लघु कहानी - गन्ना - एस एन वर्मा

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हरीराम पुरबिया किसान हैं धरम और मरजाद उनके जीवन के दो पहिये हैं। वे उत्तर प्रदेश के दूसरे किसानों की तरह हमेशा साहस की अपेक्षा लिए हुए जीते ...

हरीराम पुरबिया किसान हैं धरम और मरजाद उनके जीवन के दो पहिये हैं। वे उत्तर प्रदेश के दूसरे किसानों की तरह हमेशा साहस की अपेक्षा लिए हुए जीते हैं । उनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि रहा है। गेहूं ,धान, गन्ना, सरसो, मटर ,चना,बाजरा, मक्का आदि प्रमुख फसलें हैं जिन्हें वे उगाते है। इन फसलों में गन्ना की खेती उन्हें इसलिये प्रिय है क्योंकि इससे मीठा गुड़ मिलता है। अन्य की अपेक्षा यह फसल प्राकृतिक आपदाओं को भी आसानी से झेल लेती है। आंधी तूफान, बारिश में गिर कर खड़े होने का सामर्थ्य रखती है। स्यार कुछ नुकसान पहुंचा सकता है। अन्य जानवर इस फसल को आश्रय स्थल मानते है। यह प्रतिरक्षा फसल के बड़े होने पर ही हासिल होती है। बचपन तो इसका भी नाजुक होता है। किसान नाइट्रोजन फिक्सेशन तो नहीं जानता लेकिन यह सुनिश्चित करता है कि मटर के खेत में ही गन्ना बोया जाय। अच्छी तरह खेत तैयार कर नीम की खली से सुरक्षित करता है। सरकार हाल में ही खोजी गयी नीम कोटेड यूरिया पर अपनी पीठ थपथपा रही। गन्ने को बीज रूप देने के टुकड़े बनाने होते हैं फिर उसके लिये' बोह 'की व्यवस्था करनी होती है। इसके पहले खेत की माप के अनुसार 'पूरी' की गणना कितनी सटीक होती है। हल को 'कान' रूप देकर गहरी नाली बनाई जाती है उसमें गांव के बच्चे सामूहिक बुवाई करते हैं। पैरों से हर टुकड़े को दबाते हुए। गन्ना अधिक सिंचाई और गुड़ाई की मांग करता है। कहा जाता है कि "तीन सिंचाई तेरह गोड़। तब देखो गन्ने का पोड़"। मतलब सिंचाई और गुड़ाई ठीक होने पर ही गन्ने के पोड़ बढ़ते हैं। सिंचाई उस समय जब गर्मी के मौसम में लू चल रही होती है। इस समय पीने का पानी ही दुर्लभ हो जाता है फिर सिंचाई तो कितनी कठिन होगी । इसका अंदाज लगाना भी कठिन है। आज की तरह ट्यूब बेल और नहर का पानी भी उपलब्ध नहीं था।

हरी राम के साहस की परीक्षा इसी पानी की व्यवस्था में होती थी। उस समय उपलब्ध सिंचाई के साधन में गर्रा,पुढ,रहट, ढेकुली, दुबला और कुछ स्थानों पर पहुंचने वाली अनियतकालीन नहर थी। गर्रा ,पुढ ,रहट आदि कुएँ से जल निकालने के उपक्रम थे तो ढेकुली दुबला आदि तालाब के पानी को खेत तक पहुंचाने के। गर्रा में पानी भरने के लिये चमड़े की मोट का प्रयोग होता था। 25 से 50 लीटर पानी की क्षमता वाला मोट एक मजबूत रस्सी से खींचा जाता था। रस्सी खींचने का काम आदमी करते थे जो संख्या में पांच से अधिक होते थे। सीने पर लकड़ी का डांड रखकर पौदरि पर चलते हुए खींचना होता था। एक आदमी सबको कंट्रोल करता था वही मोट के ऊपर आने और आदमियों को लौटने का संकेत करता था। एक आदमी मोट टेकने का काम करता था वही पानी की खेत की ओर जाने वाले ओढान में गिरा देता था। जेठ की दोपहरी में आधा पानी वाष्प बनकर उड़ने के बाद भी गन्ना का खेत सींच दिया जाता था। पुढ में मोट खींचने का काम बैलो से लिया जाता था। शेष हांकने वाले और टेकने वाले उसी तरह काम करते थे। रहट भी बैलों से चलाया जाता था। जिसमें पानी के छोटे छोटे डिब्बे एक लड़ी में पिरोये जाते थे। इन्हें लीवर से जोड़कर ऊपर नीचे चलाया जाता था। ऊपर मुड़ते समय पानी ओडान में गिर जाता था और खाली डिब्बे नीचे जल भरने चले जाते थे। ढेकुली और दुबला भी मानव चालित थे। टोकरी से भरा पानी निकालने वाले 2 या 4 के समूह में काम करते थे। कुछ अंतराल जिसे ओहार कहा जाता था,के बाद समूह बदल जाते थे। लाग डॉट की भाषा 'मार लिया, जीत लिया' का प्रयोग होता था, जिससे उत्साह बढ़ जाता था। कार्यस्थल पर ही मट्ठा ,चबैना,चिलम, हुक्का, फसली चीज रखी मिलती थी। गीत ,किस्से ,कहानी, दोस्ती दुश्मनी की चर्चा माहौल को बोझिल नहीं होने देती थी। खेत के 'हो'जाने को विजय माना जाता था।

गन्ने की खेती की दूसरी बड़ी कयावद कुदाल से गुड़ाई करनी होती थी। सारा मोथा ,दूब निकल जाये लेकिन डाभी कटने न पाए। यह कुशलता सबके बश में नहीं थी। भरी दुपहरी में पूरी आस्तीन के वस्त्र पहनकर ,पैर में धोती लपेटकर काम करना गन्ने से हाथ पैर छिलने से रोकता था। हरीराम के इन कामों के साथ "भेड़ दोबाई"का काम ज्यादा महत्त्व रखता था। इससे खेत में नत्रजन ,पोटाश आदि उर्वरकों की भरपूर मात्रा उपलब्ध हो जाती थी। जब फसल छोटी ही रहती थी तो वे पड़ोस के गाँव में भेड़ रखने वाले गड़रिये से कह आते थे। समय मिलते ही वह अपनी सारी भेद 200 से अधिक लेकर आ जाता था। भेड़ें रात में गन्ने के खेत में ही रहती,उनके मल मूत्र से खाद बनती रहती थी। चारों तरफ खूंटा गाड़कर और रस्सी से घेरा बनाकर गडरिया उन्हें सुरक्षित रखता और वही सोता था। चांदनी रात में दृश्य और भी सुंदर बन जाया करता था। पूरे खेत को उपजाऊ बनाने तक चक्रानुक्रम चलता था। दिन में वह उन्हें जंगल में चरने के लिए ले जाया जाता था। उनके सद्य:जात बच्चों को हरीराम के घर के सामने पेड़ की छाया में खांची से ढक दिया जाता था। यह बड़ा टोकरा बांस से बना होता था। छोटे बच्चों का मिमियाना आदमी के छोटे बच्चों को मनोरंजन का साधन लगता था। शाम को इन बच्चों को झुंड में शामिल कर दिया जाता था। दस से पंद्रह

दिन में खेत" बन" जाता था। भेड़ के मालिक को मजदूरी के रूप में तय अनाज दे दिया जाता था। जैविक खाद का ऐसा सुंदर प्रयोग अब कहाँ होता है।

बरसात के बाद और जाड़े के आरम्भ होने तक इस खेत में विशेष काम नहीं होता था। इसी समय स्यारों और मूषों का थोड़ा आतंक होता था। हरी राम इसे अच्छी तरह रोक लेते थे। खिचड़ी के बाद पेराई आरम्भ होती थी पुनः मेहनत वाला काम आ जाता था। गन्ना की कटाई भी आसान नहीं थी। पेड़ी रखने के लिए नए अङ्कुर को बचाना पड़ता था। फिर छप्पर बनाने के पत्ती को संजोना पड़ता। गन्ने की जड़ साफ करना भी महान उपक्रम था। इस प्रकार साफ गन्ना बोझ में बंधकर कोल्हू के पास पहुंचता। सैका ,नाद ,छन्न आदि साफकर पेराई हो। 4 से 8 बाल्टी तैयार होने पर 'गुलौर' पर चढ़ाया जाता था। दो बड़े कड़ाह में खौलते हुए रस से गुड़ बनने में 2 घंटे का समय लगता था। गाढ़े रस में 'गुरदा 'चलाना कौशल मांगता था। पकने की पहचान के लिये' गोली 'ली जाती थी। गोली 'गोल' तो गुड़ तैयार। अब इसे तामी से निकाल कर दूसरे मिट्टी या लकड़ी के पात्र में डाला जाता,जिसे 'चकरा 'कहा जाता था। उधर कराह में नया रस पड़ते ही 'चिंगा 'तैयार। जिसके स्वाद का मोल नहीं हो सकता था। उसका कोई विकल्प अभी तक नहीं दिखता। चकरा में 'दबिला' से मथाई और खुरपा से खुदाई बहुत तकनीकी काम लगता। थोड़ा ठंडा होने पर 'भेली ''तैयार होती थी। इसी भेली के सुंदर और दानेदार होने के लिये हरीराम ने वर्ष भर मेहनत की थी।

किसान जीवन एकरस और एकांतिक नहीं होता,लेकिन बाजारवाद विमूढ़ बना देता है। हरी राम भेली की मिठाई में भी मिर्च जैसी तितायी महसूस करता है और गन्ने की खेती छोड़ चीनी खरीदने का उपक्रम करने लगता है।

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