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ठलुआ-चिंतन (व्यंग्य) - ज़ान साँसत में - देवेंद्र कुमार पाठक


अब तक मंहगाई, बेरोज़गारी, नोटबन्दी, जी ऐस टी और चुनावी वाग्वीरों के वार-पलटवारों की ख़बरों ने जीना हराम कर रखा है. . . . . बंधु-बांधव, सखा-सखी, शुभचिंतक, हितुये, अगुये, लगुये, भगुये हमारे; बीमारू हिंदी पट्टी के गए-गुज़रे, बेचारे इन दिनों दो तरफ़ा खबरों के दो पाटों के बीच दाल की तरह दले जा रहे हैं. 'बीमारू हिंदी पट्टीदार' बनाकर दशकों पहले ही हम पिछड़े घोषित किये जा चुके थे. अपमान पीड़ा, कुण्ठा और क्षोभादि स्थायी भावों से उफनाते, सरकारी नल-जल योजना के पाइप की तरह फालतू बहते, हम हिंदी वाले इन दिनों बड़े दलित हैं, उत्पीड़ित हैं.

एक खबर, 'अंग्रेजी-माध्यम के स्कूलों के बच्चे हिंदी में सौ में सौ अंक ला रहे हैं'. दूसरी खबर धर्म, भक्ति साहित्य, भाषा, कला-संस्कृति वाले 'हिंदी भाषी राज्य के हजारों-लाखों विद्यार्थी हिंदी में फेल हो रहे हैं. ' हिंदी के बड़े-छोटे, मंझोले, औने-पौने और बौने-छौने कवि-कथाकार और विद्या-वाचस्पति-प्राध्यापक, कला-निष्णात, स्नातक, व्याख्याता, शिक्षक, अतिथि-विद्वान्, सहायक-शिक्षक, अध्यापक आदि किसिम-किसिम के और कई हिंदीजीवी जीवों की जान सांसत में है.

गौरव और लज्जा की दोतरफा मार से अधमरे हो रहे हम हिदीप्रेमियों की मनोदशा पर किसी की नज़र नहीं. अखबार वालों को बिलकुल दया नहीं आई ये खबर छापते हुये. . . . . . . अरे भई, न छापते तो क्या फेल होने वाले डंडे लेकर आ जाते या धरना-प्रदर्शन, घेराव, तोड़-फ़ोड़ पर उतारू हो जाते. . . . . . कितने-कई काले कारनामों की खबरों को बिना डकार लिये पचा जाते हो. सब पता है खबरी मीडिया का चाल-चलन. बड़े साफ-पाक़ बनते हो. क्या क्या काला-नीला, करने वाले, हिंदी की खाने वालों; कहो, हिंदी में फेल होनेवालों की इस खबर से कौन सा पहाड़ टूटा, किस को चिंता हुई? किसने, कोई संकल्प लिया?. . . . . .

अरे खबर हो, तो पुरअसर हो, हंगामा हो, तहलका मच जाये. हमारी हिंदी का एक शब्द भी छापने में अंग्रेजी के अख़बार गुरेज करते हैं, और तुम हिदीवाले धकाधक 'हिंग्रेजी' का एक पूरा पृष्ठ खास तौर पर छापने में गर्व का अनुभव करते होंगे. ये हिंदी पट्टी के साथ हो क्या रहा है?

एक तरफ हिंदी के विश्वविद्यालय विदेशों में फूल-फल रहे हैं और हिंदी असर-पसरकर बाज़ारू कामयाबी और तरक्की का कारगर और ज़रूरी जरिया बन रही है. . . . . . नये रंग-ढंग और लहजे में 'हिंग्रेजी' छा रही है. हमारे हिंदी के अख़बारों, चैनलों और 'सोशल-मीडिया' की दरियादिली काबिले-तारीफ़ भर नहीं, काबिले-गौर भी है. वहां खालिस हिंदी में मां-बहन से जोड़कर ऐसी-ऐसी गालियाँ अंग्रेजी लिपि में इस-उस दल, विचारधारा वाले पालतू या भक्तगण लिखते हैं कि पढ़कर लज्जा भी लज्जित हो मोबाईल-लेपटॉप से अपना कपार फ़ोड़ ले. . . . . . निरक्षर भी अंग्रेजी भाषा का मोबाईल दनादन चलाता है. एक आप हैं कि हिंदी में फेल होनेवालों की गिनती गिना रहे हैं.

अरे कभी हिंदी में कुछ खास करनेवालों की भी खबर ली है? वे कहाँ -कैसे हैं?किस सद्गति को प्राप्त हुये? . . . . . हिंदी के लेखक-कवियों के लिखे-छपे को लेकर कभी कोई सर्वे किया? पुस्तक मेलों में हिंदी की क़िताबों की बिक्री घटती पठनीयता पर कोई चिंता जाहिर की कभी. समझ में ही यह नहीं आ रहा कि अंग्रेजी माध्यम वाले बच्चे की हिंदी की उत्तर-पुस्तिका जांचनेवाले को एक भी भाषा लेखन की गलती नहीं मिली? गलतियाँ तो होती हैं हिंदी में.

इधर हिंदी माध्यमवाले ही हिंदी में फेल हो जाते हैं! घर की बात है. बच्चे हैं, होते रहते हैं फेल-पास. इस पर बवाल क्या काटना! इधरवाली और उधरवाली हिंदी के पर्चे में ही कुछ फ़र्क़ होगा. फ़र्क़ तो पढ़ाने और जांचने वाले में भी होगा. कुछ अंक काटने में कसर नहीं लगाते, कुछ हैं कि उदारता से देते हैं. कुछ हैं कि घण्टे भर में पाँच उत्तर-पुस्तिका जाँच पाते हैं, कुछ बीसों निबटा देते हैं.

अब फ़र्क़ की कहें, तो पढ़ाई से जुड़े कई फ़र्क़ हैं. ये लो, कहीं तो फरफराते पंखे, डेस्क, साफ कमरे, पेड़-पौधे, पानी, प्रसाधन, पुस्तकालय आदि की बेहतर सुविधाएँ हैं, कहीं शिक्षक ही नहीं. कहीं कोई साधन नहीं. कहीं के मास्साब को अंग्रेजी में 'जनवरी' लिखना नहीं आता. क्या तमाशा मचाये हैं ये मीडिया वाले! हिंदी माध्यम वाले स्कूलों के मास्साबों की प्रतिभा की परख का पैमाना भी अंग्रेजी से तय होगा? और ये जो शिक्षक बनाने का आपका पैमाना है, उसकी भी कुछ खबर है.

कितने कई कारण गिनाये जा सकते हैं लेकिन जो मुद्दे की बात है, वह यह है, 'घर का जोगी जोगना, आन गांव का सिद्ध'. फिर इस देश में हिंदी की बखत ही कहाँ-कितनी है. रही फेल-पास और अंक पाने-देने की, तो खरी बात ये है कि साधन हों भी तो क्या, बिना साधना के कभी-कुछ हासिल होता है? भाषा कोई भी हो साधना के बिना कोई भी कुछ नहीं सीख-पढ़ सकता.

आत्मपरिचय-

देवेन्द्र कुमार पाठक

म. प्र. के कटनी जिले के गांव भुड़सा में 27 अगस्त 1956 को एक किसान परिवार में जन्म. शिक्षा-M. A. B. T. C. हिंदी शिक्षक पद से 2017 में सेवानिवृत्त. नाट्य लेखन को छोड़ कमोबेश सभी विधाओं में लिखा . . . . . . 'महरूम' तखल्लुस से गज़लें भी कहते हैं. . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
. 2 उपन्यास, ( विधर्मी, अदना सा आदमी ) 4 कहानी संग्रह, ( मुहिम, मरी खाल : आखिरी ताल, धरम धरे को दण्ड, चनसुरिया का सुख ) 1-1 व्यंग्य, ग़ज़ल और गीत-नवगीत संग्रह, ( दिल का मामला है, दुनिया नहीं अँधेरी होगी, ओढ़ने को आस्मां है ) एक संग्रह 'केंद्र में नवगीत' का संपादन. . . . . . . ' वागर्थ', 'नया ज्ञानोदय', 'अक्षरपर्व', ' 'अन्यथा', , 'वीणा', 'कथन', 'नवनीत', 'अवकाश' ', 'शिखर वार्ता', 'हंस', 'भास्कर' आदि पत्र-पत्रिकाओं और 'रचनाकार', 'साहित्यम्', 'प्रतिलिपि'आदि बेव पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित. आकाशवाणी, दूरदर्शन से प्रसारित. 'दुष्यंतकुमार पुरस्कार', 'पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पुरस्कार' आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित. . . . . . . कमोबेश समूचा लेखन गांव-कस्बे के मजूर-किसानों के जीवन की विसंगतियों, संघर्षों और सामाजिक, आर्थिक समस्याओं पर केंद्रित. . . . . .
सम्पर्क-1315, साईंपुरम् कॉलोनी, रोशननगर, साइंस कॉलेज डाकघर, कटनी, कटनी, 483501, म. प्र. ईमेल-devendrakpathak. dp@gmail. com

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