370010869858007

---प्रायोजक---

---***---

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

****

Loading...

जिसके चर्चे दूर तलक हैं, घर में वो गुमनाम बहुत है। तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें

-एक-

सावन की रितु धूल भरी है,

बरखा कुछ-कुछ डरी-डरी है।

​​

कि धूप हुई अम्बर की चेरी,

घर-आँगन की छाँव मरी है।

​​

सन्नाटों के कोलाहल में,

अभिलाषा रह गई धरी है।

​​

हमने कभी सहर न देखी,

ना संध्या से बात करी है।

​​

अंधियारे अनशन पर बैठे,

’तेज’ की जब-जब माँग भरी है।

​​

<><><>

-दो-

काम मेरा बदनाम बहुत है,

नाम मगर सरनाम बहुत है।

​​

घर-घर चर्चा घनी प्रेम की,

गली-गली कुहराम बहुत है।

​​

पायल को रुसवा करने को,

एक अदद इल्ज़ाम बहुत है।

​​

जिसके चर्चे दूर तलक हैं,

घर में वो गुमनाम बहुत है।

​​

‘तेज’ तनावों के बिस्तर पर,

सच जानो आराम बहुत है।

​​

<><><>

-तीन-

आयोग पर आयोग बिठाते रहिए,

गोया कि हरिक जुर्म छुपाते रहिए।

​​

सिरफिरे जाहिल उनींदे शख्स को,

थपकियाँ देकर ही सुलाते रहिए।

​​

जब कभी याँ न्याय की बातें उठें.

तो धार्मिक उन्माद जगाते रहिए।

​​

चीख़ हो रोटी की या सम्मान की,

आवाज मे आवज मिलाते रहिए।

​​

‘तेज’ कुछ करने की याँ प्रथा नहीं,

बस! वायदों के जाल बिछाते रहिए।

​​

<><><>

-चार-

बहुत गमगीन ग़ज़ल कहता है,

दर्द शाइर का असल लगता है।

​​

जिसके सीने में जलन होती है,

वो ही होंठों पे ग़ज़ल रखता है।

​​

एक वो है कि जमाने-भर में,

भूखे नंगों पे ग़ज़ल कहता है।

​​

कभी कहता है असल को नकली,

कभी नक़ली को असल कहता है।

​​

‘तेज’ हमने वो ज़मीं पाई है,

जहाँ सदियों से चलन बिकता है।

​​

<><><>

-पांच-

होंठ उनके गुलाब में लिखदे,

चाँद-तारे नक़ाब में लिखदे।

​​

मेरी जानिब से मेरे दुश्मन को,

प्यार मेरा जवाब में लिखदे।

​​

उनके अंतर में सजादे खुशियाँ,

दर्द मेरे हिसाब में लिखदे।

​​

जिनको पढ़ना है वो पढ लेंगे,

बात दिल की किताब में लिखदे।

​​

‘तेज’ झूमेंगे लोग जी भरके,

चन्द ग़ज़लें शराब में लिखदे।

​​

<><><>

-छ:-

बाकी कहाँ अब शहर में एतबार के दिन है,

याँ युद्धरत है आदमी, तकरार के दिन है।

​​

कि कैसे बचाएं बाँकपन खुशबू के गाँव का,

जाता हुआ मधुमास है, पतझार के दिन हैं।

​​

अपने भी दिन बनते-बिगड़ते हैं यूँ आजकल,

जैसे कि अपने देश की सरकार के दिन हैं।

​​

नए दौर ने कुछ इस तरह जकड़ा है आदमी,

कि बेवक्त ही ढलने लगे विस्तार के दिन हैं।

​​

ख़ामुशी का ज़हर तू कव तक पिएगा ‘तेज’,

नज़रें उठा कुछ बात कर इज़हार के दिन हैं।

​​

<><><>

-सात-

मौसमों की तरह आता-जाता है बरस,

जुगनुओं की तरह जगता-रोता है बरस।

​​

दिन को तो अन्धेरों का गुमाँ होता है,

रातों को दिन का राग सुनाता है बरस।

​​

कि अबकी बरस तारे ज़मीं पे निकलेंगे,

कैसे-कैसे हसीं ख़्वाब दिखाता है बरस।

​​

धरती को आसमाँ होने की दुआ देता है,

आसमाँ को समन्दर में डुबाता है बरस।

​​

‘तेज’ बच्चों को नए साल की टाफी देकर,

रिन्दों की गली घूमता फिरता है बरस।

​​

<><><>

-आठ-

मयकदों में आजकल उल्टा हिसाब है,

तल्ख़-दिल है साकिया मीठी शराब है।

​​

ढूँढता फिरता है क्या अंबर की छाँव में,

कि आज मेरे शहर का मौसब खराब है।

​​

इक दूसरे की बात को करता है तार-तार,

आज की मेहफिल का हर बंदा नवाब है।

​​

कि धर्मो-करम की बात हो या सियासती,

इंसानियत हर हाल ही खाना-ख़राब है।

​​

अब क्या कोई देगा मुझे सब्रो-करार,

यूँ भी तो अब ढलने लगा मेरा शाबाब है।

​​

होंठ तक खुलते नहीं हैं आजकल कि ‘तेज’,

सिर पर मेरे कुछ वक्त का ऐसा दबाव है।

​​

<><><>

-नौ-

किसने मेरे होंठों पे उँगलियाँ रख दीं,

जलती हुई साँसों पे चिमनियां रख दीं।

​​

वो कोई तो होगा कि जिसने चाँद की,

आँखों में, सूरज की पुतलियाँ रख दीं।

​​

छीनकर रौनक दरो-दीवार की किसने,

क्यूँकर मेरी चौखट पर बिजलियाँ रख दीं।

​​

आँख क्या झपकीं कि तेरी मेहफिल में,

किसी ने, मेरे जूड़े में तितलियाँ रख दीं।

​​

मिल के भी कभी आपसी बातें नहीं होतीं,

ये दूरियाँ कैसी हमारे दरमियाँ रख दीं।

​​

<><><>

-दस-

मुर्गों ने की खास मुनादी,

साँझ हुए ही बांग लगादी।

​​

जागो भी, देखो, सत्ता ने,

जनता की आवाज दबादी।

​​

नए दौर की राजनीति ने,

मानवता तक कैद करादी।

​​

देखो तो कल कोतवाल ने,

ना-करनी की सजा सुनादी।

​​

भ्रमण पर है सेवक अपना,

प्यादों ने पर आग लगादी।

​​

'तेज' ताकता रहा गगन को,

धरती पर बारूद बिछादी।

​​

<><><>

तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय।

​​

तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं।

​​

स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं।

​​

सामाजिक/नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।

​​

आजकल आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं।

​​

सम्पर्क : फोन—9911414511 : E-mail — tejpaltej@gmail.com

ग़ज़लें 8894613250852984891

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

रचनाकार में छपें. लाखों पाठकों तक पहुँचें, तुरंत!

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं.

   प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 14,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. किसी भी फ़ॉन्ट में रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com
कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.
उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.

इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.

नाका में प्रकाशनार्थ रचनाएँ भेजने संबंधी अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

आवश्यक सूचना : कृपया ध्यान दें -

कविता / ग़ज़ल स्तम्भ के लिए, कृपया न्यूनतम 10 रचनाएँ एक साथ भेजें, छिट-पुट एकल कविताएँ कृपया न भेजें, बल्कि उन्हें एकत्र कर व संकलित कर भेजें. एकल व छिट-पुट कविताओं को अलग से प्रकाशित किया जाना संभव नहीं हो पाता है. अतः उन्हें समय समय पर संकलित कर प्रकाशित किया जाएगा. आपके सहयोग के लिए धन्यवाद.

*******


कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

---प्रायोजक---

---***---

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव