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लघुकथा - एक पथ दो काज - शशि दीपक कपूर

एक पथ दो काज

“चलो, चलो, जल्दी चलो, वहां गली के मंदिर में  कुछ सेठ लोग फ्री में बांट रहे हैं”

“मम्मी ! मुझे नहीं जाना।”

“क्यों”

“ये लोग हमारे पापा की तन्ख्वाह क्यों नहीं बढ़ा देते?”

“छोड़ ये सब बातें, चल जल्दी चल , दो तीन टिफिन साथ में ले ले।

पापा के लिए उसमें खाना लेते आऐंगे।”

“और सुन, तू पेट भर के खाना, मैं भी...। मैं रात को खाना नहीं बनाऊँगी।

“अगर बच गया तो कल का दिन भी निकल जाएगा।”’

"क्या ?... मम्मी ...वैसे नहीं तो ऐसे सही ! "

...शशि दीपक कपूर...(मौलिक व स्वरचित)

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