

​​

शतरंजी चालों के जरिए,

’तेज’ हुकूमत लूट रहा मैं।

​​

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-छ:-

उँगलियां इज़्जत पे उठें तो कहना,

प्रश्न जो अस्मत के उठें तो कहना।

​​

मैं फ़क़त प्यासा हूँ तेरी खुशबू का,

होंठ जो होंठों से सटें तो कहना।

​​

मन से मन को ही मिला रहने दो,

दूरियां बिस्तर की घटें तो कहना।

​​

अभी अश्क आँखों में बहुत बाकी हैं

यदि प्रश्न रोने के उठें तो कहना।

​​

तन्हा - तन्हा यूँ चलोगे, कब तक,

बात जो रहबर की उठें तो कहना।

​​

<><><>

-सात-

लगा रहे खुद अपनी बोली अब्बाजान,

कि बना रहे बंजर में खोली अब्बाजान।

​​

देख - देखकर हैरत भी है, गैरत भी,

कि खेल रहे सावन में होली अब्बाजान।

​​

बाल हुए हैं गोरे कुछ तो शरम करो,

लड़की इक धीरे से बोली अब्बाजान।

​​

कि नए दौर का उनपर ऐसा रंग चढ़ा,

सिला रहे बीवी को चोली को अब्बाजान।

​​

रफ़्ता - रफ़्ता ‘तेज’ कैंचुली उतरेगी,

किस्मत बहुत पुरानी होली अब्बाजान।

​​

<><><>

-आठ-

रौशनी तारीकियों में खोजिए,

ख़ामुशी आबादियों में खोजिए।

​​

आजकल जिन्दादिली के मायने,

वक्त की नाकामियों में खोजिए।

​​

ज़िन्दगी का अर्थ मोटे तौर पर,

मौत की बारीकियों में खोजिए।

​​

बस्तियों की भीड़ है हरसू यहाँ,

घर मगर वीरानियों में खोजिए।

​​

‘तेज’ सावन की घटा की पुरनमी,

धूप की चिंगारियों में खोजिए।

​​

<><><>

-नौ-

साख़ वतन की बढ़ा रहा मैं.

के रोज कबूतर उड़ा रहा मैं।

​​

बेशक इंसानी रिश्तों को,

नित सूली पर चढ़ा रहा मैं।

​​

समय बहुत तेजी से गुजरा,

भाग न पाया खड़ा रहा मैं।

​​

कुछ सत्ता-सुख रहे भोगते,

सीमाओं पर अड़ा रहा मैं।

​​

आयातित शब्दों की गरिमा,

नित संसद में बढ़ा रहा मैं।

​​

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-दस-

पग-पग प्रेम लुटाना सीख,

गाना और बजाना सीख।

​​

इक-दूजे से मिल रहने को,

जीवन-ज्योति जलाना सीख।

​​

कि तू-तू मैं-मैं की पीड़ा से,

खुद को सदा बचाना सीख।

​​

क़दम-क़दम पर मानवता के,

हरियल पेड़ लगाना सीख।

​​

पढ़ना-लिखना एक बात है,

पढ़कर नीड़ बनाना सीख।

​​

<><><>

( ‘ट्रैफिक जाम है’ (ग़ज़ल संग्रह) से प्रस्तुत)

तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय।

​​

तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं।

​​

स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं।

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सामाजिक/नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।

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आजकल आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं।

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सम्पर्क  : E-mail — tejpaltej@gmail.com

ग़ज़लें 1729650663202412704

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