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लघुकथा - आंसू ! - शशि दीपक कपूर

एक जमाना था, जब कोई अपनी बसी बसायी दुनियां छोड़कर जाता उसके पीछे रोने -धोने वालों का तांता लग जाता था।। घर की नजदीक रिश्तेदार  और मुहल्ले की बुजुर्ग महिलाएं अपनी छाती पीट-पीटकर , दीवारों से अपना सिर टकरातीं, दहाड़े मार-मार कर हाथ पैर मारतीं रहती, जब तक मरनेवाले को कंधा देकर उस आंगन से बाहर न ले जाया जाता। कभी - कभी तो महिलाएं काफी दूरी तक उसके पीछे रोती बिलखती जाती थी। बड़ा ही रुदन से भरा दृश्य होता, जिसकी आंख में आंसू सूख गये होते, वे भी लौट आते थे।

जब तक आँख से ओझल न हो जाता, चिता-अवस्था में पड़ा व्यक्ति, तब तक यह दृश्य बड़ा ही पीड़ादायक अवस्था में विचरण करता रहता था। परन्तु वहां श्मशान में चिता अग्नि सुपुर्द होती और यहां रौद्र-विलाप स्वर धीरे-धीरे कम होता जाता। इसी बीच कुछ महिलाएं परंपरा  अनुसार अगले विधि-विधान की तैयारी में जुट जातीं। दूसरी ओर देर सबेर से आने वालों का शोकाकुल परिवार को हौसला देने के लिए आना जाना जारी रहता। साथ में, बीच -बीच में कभी तीव्र, कभी धीमा भी सुनाई देता। पंडित आत्मशांति हेतु मंत्र अपने स्वर से एक कोने में बैठ पढ़ता।

यह सिलसिला अब केवल बहुत ही पिछड़े इलाके के गांवों देखने को मिल जाता है मगर, बड़े शहरों, महानगरों में ऐसा शोक-कोलाहल कहीं भी दूर दूर तक नहीं सुनाई देता। यहां लोग या परिजन अपनी अपनी गाड़ी से सफेद रंग की चकाचक परिधान पहने, आंखों पर काला चश्मा लगा कर शोक जाहिर करने आते हैं।

किसी की आंख के चश्मे से एक आंसू भी टपक जाए क्या मजाल !

शोक करवाने के बाद बढ़़िया सा चाय-नाश्ता कर चल देते हैं, साथ में शोकग्रस्त परिवार यह भी कह देता है, “भई, अब परदेस में रह रहें हैं  सारे रीति रिवाजों को ज्यों का त्यों नहीं मान सकते, वक्त बदल गया है , हमें भी खुद को बदलना पड़ रहा है अगर अपने गांव होते सारे रस्मों-रिवाज वैसे ही करते।”

क्या ये सच्चे आंसू हैं और वो आंसू  कहाँ गये ! क्या वो झूठे थे ?

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