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ठलुआ चिंतन- सियासत की बू -व्यंग्य - देवेंद्र कुमार पाठक


'आम' का मौसम है. किस्म-किस्म के आमों से बाजार अटा-पटा है. आम कहने को ही आम है. अब यह 'आम' नहीं रहा, 'खास' हो गया है. . . . . . अब टिकोरे आते ही शहरी व्यापारी गांवों की अमराइयों के आम-जामुन, बेल, आंवलों की बोली लगाकर पूरी फसल खरीद, वहां लठैत रखवालों को तैनात कर देते हैं. टुकुर-टुकुर निहारती रहती हैं बचपन की आँखें-सवालिया निगाहें. . . . . आज के बिक चुके आम पर नहीं, पचपन-साल पीछे के वर्षों के आम के पेड़, फल पर कुछ 'खास' सवाल करने की ज़हमत उठाई है हमारे 'खास' नायक ने. . . . . . पत्रकार का काम जरूरी तो नहीं कि पत्रकार ही करे.

इन दिनों कितने ही पत्रकार कई ऐसे कामों में संलिप्त देखे-सुने और पाये जाते हैं, जो उन्हें कदापि नहीं करना चाहिये पर करते हैं. अरे भई, करना पड़ता है. पेट भरे होने के बाद जो ज़रूरतें जुबान लुपलुपाती हैं, तो आत्मा की आवाज़ तो क्या, आत्मा को ही बन्दर के कलेजे की तरह पेड़ पर नहीं, कबाड़ख़ाने में डाल सब कुछ करना जायज और निहायत जरूरी हो जाता है. . . . . . . तो हमारे नायक ने इस भूमिका को खूब निभाया.

पत्रकार भी इस तरह के सवाल न पूछते. एक 'खास' छवि-छाप वाले ने एकखासमखास, महान ओहदेदार शख्सियत से 'आम'के विषय में कुछ आम सवाल किये ;निरे अराजनैतिक सवाल. अरे भई, 'आम' को लेकर आप किन और कैसे 'खास' सवालात की उम्मीद कर सकते हैं. आम को लेकर 'आम'सवाल होनेचाहिये, सोहुये. . . . . . . आम को पाने, काटकर या चूसकर खाने के तौर-तरीकों के सवाल जो हुये उन पर भी बवाल उठाने वालों पर तरस आता है. बस पीछेइ पड़ जाते हैं बिना पूछ के लोग. इनकी तो कहीं-कोई पूछ-परख हैयइ नहीं, सो बस लगे पूछकर बवाल काटने !. . . अब आम को लेकर आम सवाल ही किये जा सकते हैं न! 'आम' ही जो ठहरा, कोई 'खास'तो नहीं.

अच्छा, तो आप ये उम्मीद कर रहे थे कि कवि-कथाकार 'नागार्जुन' क़ी तरह नीलम, लँगड़े, दशहरी, फजली, बादाम जैसे दर्जनों आम के नामों की सूची बनवाते. आज नागार्जुन होते तो अपने परिचित तौर-तेवर में तब के उस दौर की-सी कविताई कर पाते . . . !आम के आचार, अमावट बनाने या उसके घरेलू उद्योग की सम्भावनाएं तलाशते. . . . घड़ी भर के अभिनेता पत्रकार भइये, आम को लेकर सवाल तो आपने 'खास शख्स' से किये न! 'खास' ओहदेदार जब 'आम' को लेकर जवाबदेह होवेगा, तो वह ज़वाब तो खास ही होगा, कि न? . . . . पर आप की समझदानी में ये 'आम' की समझ उतनी ही है या हुआ करती है, जितनी फ़िल्म-निर्देशक ने डाली होती है. . . . . . इस मामले में भी पत्रकार का अभिनय ! आपको जितना कहा गया, उतना आपने कर दिया.

दो खास इलाकाई हस्तियों के बीच 'आम' को लेकर जो ये आम, अराजनैतिक बातचीत हुई, इसने अपने अराजनैतिक रूप को आमो-खास के बीच माहौल में दिखाया, काबिले-गौर रहा. राजनीति तो होनी थी और हुई . आम को लेकर खास तौर पर हुई . बस बेचारे 'आम' की ही जो दशा थी, वही की वही रही. न उसके भाव घटे, न आम आदमी की हिम्मत हुई उसे खरीदने की. खास आय-वर्ग के खास ग्राहकों ने ही आम की पूछ-परख और खरीद की; पहली बार ये मुमकिन हुआ कि आम को अपने काटे और चूसे जाने पर फख्र हुआ .

आम खाते हुये उस बातचीत का खूब आनंद लिया-दिया खास लोगों ने. काटकर आम खाने से चूसने को बेहतर बताया कुछ ने;तो कुछ काटकर खाने को बेहतर बताते हुये भिड़ पड़े. अखबार और मीडिया के पत्रकार, संयोजक-सूत्रधारों ने अपने-आप को संयमित रखा. कहाँ बाड़ कूदनी है, कहाँ जले पर नमकनुमा सवाल धुरकना है, कहाँ किस दल के प्रवक्ता को फुदकने का समय देना है, किसे उकसाना है, किसे धौंसियाना है, किससे माफ़ी मंगवाना है, किसको रोककर ब्रेक लगाना है, किस प्रवक्ता के साथ होना है, किसे आईना दिखाना है?. . . इन तमाम तरह के कामों से पत्रकारिता की छवि आम लोगों के बीच खास बना चुके हमारे वाग्वीरों को अभी अगले हफ्ते और दिनों में हार-जीत के ऊंटों को इस-उस, कौन जाने किस-किस, कैसी-कैसी करवटें बिठाना है-इस पर जुटना है. . . . . . . जुटे रहिये, आम जन को तो जुतना ही जुतना है.

मेहनत-मजूरी के बिना उनकी दो जून की रोटी का आसरा ही क्या है? और उसकी मेहनत-मजूरी के सवालों पर भी राजनीति हावी है. जिस देश-समाज में दाढ़ीचोटी, जनेऊ-टोपी, राम-रहीम, मन्दिर-मस्जिद, श्मशान-कब्रिस्तान, आरती-इबादत, गाय-सूअर, जवान-किसान, दिहाड़ीरुजगारी, शहीदों और रसोई से लेकर शयनकक्ष तक, बाहर से लेकर भीतर तक के कपड़ों-लत्तों पर भी राजनीति होती हो, वहाँ एक ' साक्षात्कार' के अराजनैतिक लेन-देन का अप्रत्याशित और अविश्वसनीय समाचार; मुझ जैसे अराजनैतिक, आम और अदना आदमी को सुख देकर हैरान किये दे रहा है. यक़ीन ही नहीं होता.

ये अलहदा अहसास और उसका दो टूक सच है कि मुझ जैसे आम आदमी को जब भी कोई सुख-सुकून, सुविधा-साधन या मुफ़्त में कोई चीज मिलती है, तो मुई सियासत की बू आने लगती है. इस वक्त भी चौतरफ से वही बू आ रही है . . . . .
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आत्मपरिचय-

देवेन्द्र कुमार पाठक

म. प्र. के कटनी जिले के गांव भुड़सा में 27 अगस्त 1956 को एक किसान परिवार में जन्म. शिक्षा-M. A. B. T. C. हिंदी शिक्षक पद से 2017 में सेवानिवृत्त. नाट्य लेखन को छोड़ कमोबेश सभी विधाओं में लिखा . . . . . . 'महरूम' तखल्लुस से गज़लें भी कहते हैं. . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
. 2 उपन्यास, ( विधर्मी, अदना सा आदमी ) 4 कहानी संग्रह, ( मुहिम, मरी खाल : आखिरी ताल, धरम धरे को दण्ड, चनसुरिया का सुख ) 1-1 व्यंग्य, ग़ज़ल और गीत-नवगीत संग्रह, ( दिल का मामला है, दुनिया नहीं अँधेरी होगी, ओढ़ने को आस्मां है ) एक संग्रह 'केंद्र में नवगीत' का संपादन. . . . . . . ' वागर्थ', 'नया ज्ञानोदय', 'अक्षरपर्व', ' 'अन्यथा', , 'वीणा', 'कथन', 'नवनीत', 'अवकाश' ', 'शिखर वार्ता', 'हंस', 'भास्कर' आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित. आकाशवाणी, दूरदर्शन से प्रसारित. 'दुष्यंतकुमार पुरस्कार', 'पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पुरस्कार' आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित. . . . . . . कमोबेश समूचा लेखन गांव-कस्बे के मजूर-किसानों के जीवन की विसंगतियों, संघर्षों और सामाजिक, आर्थिक समस्याओं पर केंद्रित. . . . . .
सम्पर्क-1315, साईंपुरम् कॉलोनी, रोशननगर, साइंस कॉलेज डाकघर, कटनी, कटनी, 483501, म. प्र.; ईमेल-devendrakpathak. dp@gmail. com

व्यंग्य 6617587489718738262

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