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देवेंद्र कुमार पाठक की समकालीन कविता और नवगीत

कविता-
 
हरियाने उम्मीदों की धरती का आँचल

                                   देवेंद्र कुमार पाठक


टिकी रहती हैं और हैं अभी तक सलामत
पसीने से गंधाती हवाओं के बूते
किसी भी काल में सियासतें-सल्तनतें
   किसी भी दौर में देश-दुनिया के
सत्ताधीशों के ताज-तख्त
फूलते-फलते कुछ धनकुबेरों- सफेदपोश चोरों के साथ
ज्यादातर गरीब-गुरबों का कौम

धर्म मजहब जात-पाँत ऊंच-नीच में बंटा

और असमानताओं से अंटा-पटा समाज........
नहीं पहुँच पातीं जिनकी आहो कराहें
   प्रतिरोधी चीखें-जूझती-टूटती आवाज़ें
जनमत का चना घास-भूसा भकोस-चरकर
सभा-सदनों में हिनहिनाते दो पाये घोड़ों तक......


जिन गरीब- गुरबों के कन्धों पर रख पाँव
चढ़-बढ़कर पाते-हथियाते हैं  जो सत्ता की
ऊँची हरियाती-ठंडाती ठौर-ठाँव
छल छद्म से होते हैं शिखरस्थ ......


वे बकझौंसे किसी दिनअपनी ही
बदमगजियों-बड़बोलियों की जनी
कुनीतियों जुल्म-ज़्यादितियों
कुकृत्यों से होकर अपदस्थ
पलक झपकते हो जाते हैं अस्त
समय कर लेता उन्हें उदरस्थ ....


.कितने कई जार हिटलर मुसोलनी जैसे
ताक़तवर सत्ताधीशों और
उनकी बंधुआ वेतनभोगी वर्दियों के
बूटों तले रौंदी-खौंदी देह-विरोधी आवाज़ें
धूल-धूधुर में लोटती
नथुनों से लहू थूकती .......


पगारों से पले डंडे
छलनी करते रहे  पीठ
उतरते-टूटते  रहे कन्धे
संगीनों पर टँगते रहे जिस्म.....


घाटों पर काबिज़ रहे मठाधीश-पण्डे
उनके मुस्टंडे लहराते रहे झण्डे
करते रहे भक्तगण जयघोष
गाते रहे प्रशस्तियाँ खबरी चैनलों के सुग्गे
मंच-मुंडेरों पर अखबारी कव्वे
करते  रहे विज्ञापित झूठ कामयाबियों के
बदज़ुबानियाँ मिटाती रहीं
इतिहास की गहरी लकीरें
छोटा करने के मुगालते में
अपनी ही कद-काँठी में
घटती-सिमटती रहीं बुलंदियां......


एकबारगी मेहनतकश गरीब-गुरबों के पांवों की धूल
गंवई-गलियों से उठ,गिर,उठ
और बढ़कर चढ़ती है  ऊँचाइयाँ आकाश की.......


वे जो हैं लुटे-पिटे कई पीढ़ियों से हीचे-हारे
उनकी आस-प्यास,विश्वास के सहारे
पसीने से लथपथ गंधाती नई जोशीली हवा
उतार लाती है किसी दिन
तमाम गर्दो-गुबार के साथ
घनमेघ चक्रवाती बेमौसम बारिशें
हरियाने उम्मीदों की धरती का आँचल.....!


महकाने गंधाती देहों में छुपी
उन पवित्र और निश्छल आत्माओं के सपने
जिन्होंने दुनिया अब भी बचा रखी है
अपने मेहनती हाथों के कौशल से
सुन्दर और जीने लायक जैसी जितनी भी है
उन मुट्ठीभर तानाशाहों की
तमाम नीचताओं बदकारियों और
आत्ममुग्धताओं के बीच उम्मीद से है।


नवगीत /अपने पाप आप ही ढोते
देवेन्द्र कुमार पाठक का नवगीत

                     
                              अपने पाप आप ही ढोते



पेड़,शाख,टहनी-पत्तों से ध्यान न हटा सका अपना;
इसीलिए तो लक्ष्य-वेध कर भी मैं अर्जुन नहीं बना!

अर्जुन बनने के सच का एक पहलू और भुगतना होता,
किसी न किसी एकलव्य का अँगूठा फिर कटना होता;
अद्वितीय पद छिन जाने के भय से मुक्त मस्त सोये हम,

आये,गुजरे-गये कई पर याद न रहा कोई  सपना!


प्रश्न कई सिद्धार्थ की तरह  हमें सताया करते,
राजपुत्र की भाँति नहीं पर हम सुलझाया करते;
हम दहते-तपते सूरज अपने जीवन-संघर्षों के-
अपने राहुल-यशोधरा संग  हर सुख-दुःख है सहना !


उम्मीदों का गला  घोंट भी हम हत्यारे न कहलाये,
किसी देवता,पीर,मसीहा के दर पर जा न रिरियाये;
अपने पाप आप ही ढोते जीवन का हर पुण्य कमाया-
किसी तीर्थ,मठ,हज-यात्रा की हमको नहीं कलपना!


वाग्जाल न फेंके हमने,सीखा बस श्रम-कौशल सीखा,
गया पढ़ाकर पाठ नया कुछ हर अहसास तल्ख़ -तीखा;
तारे तोड़े नहीं गगन के,कलश-कंगूरे नहीं बने-
पर हर निर्मिति में आगे बढ़ हमें नींव का पत्थर बनना!


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आत्मपरिचय-देवेन्द्र कुमार पाठक
म.प्र. के कटनी जिले के गांव भुड़सा में 27 अगस्त 1956 को एक किसान परिवार में जन्म.शिक्षा-M.A.B.T.C. हिंदी शिक्षक पद से 2017 में सेवानिवृत्त. नाट्य लेखन को छोड़ कमोबेश सभी विधाओं में लिखा ......'महरूम' तखल्लुस से गज़लें भी कहते हैं....................
. 2 उपन्यास, ( विधर्मी,अदना सा आदमी ) 4 कहानी संग्रह,( मुहिम, मरी खाल : आखिरी ताल,धरम धरे को दण्ड,चनसुरिया का सुख ) 1-1 व्यंग्य,ग़ज़ल और गीत-नवगीत संग्रह,( दिल का मामला है, दुनिया नहीं अँधेरी होगी, ओढ़ने को आस्मां है ) एक संग्रह 'केंद्र में नवगीत' का संपादन. ......  ' वागर्थ', 'नया ज्ञानोदय', 'अक्षरपर्व', ' 'अन्यथा', ,'वीणा', 'कथन', 'नवनीत', 'अवकाश' ', 'शिखर वार्ता', 'हंस', 'भास्कर' आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित.आकाशवाणी,दूरदर्शन से प्रसारित. 'दुष्यंतकुमार पुरस्कार','पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पुरस्कार' आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित....... कमोबेश समूचा लेखन गांव-कस्बे के मजूर-किसानों  के जीवन की विसंगतियों,संघर्षों और सामाजिक,आर्थिक समस्याओं पर केंद्रित......
सम्पर्क-1315,साईंपुरम् कॉलोनी,रोशननगर,साइंस कॉलेज डाकघर,कटनी,कटनी,483501,म.प्र. मोबाईल-8120910105; ईमेल-devendrakpathak.dp@gmail.com

कविता 6694575975268758296

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