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लघुकथा - किस्सा तुलसी का - कल्पना गोयल

मेरी चचेरी भतीजी नेहा बड़ी चुलबुली व नटखट है।

हमारी दादीजी धार्मिक संस्कारों वाली हैं। एक दिन सुबह दादीजी पूजा कर रही थी सो नेहा को आवाज लगा कर बोली-"बेटा, मुझे तुलसी ला दे,जरा! भोग लगा कर आरती करुँगी "इतना कहकर वे पाठ करने लग गई।

नेहा कमरे में जाकर अपने पापा के सिरहाने छिपा कर रखी तुलसी (पान मसाला की पुडिया) ले आई और दादी के पास लाकर रख दी।

       दादी ने पाठ करने के बाद देखा तो उनके पास रखी तुलसी (पुडिया) देख सारा माजरा समझ गई थी।

बड़े शांत भाव से उन्होंने नेहा और उसके पापा को आवाज देकर बुलाया। दोनों सामने खड़े थे उन्होंने नेहा को पूछा-ये क्या है बेटा? बड़ी मासूमियत से नजरें पापा की ओर करते हुए बोली-"आपने तुलसी लाने को कहा था, ना! सुबह मैंने पापा के तकिये के नीचे देखी थी, दादी"!पापा से पूछा-तो वो बोले ये तुम्हारे लिए नहीं बड़ों के लिए होती है.. तो मैंने सोचा... इसे आप और भगवानजी तो खा ही लेंगे। इसलिए ला दी। सही है,ना!

       अब दादी अपने बेटे को घूरकर (घर में निषिद्ध होने के कारण)देख रही थी और हम सभी नेहा की मासूमियत पर हँस रहे थे।

     कल्पना गोयल

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