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कहानी - अमलतास - रिन

हवा चलती और हर बार अपने साथ झाड़ देती ढेर सारे फूल! जमीन ढकती गई उन पीले फूलों से! झुक उठाया एक फूल.. 'अरे कितना मुलायम और हल्का है ये तो,सर!'

नीलेश फूल को हैरानी से उलटता पलटता हुआ बोला!

'अमलतास है ये...तुमने पढ़ा होगा साइंस में...अरे हाँ तुम तो एंथ्रोपोलॉजी पढ़ रहे हो!' प्रोफेसर केदार भी एक फूल उठाते हुए बोले!

पूरे रास्ते सड़क के दोनों ओर अमलतास के पेड़ लगे हुए थे और लदे थे ढेर पीले फूलों से! जब भी चलती हवा तो मानो पीले फूलों की बारिश होने लगती!

'कासिया फिसतुला!' प्रो केदार बोले!

'जी सर!' नीलेश ने हैरान हो प्रो केदार की तरफ देखा!

'इसका नाम है.... इसे गोल्डन रेन ट्री भी कहते है!' केदार फूलों के लटकते गुच्छों को छूते हुए चल रहे थे!

'पर सर इतने पेड़.. आप का फार्म हाउस तो बस इन्ही से ढका हुआ है!' नीलेश चारों ओर देखता हुआ बोला!

'आओ वहां बैठते हैं!' एक बेंच की तरफ इशारा कर केदार बोले!

दोनों बेंच पर बैठे चलती हवा और झड़ते फूलों को खामोशी से देख रहे थे!

'आपको अमलतास के पेड़ बहुत अच्छे लगते हैं!' नीलेश एकटक पेड़ों की तरफ देखता हुआ बोला मानो विश्वास करना चाहता हो कि किसी को कोई पेड़ इतना कैसे अच्छा लग सकता है कि उसने कोई ओर पेड़ ही न लगाया हो!

केदार भी एकटक पेड़ों की तरफ देख रहे थे!

'बचपन में हम बच्चे इन फूलों को खाया करते थे,बकरियों की तरह!' कह कर हँसे केदार!

'पर इन्हें उगाने का कभी सोचा नहीं था... पर आज से कई साल पहले... शायद 1960 की ही बात है,मैं एम एस सी के तीसरे साल में था(आँखें बंद कर जाने कहाँ खोये से बोले रहे थे प्रो.केदार, चेहरे पर एक छोटी सी मुस्कराहट आयी उनके) अब की तरह कोई इंटरनेट या मोबाइल तो होते नंही थे...बस मैगजीन्स होती थी और किसी कोने में कोई एक फ़ोन बूथ होता था और जिसके बाहर जी टी रोड जैसी लम्बी लाइन होती थी और वो उस रोड की तरह पुरानी होती जाती थी!' कहते कहते रुक गए केदार!

नीलेश ध्यान से प्रो केदार को सुन रहा था, अचानक उनके चुप होने पर उसने उनकी तरफ पलट कर देखा! वो एकटक ऊपर पेड़ों की तरफ देख रहे थे!

'एक दिन डिपार्टमेंट में मेरे नाम एक चिट्ठी आयी... किसी लड़की की थी! मैं तो बस हैरान देखता रह गया! मैं तो अपने डिपार्टमेंट की लड़कियों से तक ठीक से बात नहीं कर पाता था और मुझे कोई चिट्ठी लिखे...और वो भी लड़की... मैं हैरान सा सोचता रह गया और चिट्ठी ले घर आ गया!' केदार कह कर हल्के से हँसे !

'बहुत ही धड़कते हुए दिल के साथ मैंने चिट्ठी खोली...आदरणीय केदारजी, आप का लेख पढ़ा सरसों के फूलों पर! बहुत अच्छा लगा! मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हूँ! शुभकामनाओं के साथ, कादंबरी..... पते के नाम पर पोस्ट बॉक्स नम्बर था.. आदरणीय केदार को ज्यादा नही तो सौ बार मैंने पढ़ा होगा! इतना आदर मैंने अपने आप को कभी नहीं दिया जितना उस दिन दिया था! मैंने चिट्ठी का जवाब उसी दिन फटाफट दिया साथ ही घर का पता भी, मैं नहीं चाहता था कि फिर से डिपार्टमेंट में कोई चिट्ठी आये!' केदार फिर वैसे ही रूके, पर नीलेश ने ज्यादा सोचा नहीं वो वैसे ही पेड़ों की ओर देखता रहा!

'दिन बीतने लगे, मैं हिसाब लगता रहा कि आज चिट्ठी भेजी है दो दिन बाद मिलेगी वगैरह वगैरह... पर एक हफ्ता फिर दो... फिर महीना बीत गया, मैं सोचने लगा कि भला 'थैंक यू' का भी कोई जवाब आता है! मैंने अपना ध्यान वापस अपने में लगाया और इंतज़ार करना बंद कर दिया! पर एक दिन जब डिपार्टमेंट से घर आया तो टेबल पर चिट्ठी देख मुझे

इतनी खुशी हुई मानो गोल्ड मेडल मिला हो बोटनी में!' हँस पड़े केदार बोल कर साथ ही नीलेश भी!

'मैं समझ सकता हूँ सर, जैसे हमें खुशी होती है फोन में मैसेज देख कर!' नीलेश, केदार की तरफ देख मुस्कराया और बोला!

'नहीं शायद उससे भी ज्यादा... वो भी बोटनी में पढ़ाई कर रही थी... बस हम दोनों फूल-पत्तियों से जो शुरू हुए तो साल भर में दिल और यादों पर पहुंच गये! मेरा दिल मिलने का करने लगा था पर कादम्बरी ने मना कर दिया,उसने मुझे कहा कि उसे लड़कों पर भरोसा नहीं होता है(नीलेश ने हैरान हो प्रो केदार की तरफ देखा तो वो चौंक कर बोले) अरे नहीं-नहीं, दरअसल उसके पिता ने उनकी माताजी को छोड़ दिया था तो इसलिए वो मुझे अच्छे से आज़मा लेना चाहतीं थी! तो जी उन्होंने मुझे अपनी एक चिट्ठी में दस-बीस अमलतास के बीज भेजे और कहा कि इन्हें उगाओ! जब वो मेरे घर आयें तो रस्ते में दोनों ओर अमलतास के पेड़ हो! इस बीच मेरी पढ़ाई पूरी हो जायेगी और मैं जॉब में भी आ जाऊंगा! मतलब के अगले पांच छ: साल तक न हम मिल पाएंगे और न एक दूसरे की फोटो ही देख पायेंगे!'

केदार बोले तो नीलेश यह सुन हँसते हुए बोला कि -

'ये तो रिस्क वाली बात हो गई न सर... छ: साल तक वेट किया और एक दिन सामने सरप्राइज़ में से सर गायब हो गया और टुनटुन प्राइज़ में मिली!' सुन कर केदार इतनी जोर से हँसे की उनके आँसू निकल आये!!

'हाँ हो सकता था पर मुझे ये सब ख्याल ही नहीं आया...मुझे तो बस कादम्बरी की वो प्यारी बातें ही याद रहती थी जो वो हर चिट्ठी में मुझे लिख कर भेजा करती थी! यूँही एक साल और निकल गया! ऍम एस सी  के लिए अब ज्यादा पढ़ना पढ़ता था! हाँ इस बीच ऐसा हुआ कि हमारे डिपार्टमेंट में एक नई प्रो. आई! बेहद खूबसूरत और अच्छी प्रो. थी वो! उनका नाम था सुरबाला! ये उनका पहला जॉब था! मुझसे ये कोई छ: या सात साल वो बड़ी थी, पर दिखने में छोटी लगती थी! हम लोग बहुत ही जल्द अच्छे दोस्त बन गये!' केदार बोले, वो कुछ बोलने ही वाले थे कि नीलेश  हँसते हुए बोला -

'देखा सुंदर लड़की देख कर आप भी अपनी गर्ल फ्रेंड भूल गये!'

'अरे बिलकुल नहीं, बल्कि सुरबाला मेरी चिठ्ठियों को सुंदर बनाने में मेरी मदद करती थी और गिफ्ट छांटने में भी! बस समय जा रहा था! सुरबाला का दुनियाँ में कोई नहीं था तो बार-त्यौहार पर हमारे यहाँ आती थी और मेरी माताजी को बेहद पसंद आने लगी थी! इतनी कि उन्हें सुरबाला का मुझसे उम्र में बड़ा होना भी बुरा नहीं लगता था! पर मेरा दिल तो कहीं और था! तीन साल बीत गये थे अब तक!पर जाने क्या हुआ कि धीरे-धीरे कादम्बरी की चिट्ठियाँ कम होने लगी! जो पहले हफ्ते में दो होती थी एक होने लगी फिर पंद्रह दिन में एक और फिर महीने में एक फिर दो महीने में एक! पूछने में पता चला पढ़ाई की वजह से! मैंने भी मान लिया! अमलतास के पेड़ अब काफी बड़े हो चुके थे और उनमें फूल आने लगे थे! ये सारी हमारी पुश्तैनी ज़मीन है, और मैंने इसे अमलतास गार्डन बनाना शुरू कर दिया! मेरे माँ पिताजी मुझे इतना प्यार करते थे कि किसी ने कुछ नहीं पूछा इस पागलपन के बारे में!फिर धीरे-धीरे मेरी चिठ्ठियों के जवाब आने ही बंद हो गये! एक साल हो गया पर कोई जवाब ही नहीं आया! अगर सुरबाला नहीं होती तो मैं शायद दीवाना हो जाता! इलाहाबाद गया तो पता चला कि वो बॉक्स बंद हो चुका है! जिनका था उन्होंने बंद करवा दिया है! पता पूछने पर मना कर दिया कि नहीं बता सकते! चार साल हो चुके थे मुझे यूँ अमलतास बोते और उनकी देखभाल करते हुए! चिट्ठियाँ बंद हुए अब दो साल बीत गये! माँ अब ज़िद पर ऊतर आयी थी और उनकी ज़िद के आगे मुझे झुकना पड़ा और सुरबाला से शादी हो गई! लाइफ बिलकुल बदल गई! सुरबाला इतनी अच्छी थी कि मुझे धीरे धीरे कादम्बरी की याद कही भी दिखाई देनी बंद हो गई! हाँ पर अमलतास

उगाना मेरी आदत बनती गई!' केदार कहते कहते रुके मानों थक गये हों!

हवा अभी भी फूलों को बिखेर रही थी! तभी फ़ोन बज उठा!

'चलो खाना लग चुका है!' केदार नीलेश से बोले और दोनों बंगले की ओर चल पड़े!

'रात को बहुत सुनसान हो जाता होगा यहाँ!' नीलेश आस-पास देखता हुआ बोला!

'हाँ, पर इतना नहीं, वर्कर्स है...गार्ड्स है और ये पेड़ है...सब है!' केदार अपनी ही बात पर हँसे! नीलेश भी हँस पड़ा!

खाना खा कर दोनों फिर बाहर घूमने आ गये!

'सर, हम दोनों ही थे खाने की मेज़ पर और कोई नहीं था!' नीलेश  बोला!

'हाँ, यहाँ अब मैं ही रहता हूँ... बेटा हमारा विदेश,अमेरिका में रहता है!' केदार बोले!

'और मैडम?'नीलेश ने पूछा!

'वो और हम शादी के दस साल बाद अलग हो गये थे!' केदार कहते कहते रुके और फिर चलने लगे!

'अलग!' नीलेश  हैरान था!

'हाँ,अलग... ज़िन्दगी कभी-कभी कैसे-कैसे मोड़ दिखाती है पता नहीं चलता कि किस तरफ का रास्ता मंज़िल तक ले जायेगा! दिल्ली एक सेमिनार में देश-विदेश से प्रोफेसर आये थे.. वहीं अमेरिका से आयी एक प्रोफेसर के.के.सिन्हा से मुलाकात हुई! मुझे देख वो इतनी खुश हुई कि उनकी आँखों से आँसू निकल आये! मुझे हैरानी हुई,पर मैंने कुछ कहा नहीं!

मेरे साथी ने बताया कि उनका पूरा नाम कादम्बरी केदार सिन्हा है! सुनते ही मेरी आँखें भर आयी! ये मेरी ही कादम्बरी थी! उसने मुझसे कहा था कि वो अपने नाम में मेरा नाम जोड़ लेगी अगर कभी वो मिल न पाये तो! उसने वही किया! मैं रोना चाहता था! जानना चाहता था कि वो मुझे छोड़ कर क्यों गई! वो मिली भी और जो कुछ मुझे पता चला वो इतना घिनौना था मेरी नज़र में कि मैं बयाँ नहीं कर सकता! कोई इतना खुदगर्ज़ कैसे हो सकता था! कादम्बरी वापस चली गई! मैंने उसे बताया कि मैंने ढेर अमलतास लगाएं है! तो जानते हो उसने क्या कहा ... उसे पता हैं क्योंकि वो एक बार मेरे घर आयी थी जब मैं इलाहाबाद उसे देखने गया था! गेट के जाले से लगे-लगे उसने अंदर पीले फूलों का जंगल देखा था और वो बहुत खुश हुई थी!' केदार एकटक फूलों की तरफ देख बोल रहे थे!

'पर वो आपको छोड़ कर क्यों गई सर?' नीलेश ने पूछा!

'वो छोड़ कर नहीं गई थी .... सुरबाला ने झूठ बोल कर छुड़वा दिया, ये कह कर कि कादम्बरी हम दोनों के बीच में आ रही हैं! जाने क्या क्या लिख कर सब बर्बाद कर दिया!' कहते हुए केदार की आँखें भर आयी!

फिर हँसते हुए बोले - 'हाँ, वो टुनटुन बिलकुल नहीं थी बेहद ही प्यारी सी लड़की थी! लगता ही नहीं था कि मैं किसी छत्तीस सैंतीस साल की महिला से मिल रहा हूँ! उस दिन मेरा दिल बहुत दुखा था! मुझे लग रहा था कि मैं अपनी ही नज़रों से गिर गया! जबकि मेरी कोई गलती नहीं थी फिर भी!' केदार फिर दुखी हो बोले!

'फिर कादम्बरीजी ने आपसे शादी की?' नीलेश ने पूछा तो केदार रुके और पेड़ का सहारा ले घास पर बैठ गये!

'सेमीनार के कुछ ही हफ्ते पहले कादम्बरी ने शादी कर ली थी, वहीं के अपने साथी प्रोफेसर से और वो बहुत खुश थी अपनी ज़िंदगी में! अपने बेटे को मैंने बाद में उन्हीं के पास भेजा पढ़ने के लिए! कादम्बरी से अच्छा कौन देख पता मेरे बेटे को!' केदार कहते हुए अब घास पर लेट गये! उनकी देखा-देखी में नीलेश भी लेट गया!

'सर, लाइफ भी अजीब चीज है, हैं न ... हम जिन्हें क्या समझते है वो क्या निकलते है और फिर क्या निकलते है... कुछ समझ नहीं आता है!'

नीलेश आसमान में उड़ती चीलें देखते हुए बोला!

'अब बस मैं हूँ और ये मेरा अमलतास का जंगल है!' प्रो केदार बोले और उन्होंने आँखें बंद कर ली थी, शायद वो थक गये थे!

हवा अभी भी अमलतास के फूल बिखेर रही थी और दूर ऊपर आसमान में चीलें गोल-गोल घूमती हुई उतर रही थी! कोई कविता थी जो केदार सोच रहे थे-

जब हवा ठहर जायेगी

पीले फूलों पर

तुम रुक जाना कहीं 

बस कहीं चलते हुए

उन पीले फूलों के

किनारों पर..

और मैं अमलतास बन

बिखेरती रहूंगी

तुम पर ढेर फूल

दिन की हवाओं

और रात की

चांदनी के साथ...

और ये फूल..

पीले फूल बस

झड़ते रहेंगे

बस झड़ते रहेंगे...

मानो कोई याद हो

किसी की... जो ठीक से

पहुंची नहीं थी

किसी की यादों तक!! 

अगले दिन मैं वहां से चला आया! कुछ टाइम बाद पता चला कि सर जो खोये-खोये से अक्सर रहते थे अपने उस अमलतास के जंगल में, एक दिन वहीं उन पीले फूलों के बीच हमेशा के लिए खो गये! इस बात को आज बरसों बीत गये हैं! मैं कभी कभी जाता हूँ सर के उस जंगल को देखने! सर की कविता की तरह मुझे भी लगता है कि .. मानों कोई याद है किसी की ..जो ठीक से पहुंची नहीं थी किसी की यादों तक!

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