370010869858007

---प्रायोजक---

---***---

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

****

Loading...

- 'नाथ'गोरखपुरी की काव्य रचनाएँ

01-

क्यों रे सियासत देगी गच्चा?
बोल सियासत झूठ है तेरा, अदा नजाकत झूठ है तेरा
कब तक जनता छली जायेगी?, सच की रौंदी कली जायेगी ?
कब सोयेगा भूखा बच्चा ?, क्यों रे सियासत देगी गच्चा?

"अन्त तेरा आरम्भ" हो चूका, पूर्ण तेरा है दम्भ हो चूका
सच औ झूठ समर्पण पर हैं, 'नाथ' खड़े अब दर्पण पर हैं
समझै हिन्द धरम है सच्चा, क्यों रे सियासत देगी गच्चा?

02-

अभी वक्त है लौट आओ,बोलो जाओगे कैसे?
जहां मैं हूँ वहां किसी और को बसाओगे कैसे?

मैं तो जान दे दूंगा  तेरे प्यार में ,मगर सोच लो
फिर मुझ सा चाहने वाला, बोलो पाओगे कैसे?

जिन अदाओं से घायल मेरा दिल हो गया था
वो अदायें किसी और को दिखाओगे कैसे ?

मेरे क़िस्मत हो तुम ही , मेरे जन्नत हो तुम ही
मेरे दिल को रूला के  , मुस्कुराओगे कैसे ?

कोई ताने नहीं देगा, मेरे मोहब्बत का तुझे
पर आइने में खुद को देख पाओगे कैसे ?

03-

मिलन की वो रात ,दिल में उतर गई
तेरी मीठी सी बात ,दिल में उतर गई

वर्षों से दीदार-ऐ-मौसम होता रहा मगर
तेरे आँखों की बरसात,दिल में उतर गई

दो जिस्म एक जां होके भी, सकुं ना मिला
है जहां में तेरी मेरी ज़ात, दिल में उतर गई

चाहत बढ़ी दूरी का,पैमाना गढ़ लिया हमने
'नाथ' आँखों की मुलाकात,दिल में उतर गई

04-

मैं मुश्किलों के दौर, आखिर पार कैसे करता हूँ?
ये सोच सोच के दुश्मनों को भी बड़ी  बेकरारी है

यूं ही उसके हाथ नहीं बंधे , इस बेदर्द जमाने में
जरा सा गौर तो करिये, वो आदमी सरकारी है

माना मैं आजकल हूँ , घने अंधेरों के कैद में
अंधेरों के बीच सही, रोशनी की तलाश जारी है

सुनो ! दुश्मनों के बीच ही गुजरता है वक्त मेरा
कुछ इस तरह कट रही, 'नाथ' जिंदगी हमारी है

05-

दिल में मेरे उठता, ये कैसा तूफ़ान है ?
आज दिल खुद ही खुद से अंजान है।

हरी है हरि की मर्यादा जिस कातिल ने
कहे जमाना कि वो शख्स ही भगवान है

मैं उसको मसीहा मान भी लूं कैसे ?
लाशों के ढेर पर बनी जिसकी पहचान है

नित'नाथ' ख्वाबों के प्यास बुझाया करते हैं
पर हर रोज हृदय में उठता, इक प्यासा तूफ़ान है

06-

ममतामयी है मेरी माँ

सारे जग में सबसे न्यारी,
सींचे सारी अपनी क्यारी
अश्रुनीर ना बहने देती,
सारे दु:ख है खुद सह लेती
बाधाओं से ना घबराती,
हरदम ही हमको समझाती
कालजयी है मेरी माँ,
  ममतामयी है मेरी माँ

सुखी रोटी खुद है खाया,
सर्दी गर्मी हमें बचाया
सत्य सीख देती है हरदम,
बुरी बलायें लेती हरदम
माँ की ही सरकार सही है,
कोई भी प्रतिकार नहीं है
ढाललई है मेरी माँ,
  ममतामयी है मेरी माँ

07-

वो जालिम इस कदर रूसवाई दे गया
उम्मीद की आँखों को तनहाई दे गया

जिसे पूजा मैं उम्रभर खुदा की तरह
ठुकरा के मोहब्बत वो खुदाई दे गया

हवस इंसान का बढ़ता गया हर रोज
मोहब्बत के बाजार को महंगाई दे गया

रिश्ते उम्रभर निभाने का वादा किया उसने
चला उस रीति पर वह भी जुदाई दे गया

सियासत से उम्मीद भला क्यों करे कोई
'नाथ' हर शै सियासत का बेहयाई दे गया

08-


निस्तब्ध मौन घना अंधेरा लिये,
निकला था सूर्य सवेरा लिये।
सुर्ख लालिमा से मदातुर ,
जनहुं सदियों से कामातुर।

पल में मचलता पल में इठलाता ,
रंगीनियों में डूबा रंगरलियां मनाता।
पहुँचा जब अवसान के किनारे ,
तो अब है क्यों शान्त?
क्या उस मदहोश सवेरे का ,
छुपा था शाम में ही अन्त?

09-
लोकगीत

कहां गईलें राम ,लखन बन जोगिया
कहां गईलें राम ,लखन बन जोगिया
पल में ही बनि गईलें कइसे निरमोहिया
कहां गईलें-------

रातिरात कईसन ऊ देखलि सपनवा
बरिस चउदे भेजिदेली बाबू कै बनवा
रहलें ऊते उनके ही आँखि कै अजोरिया
कहां गईलें----------

ससुरा में खाब लेके आईल रहली
राम कै सुरत पै लुभाईल रहली
ईका हो गइलें सोचे सीता बहुरिया
कहां गइले राम लखन बन जोगिया

10-

हुस्न-ए-गुमान करने वाले,अब तेरा इन्तजार नहीं है
सुनो तुझे पाने के लिये दिल, अब बेकरार नहीं है

ठोकरें ही जीवन को जीना , सीखा दी हैं यारों
अब किसी के नसीहतों की , हमें दरकार नहीं है

ऐ मोहब्बत किस किससे शिकायत, करता फिरुं मैं
'नाथ' जब अपनी ही मोहब्बत की , सरकार नहीं है

- 'नाथ'गोरखपुरी

कविता 4555868035509983784

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

रचनाकार में छपें. लाखों पाठकों तक पहुँचें, तुरंत!

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं.

   प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 14,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. किसी भी फ़ॉन्ट में रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com
कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.
उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.

इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.

नाका में प्रकाशनार्थ रचनाएँ भेजने संबंधी अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

आवश्यक सूचना : कृपया ध्यान दें -

कविता / ग़ज़ल स्तम्भ के लिए, कृपया न्यूनतम 10 रचनाएँ एक साथ भेजें, छिट-पुट एकल कविताएँ कृपया न भेजें, बल्कि उन्हें एकत्र कर व संकलित कर भेजें. एकल व छिट-पुट कविताओं को अलग से प्रकाशित किया जाना संभव नहीं हो पाता है. अतः उन्हें समय समय पर संकलित कर प्रकाशित किया जाएगा. आपके सहयोग के लिए धन्यवाद.

*******


कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

---प्रायोजक---

---***---

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव