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संस्मरण - आत्मालाप- मेरे बड़े भाई! - देवेंद्र कुमार पाठक


मुझ नाचीज़ ने 64 बरस का सफ़र तय कर लिया पर स्कूल के दाखिल-ख़ारिज रजिस्टर के अनुसार मैं अभी 63 बरस का ही हूँ. इससे कुछ ख़ास फर्क तो नहीं पड़ता कि आप अभी कुछ महीने कमउम्र हैं या आज नहीं, कभी और दिन, तिथि, वर्ष में जन्मे थे. फिर जब आपने 60 या 62 वर्ष की आयु पूरी कर ली और सेवा निवृत्त हो चुके, तो यह प्रलाप क्यों? पर क्या करें, अपने सोचने-समझने का ढंग-ढर्रा ही अलीक सा है.

अब भला जो बन्दा 17 माह पहले बिना 62 वर्ष का हुए ही सेवानिवृत्त हो ले और एक बेढर्रे की दिनचर्या में पड़कर 78 से बढ़कर 90 किलो वज़न के शरीर में आधा दर्जन रोगों का पालनहार होने-कहलाने की दुर्नियति को भोगने को बाध्य हो जाये, वह उम्र को लेकर भला क्यों न रंड़वा-रोदन करे. एक तो 17 माह के आधे वेतन का नुकसान ऊपर से बीमारियों की जाँच, दवाइयों, डॉक्टरों की फ़ीस, परहेजी आहार-विहार का बढ़ा खर्च ;आह, करेले को नीम पर चढ़कर कुछ और कड़वा होने का मौका मिल गया; कुछ यूँ कि आचार-विचार, सोने-जागने, बैठने-उठने, चलने-फिरने, सोचने-समझने, बोलने-बतियाने और लिखने-पढ़ने पर भी रोक-टोक! बस इसीलिये यह रँड़वा-विलाप-प्रलाप करने का अधिकार हम कैसे छोड़ दें? जब आप देश-समाज के सरपरस्तों की अंधेरगर्द सरपरस्ती में सब कुछ छोड़ने को हम बाध्य हैं!. . . .

काश हमारी दादी ने स्कूल में दाखिले के वक़्त ठीक-ठाक जन्मतिथि बड़े पंडज्जी से कही-लिखाई होती, तो इस बुढ़ापे में हमारे ढंग-ढर्रे औरों जैसे तो न होते ! अपना दुखड़ा क्या कहें? दादी ने तो सही-सही ही बताया पंडज्जी से, "हमरा ई पोता हरछठ के दिना भादों में भवा पण्डज्जी!" पर उनने17 माह और पीछे खदेड़ मार्च में धर फेंका. बड़े हुये तो इस रहस्य को उजागर किया हमारे बड़े भाई ने. . . . . . . . दरअस्ल हमारे बड़े भाई पहलौठे लाड़ले थे दादाजी के; स्कूल जाने के नाम पर पाजामा गीला हो जाता था उनका. और तब के पंडज्जी, वाह! कनेर की लम्बी सटकी ले गली-गली से भगोड़ों को पकड़ स्कूल ले जानेआते. बड़ी जमात के लड़कों की वानर सेना के साथ. हमारे आदरणीय अग्रज, नाक के बाल थे दादा जी के; पकड़ में आते ही न थे. भाई को अपनी पीठ से चिपकाकर दादा रजाई ओढ़ लेते. . . . भाई की उम्र जब ज्यादा हो गई, तब जाकर वे स्कूल के रास्ते पर आ सके. मज़बूरी थी.

दादाजी रजाई से निकले और चारों धाम तीर्थयात्रा को जो निकले, तो लौटे ही नहीं. केदारनाथ तीर्थ में ही ठंडे हो गये. श्वेतवसना दादी अकेली लौटीं. . . राखी के त्यौहार पर माँ मायके आईं; भाई, मैं और छोटी दुधमुंही बहन साथ आये. . . . . हरछठ के पहले 'बहुला चौथ' को गांव लौट आईं माँ पर भाई पढाई के डर से ननिहाल में ही रुक गये. 'कजलियाँ' सिराने का लोकपर्व हमारे महाकोशल ग्राम्यांचल के गांव-गंवइयों में राखी के दूसरे दिन मनाते हैं. . . लगते भादों के महीने की चौथ तिथि 'बहुला चौथ' को बिना हल में जुते जवान बैल की पूजा माताएं करती हैं. भारतीय गंवई कृषक जीवन की संस्कार-परम्परा में भूमि, जल, जंगल, पेड़, हवा, आग, पशु-पक्षियों और लोक राग-रागिनियों, गीतों की भूमिका और महत्वपूर्ण भागीदारी बड़ी अर्थवान है. प्रकृति से श्रम और श्रमिकों के रिश्तों की संवेदना की समझ-बूझ के लिए हमें आज किताबें पढ़नी पड़ती हैं, हमारे पुरखों ने अपने जीवन, जरूरतों और परिवेश-परिस्थितियों को अनुभवों की पाठशाला में पढ़ा-परखा था.

हलधर 'बैल' की पूजा के तीसरे दिन हलषष्ठी को 'बलराम जयंती' होती है. हलधर बलराम-दाऊ, जो हलधर कोल हलवाह-आदिवासी भूमिजनों के पूज्य हैं. फिर 'कृष्ण जन्माष्टमी' : ये सब भादों के अंधियारे पाख में और उजियारे पाख में गणेश और शिव-पार्वती से जुड़े व्रत-उपवास, पूजा के पर्व-त्यौहार हैं. मैं नहीं समझ पाता हूँ कि गोवंश, दूध-दही, पेड़-पहाड़, नदी-जल, भूमि-श्रम और मेहनतकश अहीरों से जुड़े कृष्ण-बलराम कब-कैसे और क्यों महाभारत की राजनीति, विद्वेष, छल-छद्म, युद्ध और अपनी महानता के अतिवादी आत्मबखान 'गीता' से जुड़ गए गए? . . . . . .

नाना ने हमारे बड़े भाई का दाखिला अपने ही बरामदे में नई-नई खुली पाठशाला में करवा तो दिया पर भाई वहां भी न टिके. अगले बरस उनका नाम जब गांव के में लिखा गया, तो वे फिर पहली कक्षा में थे. एक बरस बाद जब मेरा दाखिल हुआ तो मेरे और भाई की उम्र के अंतर को तीन बरस करने के फेर में17 माह बड़ा होकर मैं स्कूल के दाखिला रजिस्टर में दर्ज़ हुआ. बड़े पंडज्जी के रिटायर होने के बाद जो नये पण्डज्जी आये, उन्हीं ने यह उम्र का हेर-फेर किया था. . . .

बड़े भाई आगे की पढ़ाई में हाईस्कूल भी पास नहीं कर सके, पर इलाके के पहलवान जरूर बने. वे कई रामलीलाओं में परशुराम, हनुमान, बालि, अंगद आदि के सरूप धरते. भाई जब दो बच्चों के पिता बन चुके, बत्तीस की उम्र में, तब उन्हें रेलवे में खलासी की नौकरी मिली थी. . . . . .

मेरे बड़े भाई अब नहीं हैं. वे 54 बरस की आयु में ही मुझे छोड़ गये.

भले ही उनकी जन्मपत्री में तो दीर्घायु अंकित है!

और मेरी जन्मपत्री में43में मेरी मृत्यु!

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आत्माआत्मपरिचय-देवेन्द्र कुमार पाठक

म. प्र. के कटनी जिले के गांव भुड़सा में 27 अगस्त 1956 को एक किसान परिवार में जन्म. शिक्षा-M. A. B. T. C. हिंदी शिक्षक पद से 2017 में सेवानिवृत्त. नाट्य लेखन को छोड़ कमोबेश सभी विधाओं में लिखा . . . . . . 'महरूम' तखल्लुस से गज़लें भी कहते हैं. . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
. 2 उपन्यास, ( विधर्मी, अदना सा आदमी ) 4 कहानी संग्रह, ( मुहिम, मरी खाल : आखिरी ताल, धरम धरे को दण्ड, चनसुरिया का सुख ) 1-1 व्यंग्य, ग़ज़ल और गीत-नवगीत संग्रह, ( दिल का मामला है, दुनिया नहीं अँधेरी होगी, ओढ़ने को आस्मां है ) एक संग्रह 'केंद्र में नवगीत' का संपादन. . . . . . .   ' वागर्थ', 'नया ज्ञानोदय', 'अक्षरपर्व', ' 'अन्यथा', , 'वीणा', 'कथन', 'नवनीत', 'अवकाश' ', 'शिखर वार्ता', 'हंस', 'भास्कर' आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित. आकाशवाणी, दूरदर्शन से प्रसारित. 'दुष्यंतकुमार पुरस्कार', 'पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पुरस्कार' आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित. . . . . . . कमोबेश समूचा लेखन गांव-कस्बे के मजूर-किसानों के जीवन की विसंगतियों, संघर्षों और सामाजिक, आर्थिक समस्याओं पर केंद्रित. . . . . .

सम्पर्क-1315, साईंपुरम् कॉलोनी, रोशननगर, साइंस कॉलेज डाकघर, कटनी, कटनी, 483501, म. प्र. ; ईमेल-devendrakpathak. dp@gmail. com

संस्मरण 723762472854476411

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