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‘‘भारतीय संस्कृति में गो रक्षा’’ - श्रीमती डॉ. शारदा नरेन्द्र मेहता

‘‘भारतीय संस्कृति में गो रक्षा’’


                                                      श्रीमती डॉ. शारदा नरेन्द्र मेहता
                                                                              (एम.ए. संस्कृत)
गाय को हमारी संस्कृति में जननी से भी उच्च पद प्राप्त है। गाय का हमारे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। गाय के दर्शन मात्र शुभ सूचक हैं। गाय के शरीर में तैंतीस करोड़ देवताओं का निवास हमारे धार्मिक ग्रन्थ प्रतिपादित करते हैं। गाय से प्राप्त पाँच वस्तुओं को पंचगव्य कहा जाता है। पंचगव्य के अन्तर्गत दूध, दही, घी, गोबर तथा गौमूत्र ये पाँच वस्तुएँ मानी जाती हैं। हमारी संस्कृति की प्रत्येक पूजन विधि में पंचगव्य का प्रमुख स्थान है। इनके बिना पूजन सामग्री अपूर्ण है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में पंचगव्य का महत्वपूर्ण स्थान है। गोमूत्र से कैंसर जैसी प्राणघातक व्याधि भी ठीक की जा सकती है।
         सनातन धर्म में प्रत्येक भारतीय घर में बनने वाली प्रथम रोटी गाय माता को अर्पित की जाती है। यह परम्परा आज भी बड़ी श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक निभाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि गाय को दी जाने वाली यह रोटी तैंतीस करोड़ देवताओं द्वारा स्वीकार की जाती है। रोटी को सीधे गाय के मुँह में ही दी जाती है। जमीन पर या नीचे डालकर रोटी देना अनुचित माना जाता है। रोटी देकर गाय के मस्तक या पीठ पर हाथ लगाकर वन्दन किया जाता है।
                             ज्योतिषीय महत्व
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार विभिन्न ग्रहों की शान्ति भी गाय को रोटी देने से स्वतः ही हो जाती है। गाय की रोटी पर गुड़ रखकर गाय को खिलाने से मंगल ग्रह की शान्ति होती है, चने की दाल के साथ रोटी खिलाने से गुरू ग्रह प्रबल होता है। कन्या के विवाह में यदि देरी हो रही हो तो भी विवाह शीघ्र हो जाता है। गाय को रोटी के साथ थोड़ा सा नमक खिलाना भी ज्योतिषीय विधान है। जब भी व्यक्ति संकट में होता है तो गाय अपने नमक का कर्ज अवश्य चुकाती है। गाय का आशीर्वाद हमेशा फलीभूत होता है। गाय को रोटी देने से केतु ग्रह की शान्ति होती है।
नकारात्मकता का अंत -
प्राचीन समय में घर कच्चे होते थे। कच्चे घरों को गोबर और पीली मिट्टी से लीपा जाता था। इससे घर पवित्र हो जाता था। आधुनिक समय में घरों में पोछे के पानी में फिनाइल, कपूर,नमक आदि डालकर घरों को स्वच्छ बनाया जाता है। नमक से नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है। गोबर,गोमूत्र और गाय के घी के दीपक नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में सहायक हैं। आज भी रक्षाबन्धन के समय सामूहिक यज्ञोपवीत बदलवाने के कार्यक्रम में पंडितगण गोमूत्र तथा गोबर का उपयोग करते हैं। शुभकार्य में यज्ञ आदि की वेदी के निर्माण में आज भी लीपन कार्य में गोबर का उपयोग किया जाता है। योग गुरू बाबा रामदेव द्वारा गोमूत्र को दुकानों पर औषधि के रूप में उपलब्ध करवाया जा रहा है। विदेशों में गौ उत्पादों ने धूम मचा रखी है। गाय के दूध, दही, घी, शहद और शकर के मिश्रण से पंचामृत बनाया जाता है जो पूजन में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
                 
    


                         
ग्रामीण अर्थव्यवस्था की प्रमुख धुरी -

प्राचीन समय में गाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की प्रमुख केंद्रबिन्दु रही है। हमारा देश कृषिप्रधान देश रहा है। जब मशीनीकरण का युग नहीं था बैल-आधारित कृषिकार्य होता था। गोबर से उपले व खाद बनाया जाता था। ग्रामीणजन की प्रमुख सम्पदा गाय थी। जिस व्यक्ति के पास जितनी अधिक गाय होती थी उसे उतना ही अधिक सम्पन्न समझा जाता था। भगवान कृष्ण स्वयं अगणित गायों को जंगल में चराने ले जाते थे। प्रमुख गुरूओं के आश्रमों में गौ-धन सुरक्षित रहता था।


           मनुष्य की मृत्युपूर्व गाय का दान देने की हमारे देश में परम्परा रही है। ऐसी मान्यता है कि यदि गाय के कान में कोई बात कह दी जाए तो वह मनोकामना शीघ्र ही पूर्ण हो जाती है। समुद्र मंथन में निकलने वाले चौदह रत्नों में कामधेनु नामक गाय देवताओं को प्राप्त हुई थी। कथन है कि वह अपने भक्तों की सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति करती थी। हमारी संस्कृति में आज भी गाय को कामधेनु के समान मानकर ही पूजा जाता है। प्रतिदिन देवताओं के प्रसाद स्वरूप उसको एक रोटी प्रदान की जाती है।


              आधुनिक महिला समाज आज भी गाय को किसी न किसी रूप में अन्न देती ही है। मैंने कई सेवारत महिलाओं को प्रत्यक्षरूप से देखा है कि वे अपने वाहन में गाय तथा कुŸो की एक-एक रोटी रख लेती हैं और जहाँ भी उन्हें गाय एवं कुत्ता मिल जाता है तो वे श्रद्धा सहित रोटी अर्पित कर देती है। यही है सच्ची गौ-सेवा कुछ महिलाएँ यदि उनकी कॉलोनी के पास गौशाला या गाय पालने वाले घर हैं तो वहाँ रोटी प्रदान कर देती हैं। कई मन्दिरों एवं संतों के आश्रमों में गोशालाएँ होती हैं। श्रेष्ठी वर्ग तथा धनाढ्य वर्ग वहाँ पर गौ के निमित्त वर्षभर का राशन या धन का दान कर गाय-सेवा का पुण्य अर्जन करते हैं। हमारे भारत में गौ सेवा  संस्कृति को जीवन्त बनाये रखने की ललक आज भी बनी हुई है और इसीलिए मानवता विद्यमान है।


        गाय के लिए महान ऋषि-मुनियों में प्राचीन समय में युद्ध हो चुके हैं। कई कथाओं में से प्रचलित एक कथा प्रसंग यहाँ प्रस्तुत है। ऋषि जमदग्नि के पास देव राज इन्द्र द्वारा प्रदŸा एक गाय थी। वह दिव्यगुणों से युक्त थी। इसका नाम कामधेनु था। एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी संपूर्ण सेना के साथ जमदग्नि के आश्रम में पधारे। आश्रम साधारण था, परन्तु जमदग्नि (परशुराम के पिताजी) ने सहस्त्रार्जुन की सेवा भलीप्रकार से की। सभी अतिथियों के लिए भोजन तथा ठहराने की उचित व्यवस्था की। सहस्त्रार्जुन को यह सब देखकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने कामधेनु गाय का चमत्कार देख लिया। उन्होंने (सहस्त्रार्जुन ने ) जमदग्नि से गाय माँग ली। परन्तु जमदग्नि ने इस कार्य में अपनी असमर्थता प्रकट की। उन्होंने कामधेनु को आश्रम प्रबन्धन का एकमात्र सहारा बतलाया। राजा सहस्त्रार्जुन क्रोधित हो गये। उन्होंने आश्रम को उजाड़ दिया और गाय कामधेनु के ले जाने लगे। गाय उनके हाथ से छूट कर स्वर्ग में चली गई। कुछ समय बाद परशुराम जी अपने पिताजी के पास आश्रम में आये तो वहाँ उजड़ा हुआ आश्रम तथा कामधेनु को न पाकर क्रोधित हुए।


माता रेणुका ने पुत्र परशुराम जी को सम्पूर्ण वृŸान्त कह सुनाया। परशुरामजी ने निश्चित किया कि वे सहस्त्रार्जुन तथा उसकी सेना का नाश करेंगे। परशुरामजी तथा सहस्त्रार्जुन के मध्य युद्ध हुआ। परशुराम जी ने सहस्त्रार्जुन का वध कर दिया। वध करने के पश्चात वे अपने पिता जमदग्नि के पास गये। जमदग्नि ने बेटे से कहा कि तुमने राजा का वध किया, अतः तुम तीर्थयात्रा पर जाओ। जब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों को इस घटना का पता लगा तो वे जमदग्नि के आश्रम में पहुँचे वहाँ उनकी माता रेणुका भी थीं। सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने तपस्यारत जमदग्नि का सिर काट दिया और माता रेणुका की ओर मारने दौड़े। माता ने अपने पुत्र परशुराम को पुकारा वे तीर्थाटन पर थे। उन्होंने माता की आवाज सुनी और दौड़े चले आये। उन्होंने अपने पिता जमदग्नि का शरीर भाइयों को सौंपा और स्वयं सहस्त्रार्जुन के शेष पुत्रों से युद्ध करने लगे। युद्ध में वे पुत्र मारे गये। जमदग्नि के मृत शरीर को कुरूक्षेत्र में ले जाकर उनके मृत शरीर से अलग हुए सिर को जोड़ दिया। इस प्रकार जमदग्नि जीवित हो उठे।


       उपर्युक्त प्रसंग से हमें ज्ञात होता है कि महान ऋषि मुनियों के आश्रम में गोपालन - गोसेवा का श्रेष्ठ कार्य माना जाता था और बड़े-बड़े राजा-महाराजा ऐसी गायों को अपने राज प्रासाद में ले जाकर उसकी श्रीवृद्धि करना चाहते थे। वर्तमान समय में भी अनेकों मुनियों के आश्रम में आधुनिक गौशालाएँ हैं जहाँ वैज्ञानिक पद्धति से उनका दूध निकाला जाता है और साफ-सफाई से उनके पालन-पोषण और स्वास्थ्य का ध्यान विशेषरूप से रखा जाता है।


         गाय आज भी हमारी संस्कृति में रची बसी है। बालक को प्राथमिक कक्षाओं में ‘‘गाय’’ विषय पर निबन्ध लिखने को दिया जाता है। भगवान कृष्ण का गाय के प्रति जो समर्पण भाव था उससे हर भारतीय परिचित है।


हमारे यहाँ के प्रसिद्ध ग्रंथ चाणक्य नीति में कहा गया है -
आत्ममाता गुरोःपत्नी ब्राह्मणी राजपत्निका।
धेनुर्धात्री तथा पृथ्वी सप्तैता मातरः स्मृता।।


जन्मदात्री माता, गुरू की पत्नी, ब्राह्मण की पत्नी,राजा की पत्नी,गाय,धाय माता तथा पृथ्वी सातों को माता माना गया है।
हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध कवि श्री रसखान लिखते हैं -
आठौं सिद्धि नवो निधि को सुखनंद की गाय चराय बिसारो।
या लकुटि अरू कामरिया पर राज तिहुँ पुर को तजि डारौ।।


रसखान कहते हैं कि यदि मुझे नंद बाबा की गाय चराने के लिए मिल जावें तो मैं आठ सिद्धियों तथा नौ निधियों के सुख को भी भूल जाऊँ तथा यदि मुझे उनकी लकड़ी और कम्बल प्राप्त हो जावे तो तीनों लोकों के राज्य को भी त्याग दूँ। ऐसी है गौमाता की महिमा।


          गोस्वामी तुलसीदास जी भी अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ श्रीरामचरितमानस में कहते हैं -
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपा सिंधु मानुष तनु धारी।।
श्रीरामचरितमानस 5-39


भगवान् श्रीराम ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ एवं देव का हित करने के लिये ही मनुष्य शरीर धारण किया था।


                                          श्रीमती डॉ. शारदा नरेन्द्र मेहता                                                            
  एम.ए.संस्कृत,विद्यावाचस्पति
                                                                                                Sr. MIG.103, व्यास नगर, ऋषिनगर विस्तार
                                                       उज्जैन (म.प्र.)456010

आलेख 568766224054976014

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