370010869858007

---प्रायोजक---

---***---

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

****

Loading...

लघुकथा - सार्थक मूल्य - ज्ञानदेव मुकेश


              
                           सार्थक मूल्य
   
  ग्राहक ने दुकानदार से पूछा, ‘‘यह मूर्ति कितने की है ?’’
  दुकानदार ने दाम बताया, ‘‘सात सौ रुपए।’’
  ग्राहक को दाम मुनासिब नहीं लगा। उसने मोल-मोलाई शुरू कर दी। पूछा, ‘‘पांच सौ मे दोगे ?’’
  दुकानदार ने दो पल की चुप्पी साधे रखी। फिर राजी होते हुआ कहा, ‘‘ठीक है।’’
  तभी ग्राहक की पत्नी वहां आ पहुंची। उसने मूर्ति की कीमत सुनी तो वह चिहुंक पड़ी। उसने पति को डांट पिलाई। उसने प्रश्न दागा, ‘‘तुम्हें यह मूर्ति पांच सौ की लगती है ? इसकी कीमत तीन सौ से अधिक हो ही नहीं सकती है।’’
  पत्नी ने दुकानदार को एक तरह से अल्टीमेटम दिया, ‘‘यह मूर्ति तीन सौ में देनी है तो दो। वरना हमलोग चले।’’
  दुकानदार मूर्ति को कुछ पल निहारता रहा। फिर उसने हथियार डालते हुए कहा, ‘‘ठीक है। निकालो तीन सौ।’’
सौदा पूरा हुआ। विजयी होने का अनुभव करते हुए ग्राहक और उसकी पत्नी वह मूर्ति लेकर चले गए।
मगर आश्चर्य कि दुकानदार के चेहरे पर भी खुशी और संतोष की रेखाएं तिर रही थीं। दुकानदार की पत्नी भी पास बैठी थी। हार पर भी खुशी और संतोष का अनुभव करते हुए देख उसने पति से पूछा, ‘‘मुझे तुम्हारा संतोश समझ में नहीं आ रहा।’’
दुकानदार ने खुलासा करते हुए कहा, ‘‘मैं दरअसल बेईमानी के आसमान पर चढ़ा गया था और ज्यादा मुनाफा अर्जित करना चाह रहा था। मगर ग्राहक और उसकी पत्नी मुझे मुनाफे के आसमान से उतार कर सही कीमत की जमीन पर ले आए। मैंने बेशक बेमुनासिब मुनाफे का धन नहीं कमाया, मगर सही कीमत पाकर, उचित मूल्य का सुख और संतोश का धन पाया। इस सुख की बात ही कुछ और है। इसलिए तुमने मेरे चेहरे पर खुशी और संतोष की रेखाएं देखीं।’’
पत्नी ने उत्सुकतावश पूछा, ‘‘आखिर उस मूर्ति का मूल्य क्या था ?’’
दुकानदार ने रहस्य हटाया और कहा, ‘‘उस मूर्ति का वास्तविक विक्रय मूल्य तीन सौ रुपए ही था। मैं तीन सौ पाकर बहुत खुश हूं। ’’

                                                    - ज्ञानदेव मुकेश                                               
                                     पता-
                                                 फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                                 अल्पना मार्केट के पास,
                                                 न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, 
                                                 पटना-800013 (बिहार)

e-mail address - gyandevam@rediffmail.com

लघुकथा 7162357562337442367

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

रचनाकार में छपें. लाखों पाठकों तक पहुँचें, तुरंत!

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं.

   प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 14,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. किसी भी फ़ॉन्ट में रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com
कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.
उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.

इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.

नाका में प्रकाशनार्थ रचनाएँ भेजने संबंधी अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

आवश्यक सूचना : कृपया ध्यान दें -

कविता / ग़ज़ल स्तम्भ के लिए, कृपया न्यूनतम 10 रचनाएँ एक साथ भेजें, छिट-पुट एकल कविताएँ कृपया न भेजें, बल्कि उन्हें एकत्र कर व संकलित कर भेजें. एकल व छिट-पुट कविताओं को अलग से प्रकाशित किया जाना संभव नहीं हो पाता है. अतः उन्हें समय समय पर संकलित कर प्रकाशित किया जाएगा. आपके सहयोग के लिए धन्यवाद.

*******


कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

---प्रायोजक---

---***---

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव