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आदमी या जूता- सुरेश खांडवेकर


गजब हो गया। कचरू ने साल भर जूता रगड़ा। पत्थर फोड़े, तसले भरकर मलबा फेंका। जूते का कुछ नहीं बिगड़ा। बस एक सर्दी की ठिठुरन में गबरू से कहासुनी हो गयी। कचरू का पारा गरम हो गया। पैर से जूता निकाला और गबरू की कनपटी पर दे मारा। तो क्या देखता हैं। जूते से सोल अलग हो गया। कचरू हैरान! दुश्मन पर वार करते ही जूते ने दगा दे दिया।

भीड़ इकट्ठी हो गयी। पुलिस आ गयी। दोनों की टांगों पर पुलिस ने डंडे बरसाये। गबरू के कान का दर्द पैरों में आ गया। कचरू का घुटनों में। मामूली गर्मा-गर्मी को पुलिस ने पहाड़ बना दिया। दोनों को दीनदयाल अस्पताल में पहुंचाया गया।

भीड़ को चीरता हुआ एक नेता आ टपका। उसने दो चार गालियां पुलिस को दे मारी और उसकी नजर कचरू के जूते पर पड़ी। जूते के दो टुकड़े थे। उससे रहा न गया। बोला देश में उत्पादन की क्वालिटी पर किसी का ध्यान नहीं है। हम और हमारा उत्पादन, इतना निकम्मा है कि हमारे देश के जूते पत्थरों पर तो चल सकते है, लेकिन किसी के कनपटी पर मारो तो जूते जवाब दे देते हैं।

नेता ने उद्योग मंत्रालय और मानक संस्थान को कचरू के जूते के टुकड़े भेजते हुए लिखा, देखो ये है भारत के बने जूते। आदमी की कनपटी को भी नहीं सह सकते। हमारे देश में जूतों की मजबूती पर कोई ध्यान नहीं देता।

उद्योग मंत्रालय सकते में आ गया। उसने कहा कि उनका मंत्रालय उद्योगों को चलाने के लिये है। जूतों को अच्छा-बुरा बनाना तो उत्पादकों और कारीगरों पर निर्भर है। अतः शिक्षा और प्रशिक्षण के अभाव में जूतों की क्वालिटी गिर रही है। अगर मानव संसाधन मंत्रालय इस पर विचार करें तो बात बन सकती है।

मानव संसाधन मंत्रालय ने इस मामले को रसायन मंत्रालय पर छोड़ दिया। उसके अनुसार जब तक सही रसायन नहीं मिलेंगे जूते के दोनों हिस्से आपस में चिपक नहीं सकते।

रसायन मंत्रालय ने मामले पर रसायन फेर दिया। उसके अनुसार ये बेकार की बहस है।

दीनदयाल अस्पताल से कचरू और गबरू चार दिन बाद ही वापस आ गये। झुग्गियों के प्रधान ने दोनों को ढोलक छाप बीड़ी पिला कर आपस में मेल करवा दिया था। सर्दी अभी भी खूब थी। प्रधान ने कबाड़ और पुराने टायर का टुकड़ा जला रखा था। पुराने टायर की लपटों की गरमी लेते हुये गबरू बोला हमारे केस तो कई मंत्रालयों को महीनों तक चलेगा।

कचरू बोला, ‘यहां आदमी की कनपटी पर जूता पड़ा, ‘‘कोई नहीं बोला सारे के सारे जूते की क्वालिटी पर बकते रहे।’

कचरू बोला, ‘यहां आदमी के कनपटी पर जूता पड़ा। कान से खून निकला। दो-दिन तक कान सुन्न हो गया। झुग्गी के डेढ़ सौ लोग इकट्ठे हो गये। बात जो हो, बढ़ गयी और झगड़ा बढ़ गया, पर नेता ने हमारे सिर पर पानी के छींटे तक नहीं मारे।’

गबरू बोला, ‘यह तो अच्छा हुआ जूते का सोल निकल गया, वरना थोबड़ा टूट जाता।’

कचरू बोला, ‘जूते की मार से मैं तड़प रहा हूं और नेता जूते की क्वालिटी पर रो रहा था। अगर मैं मर जाता तो जूते क्वालिटी पर इनाम पाते।’

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