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मिस यू माँ" ( संस्मरण) - डॉ कविता"किरण"

मां! तुम मुझको छोड़ के तन्हा

ऐसे कैसे जा सकती हो....????

28 जनवरी 2019 की वह भयावह रात मुझसे कभी भी भुलाई नहीं जा सकेगी जब मेरी जन्मदात्री ने मेरे साक्ष्य में अपनी मृत्यु के रसीदी टिकट पर अपने हस्ताक्षर किए। कितने सारे संयोग हुए थे उस दिन। जो किसी अकल्पनीय कहानी से कम नहीं हैं।

25 जनवरी को मुझे अपनी भांजी के वैवाहिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने मुम्बई जाना था। 23 जनवरी को मैं फालना से... मेरी बेटी अहमदाबाद से... और मम्मी मेरे मौसेरे भाई भाभी एवं उनके दो छोटे बच्चों के साथ उदयपुर से मुम्बई पहुंचे। पांच दिनों तक हम तीन पीढ़ियों मैं, मेरी मम्मी और मेरी बेटी ने 24 घण्टे प्रतिपल हंसी-खुशी के साथ बिताये एवम विवाह समारोह का भरपूर आनंद लिया। 27 जनवरी को हमारी घर वापसी थी। मौसेरे भैया एवम मेरी बिटिया वापसी के लिए निकल चुके थे। क्योंकि उन्हें अगले दिन ऑफिस जॉइन करना था। लेकिन मम्मी,भाभी एवम बच्चे एक दिन और रुकने वाले थे। मेरी भी 27 जनवरी की ही फालना की वापसी की ट्रेन टिकट थी...जो वेटिंग ही रह गयी। ऐसे में सबकी सलाह से मैंने फिर अगले दिन की नई टिकट बनवाई। लेकिन संयोगवश वह भी कन्फर्म नहीं हो सकी।

इधर एक और संयोग ये हुआ कि उदयपुर के लिए मम्मी की सिंगल स्लीपर की बजाय डबल स्लीपर टिकट बुक हो गयी । अतः मम्मी मुझसे लगातार आग्रह कर रही थी कि मैं उसके साथ उदयपुर चली चलूं और वहां एक दिन रुककर फिर फालना निकल जाऊं। लेकिन क्योंकि मेरी ट्रेन की रिटर्न टिकट पहले से बुक हो चुकी थी और मुझे बस का सफर प्रायः सूट नहीं करता, इसलिए मैंने मम्मी से ये कहकर कि " मैं एक बार फालना जाकर वापस आपके पास आ जाऊँगी" साथ जाने से इंकार कर दिया।

लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंज़ूर था।

सच तो ये है कि हमारे भविष्य की स्क्रिप्ट विधाता पहले से ही लिख चुका होता है। हमें तो बस उस स्क्रिप्ट के अनुसार एक्ट करना होता है।

28 जनवरी को शाम 5 बजे मम्मी भाभी एवं बच्चों के साथ बस पकड़ने के लिए कैब में बैठ चुकी थी।दीदी उनको बस तक छोड़ने जा रही थी। ठीक उसी समय 5 बजे चार्ट प्रिपेयर होते ही मेरी बेटी ने फोन पर सूचना दी कि आपकी टिकट वेटिंग ही रह गयी है। टिकट कन्फर्म न होने की वजह से मैं बहुत परेशान और पेशोपेश में थी। क्या करूँ क्या न करूँ कुछ समझ नहीं आ रहा था। जीजाजी ने फिर वही अगले दिन निकलने की सलाह दी। लेकिन तभी एकाएक मेरे विवेक ने निर्णय ले लिया। मुझे लगा यहां और रुकने से बेहतर है मैं मम्मी के साथ उदयपुर तक बस से निकल जाऊं..कम से कम घर के नज़दीक तो पहुंच जाउंगी। सो मैं भागकर लिफ्ट से नीचे पहुंची। दीदी को कैब से उतारा और स्वयम उसमें सवार हो गयी मम्मी के साथ उदयपुर जाने के लिए।मुझे देखकर ममी के चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ गयी।

शाम को लगभग साढ़े छह बजे ट्रेवल्स की एयरकंडीशंड बस के डबल स्लीपर में मैं अपनी मम्मी के साथ उदयपुर के लिए यात्रा कर रही थी। भाभी बगल वाले केबिन में अपने बच्चों के साथ थीं। रात साढ़े आठ बजे तक ममी ने मुझसे ढेर सारी बातें कीं।जैसा कि कहा जाता है माँ अपने दुख-सुख की सारी बातें हमेशा अपनी बेटी के साथ ही साझा करती है। वही हुआ। कुछ शिकवे शिकायतें उलाहने और बहुत सी घर परिवार की बातें। शादी की बहुत थकान थी मुझे। फिर एक दिन पहले मम्मी को रात में थोड़ी बैचेनी और सांस लेने में तक़लीफ़ भी हो रही थी। मुझे लगा ये मुम्बई की आर्द्र वायु और सफोकेशन की वजह से है जैसा प्रायः कई लोगों को हो जाता है।लेकिन दिन में मम्मी एकदम सामान्य दिखीं। फिर भी वापसी वाले दिन दोपहर में मैं और दीदी मम्मी को निकट के आरोग्य निधि अस्पताल में ले गए। डॉक्टरी परामर्श के अनुसार कुछ ज़रूरी जांच औऱ टेस्ट करवाकर 5 दिन की दवा दिला लाये। बाकी कुछ टेस्ट उदयपुर में लौटकर करवाने थे।अतः दवा की एक खुराक ममी ने उसी समय ले ली थी। बस में रात वाली दूसरी ख़ुराक ममी को देने के बाद हम दोनों सो गए।

आधे ही घण्टे बाद लगभग 9 बजे ममी ने मुझे ज़ोर से हिलाया। मैं नींद से हड़बड़ा कर उठ बैठी। मम्मी को फिर से बैचेनी हो रही थी। मेरे समझ में नहीं आया मैं क्या करूँ। कैसे उनकी तक़लीफ़ दूर करूँ। उनकी छाती एवम पीठ को सहलाया। पानी पिलाया। लेकिन उनकी घबराहट कम नहीं हुई। मुझसे उसकी यह दशा देखी नहीं जा रही थी। मेरी आँखों में आंसू आ गए । उसी समय तुरंत मैंने उदयपुर अपने छोटे भाई को फोन लगाकर मां की स्थिति से अवगत कराया। मगर इतनी दूर होने से वो सिवाय सलाह देने के और कुछ कर भी नहीं सकता था। उसका कहना था आप मम्मी को लेकर वापस मुम्बई लौट जाओ और उनको वहीं किसी डॉक्टर को दिखाओ। जोकि सम्भव नहीं था।क्योंकि एक तो हम ममी को अस्पताल में दिखाकर और डॉक्टर की परमिशन लेकर ही निकले थे। दूसरी बात उस दिन दीदी के यहां दुल्हन का पग फेरा था। बेटी दामाद पहली बार खाने पर आनेवाले थे। वे सब परेशान हो जाते। उस पर मुम्बई से निकले हमें चार घण्टे हो गए थे। हम अंधेरी रात में हाइवे पर ऐसी जगह से गुज़र रहे थे जहां से आगे पीछे जाने के लिए कोई भी साधन मिलना लगभग असंभव था।दूर दूर तक कोई बस्ती नज़र नहीं आ रही थी।

कुल मिलाकर मुझे ही इस विकट परिस्थिति का सामना करना था। सो मैंने सबसे पहले तो केबिन के शटर सरका दिये ताकि ममी को थोड़ी ताज़ा हवा मिल सके। लेकिन स्थिति यथावत बनी रही। कुछ देर बाद उस ज़ोर से हिलती हुई बस में मैं जैसे-तैसे अपनी बाहों का सहारा देकर उन्हें सम्हालते हुए धीरे-धीरे बाहर ड्राइवर की सीट तक ले आयी।बोनट के पास वाली सीट पर बैठा दिया। और चालक से बस धीरे चलाने का आग्रह किया। बस का मुख्य द्वार भी खुलवा दिया जिससे मम्मी ताज़ी हवा में सांस ले सके एवम ऑक्सीजन की कमी न हो। लेकिन कोई असर होता नज़र नहीं आ रहा था। उनकी बैचेनी और तड़प बरक़रार थी। मैंने देखा ममी को इस सर्दी में भी पसीने आ रहे थे। इधर मेरे पैरों में न जूते थे न शरीर पर कोई गरम कपड़ा। मैं ठंड से ठिठुर रही थी। रात दस बजे का वक़्त था। ठंडी हवा मेरे कपड़ों के आर पार गुज़रकर मेरी हड्डियों को कंपकंपा रही थी। लेकिन तेज़ चलती हुई गाड़ी के कारण कहीं ममी का संतुलन न बिगड़ जाये इसलिए मैं अपने दोनों हाथ उनके दाएं बाएं टिकाकर लगभग बारह किलोमीटर तक ऐसी ही अडिग खड़ी रही और अपनी बाहों के घेरे में अपनी माँ को पल-पल अपनी साँसो के साथ संघर्ष करते हुए असहाय सी देखती रही । मेरी आँखों में आंसू आ गए।एक बेटी के लिए इससे अधिक दारुण दृश्य क्या हो सकता है। कि वह अपनी जननी को इतनी कष्टप्रद स्थिति में देखने के बाद भी उसके लिए कुछ नहीं कर सकती।अभी तो रात के दस बज रहे थे। उदयपुर पहुंचने में अभी बारह घण्टे लगने थे। तभी मैंने ड्राइवर से कहा किसी तरह किसी ऐसी जगह बस रोके जहां कोई क्लीनिक, कोई डिस्पेंसरी कोई अस्पताल या कोई मेडिकल स्टोर नज़र आये। ताकि मम्मी को प्राथमिक चिकित्सा दी जा सके और किसी तरह उदयपुर तक मैं उसे सही सलामत ले जाने में सफ़ल हो सकूँ। लेकिन बस हाइवे पर थी। बाहर घना अंधेरा। हाड़ कँपा देनेवाली ठंडी हवा। दूर- दूर तक ऐसी कोई सुविधा नज़र नहीं आ रही थी। लगभग 12 किलोमीटर बाद वापी से 40 किलोमीटर पहले एक छोटा सा गांव आया "चारोटी"। वहां ड्राइवर ने बस रोकी। तब तक कुछ पैसेंजर्स भी हमारे आस पास जमा हो गए थे। और ममी को ढाढ़स बंधाने लगे।वहाँ भाग्य से एक ऑटो रिक्शा पहले से खड़ा था।पूछने पर उसने वहां से एक किलोमीटर की दूरी पर एक अस्पताल बताया।

मम्मी उतरकर रिक्शा में बैठने एवम साथ चलने की स्थिति में बिल्कुल नहीं थी।उसकी हालत बहुत ख़राब थी। ऐसे सर्द मौसम में भी उसे पसीने आ रहे थे। तब जाकर मैंने हमारे बगल के केबिन में बच्चों के साथ सोई हुई भाभी को नींद से जगाया और ममी की स्थिति बताकर उन्हें  सम्हालने के लिए उनके पास खड़ा रहने को कहा । ममी की हालत देखकर वह भी घबरा गयीं।बस के सभी यात्री मम्मी के आस पास एकत्रित हो गए थे एवम उसे तसल्ली बंधा रहे थे।

मैं फ़ौरन डॉक्टर को अपने साथ लिवा लाने के लिए बिना सोचे समझे ऑटो रिक्शा में जाकर बैठ गयी। कुछ दूर जाने के बाद जंगल सा शुरू हो गया। चारों तरफ़ घना अंधेरा था। कोई रोडलाइट्स भी नहीं थीं।एकाएक मुझे होश आया और जैसे मैं नींद से जागी। मैं एक अनजान जगह अनजान लोगों के साथ एक अनजान दिशा में बढ़ रही थी। मैं भयभीत हो गयी ।अब मुझे अपना डर सताने लगा। और मैंने एकाएक ज़ोर से कहा भैया किधर ले जा रहे हो इधर तो सिर्फ अंधेरा और जंगल दिखाई दे रहा है। अस्पताल कहाँ है।तभी मेरे बगल में बैठे व्यक्ति ने कहा ,'मैडम घबराइए मत मैं उस बस का ड्राइवर ही हूं। मैं आपके साथ ही हूं और ये अच्छे लोग हैं।आप चिंता मत करिए। उसकी बातों से मुझे थोड़ी राहत महसूस हुई। आगे जाने पर हमें एक हॉस्पिटल नजर आया।दरवाजा अंदर से बंद था। खटखटाने पर एक महिला ने खिड़की से झाँका। पूछने पर बोली डॉक्टर साहब अभी अपने घर पर हैं हॉस्पिटल में नहीं है। मैंने उनसे कहा तुरंत मेरी उनसे फोन पर बात करवाओ मेरी मम्मी बहुत सीरियस है। उस महिला ने डॉक्टर से बात की लेकिन जवाब यही दिया कि इस समय वह नहीं आ सकते सॉरी। मैं एकदम घबरा गई और उसे ज़ोर से डांटने लगी कि कोई डॉक्टर भला ऐसा कैसे कर सकता है। यह तो पेशे के खिलाफ़ बात है।

तभी ऑटो रिक्शा चालक ने कहा पास ही एक सरकारी अस्पताल भी है चलिए वहां चलते हैं। मैंने तुरंत कहा चलिए भैया जल्दी चलिए। हम लोग तुरंत उस सरकारी अस्पताल की तरफ बढ़े। संयोग से वहां बाहर कार में ही कुछ डॉक्टर्स बैठे हुए मिल गए जो शायद अपने घर लौट रहे थे । मैंने उनसे प्रार्थना की कि मेरी मम्मी की तबीयत खराब है प्लीज जल्दी चल कर उसे देख लिजीए। डॉक्टर ने कहा मैडम पेशेंट को यहां लाना पड़ेगा हम वहां नहीं जा सकते। मैंने उनसे बहुत अनुनय विनय की देखिए वह यहां आने की स्थिति में नहीं है आप प्लीज वहां चलकर उन्हें देख लीजिए।वस्तु स्थिति समझ कर वह डॉक्टर कार में पीछे पीछे हमारे साथ चल दिए और  हम लोग आगे आगे  ऑटो में बैठकर बस की तरफ बढ़े।

बस में चढ़कर उन्होंने मम्मी का चेकअप किया और कहा इनको अभी तुरंत एडमिट करना पड़ेगा। मम्मी उतरने की स्थिति में नहीं थी और उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। मैंने हाथ जोड़कर बस के ड्राइवर से प्रार्थना की प्लीज कृपा करके आप हमें अस्पताल तक पहुंचा दीजिये। बस ड्राइवर और यात्री सभी मुझे परेशान होते हुए, संघर्ष करते हुए देख रहे थे और मम्मी की हालत भी प्रत्यक्ष थी अतः किसी ने कोई विरोध नहीं जताया और मैं पूरी यात्रियों से भरी हुई बस लेकर अस्पताल पहुंची। पहुंचते ही तुरन्त स्ट्रेचर लाया गया और कुछ यात्रियों की मदद से मम्मी को बस से उतार कर उस पर बिठाया गया। एक डॉक्टर ने सीढ़ियों की तरफ इशारा करते हुए मुझे कहा आप इधर से मेरे साथ आइये। ममी को शायद लिफ्ट से ले जाया जाएगा.. इसलिए मैं भागकर डॉक्टर द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब देती हुई

सीढियां चढ़ने लगी। ऊपर पहुंचकर सामने स्ट्रेचर पर ममी आती हुई दिखाई दी। उसकी गर्दन झुकी हुई थी। मैंने भागकर उसे अपनी बाहों का सहारा दिया।वार्ड की तरफ तेजी से ले जाते हुए ही मम्मी ने अचानक अपना शरीर ढीला छोड़ दिया। मानो इतने संघर्ष के बाद उसने मृत्यु के सामने हथियार डाल दिये हों। मैं एकाएक घबराकर ममी ममी चिल्लाकर उसे झिंझोड़ने लगी।मेरी ऊपर की सांस ऊपर नीचे की सांस नीचे अटक गई थी। मैं अनिष्ट की आशंका से कांप रही थी।फिर भी उमीद की किरण शेष थी।डॉक्टर्स ने मम्मी को बेड पर लेटा कर मुझे बाहर भेज दिया गया।मैं सांस रोककर प्रतीक्षा करने लगी।

डॉक्टर ने बहुत देर तक पंपिंग की ऑक्सीजन की नली लगायी। और न जाने क्या क्या प्रयास किया। लेकिन....

पंछी पिंजरे से उड़  चुका था। डॉक्टर ने जैसे ही कहा कि इनके साथ कौन हैं कृपया मेरे साथ आइये। मैं एकदम ब्लेंक हो गयी। पता नहीं क्या सुनने को मिलेगा।

डॉक्टर ने गंभीर मुद्रा में बताया कि.. आपकी मदर को साइलेंट अटैक आया है..हमने अपनी ओर से पूरी कोशिश की बट सॉरी.. शी इज नो मोर..." सुनते ही मेरे होश उड़ गए और मैं जोर से चीख पड़ी अरे ऐसे कैसे। ये आप क्या कह रहे हैं ...मेरी मम्मी अभी तो सही सलामत यहां पर मैं उसे लेकर आई हूं और आप बोल रहे हैं कि.... मैं अपना आपा खो दिया और मम्मी के ऊपर गिर कर जोर-जोर से रोने चीखने लगी..मम्मी बोलो न...मम्मी कुछ तो बोलो ..चुप क्यों हो.. लेकिन...मम्मी होती..तब तो बोलती..भाभी मुझे संभालने की कोशिश करते हुए खुद भी रोने लगी।

बस चालक और सहयात्री.. सब दर्शक बने देख रहे थे। वे अचानक उनकी आँखों के सामने घटी इस घटना को देखकर उदास और सकते में थे।

इधर डॉक्टर्स ने पता नहीं कब पुलिस को फोन करके हॉस्पिटल बुला लिया। वे पंचनामा बनाने की बात कर रहे थे। मैं इन सब चीजों से अनभिज्ञ थी। मैंने रोते हुए विनयपूर्वक कहा भी कि मुझे अपनी माँ को ले जाने दो। सभी बस यात्रियों और ड्राइवर ने भी मेरा साथ दिया। लेकिन उन्होंने कहा आप बिना noc के डेडबॉडी साथ नहीं ले जा सकते। आप अपने घर से किसी पुरुष को बुलवा लीजिये। यहां बहुत सारी कानूनी औपचारिकताएं करनी पड़ेंगी।         

सुनकर मैं लगभग पत्थर सी हो गयी। हे

भगवान! अभी आधे घण्टे पहले जो मेरी माँ थी। उसके लिए बार-बार डेडबॉडी शब्द का इस्तेमाल किया जाना....कानों को असहनीय पीड़ा दे रहा था।

मैंने तुरंत फालना में अपने पति को फोन लगाया जो पेशे से वकील हैं। उन्हें सारी वस्तुस्थिति बताई। उन्होंने डॉक्टर और थानाधिकारी से फोन पर बात की। उनसे कहा भी कि वो सारी आवश्यक डिटेल्स लेकर जहां चाहे मुझसे साइन करवा लें और हमें छोड़ दें। लेकिन वे निर्दयी लोग सहयोग करने को बिल्कुल तैयार नहीं हुए।

इधर हालात को भांपकर बस के कुछ यात्रियों में सुगबुगाहट शुरू हो गयी। कुछ ने कहा मेडम ये लोग अब आपको ऐसे नहीं छोड़ेंगे। अब आपको सुब्ह तक यहां रुकना ही पड़ेगा। हम लोग जितना सहयोग कर सकते थे किया। अब हमे बस छोड़नी पड़ेगी।

सचमुच लगभग ढाई घण्टे तक पूरी बस ने मेरे साथ शारीरिक और मानसिक रूप से सफर किया था। अब उन्हें और लेट करना मुझे भी उचित नहीं लगा। कोई मतलब नहीं था। बस को छोड़ने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था। ड्राइवर बड़ा ही भला इंसान था।  हर वक़्त हर जगह मेरे साथ खड़ा रहा। यात्रियों ने खुद ही हमारा सामान उतारकर हॉस्पिटल में रखवा दिया। अंततः मैंने हाथ जोड़कर रोते हए सभी यात्रियों का धन्यवाद किया और असहाय सी कातर मुद्रा में सबको जाते हुए देखती रही। मैं अब एकदम अकेली हो गयी थी। मेरे पक्ष में बोलनेवाला कोई नहीं था। मैं भारी कदमों से चलकर भाभी और बच्चों के पास आई।मम्मी को मोर्चरी में ले जाया जा चुका था। हमें वार्ड में ही दो बेड दे दिए गए। भाभी और मैं गले मिलकर ख़ूब रोये। बच्चे उनींदे और हैरान थे।उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हुआ।

पति और भाई लगातार फोन से सम्पर्क में थे। पति ने धीरज बंधाते हुए मुझे फोन पर समझाया कि जितना समय हम लोग को वहां पहुंचने में लगेगा उतने समय मे तो तुम ही उदयपुर पहुंच जाओगे। इसलिए अब थोड़ा हौसला और दिखाओ। किसी तरह हिम्मत करके वहां से एम्बुलेंस में उदयपुर तक मम्मी को ले आओ। मैं व्यवस्था करवा देता हूं। फिर यहां हम सब संभाल लेंगे।

जहां हम थे..वहां से 40 किमी दूर था पालघर। जहां संयोग से पतिदेव के एक मित्र रहते थे। वकील साहब ने उनको फोन करके सारी स्थिति से अवगत कराया। लगभग डेढ़ घण्टे में उनके मित्र पालघर के अपने एक परिचित सुप्रसिद्ध डॉक्टर..दो रिश्तेदार एवम एम्बुलेंस सहित  मेरे पास पहुंच गए। वे डॉक्टर साहब वहां के डॉक्टर्स से सम्पर्क करने का प्रयास करते रहे ताकि वो रात में ही हमें एम्बुलेंस में भिजवा सकें। लेकिन आधी रात होने के कारण सबके मोबाइल स्विटच्ड ऑफ आ रहे थे। सभी सो गए थे। अतः वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने में असमर्थ थे।अतः मजबूरन हमे ड्यूटी कर्मचारी के निर्देशों का पालन करना पड़ा। अब सुबह होने पर ही कुछ हो सकता था।

इस दरम्यान एक पुलिस कर्मचारी मेरे पास आया और पूछताछ तथा पंचनामे के लिए मुझे अपने साथ थाने चलने को कहा। भाभी बच्चों के साथ हॉस्पिटल में थी। रात के दो बज रहे थे।         बाहर भयंकर सर्दी और हवा थी। थाना वहां से 15 मिनिट की दूरी पर था। वो मुझे पैदल ही थाने तक ले गया। मेरे हाथ पैर ठंडे हो चुके थे।

थाना चारों तरफ से खुला था। लगभग ढाई घण्टे तक वो मुझसे पूछताछ करते रहे। साथ ही साथ रिपोर्ट टाइप भी करते जा रहे थेे। सिर्फ मेरे ही नहीं.. पूरे खानदान की जन्मपत्री पूछ लेने के बाद उन्होंने सुबह साढ़े चार बजे फिर उसी ठंड में मुझे पैदल-पैदल हॉस्पिटल तक लाकर छोड़ दिया।

सुबह के 5 बज चुके थे। पालघर से मदद के लिए आये पतिदेव के मित्र ने बहुत आग्रह किया कि वे वहां किसी होटल में हमारे रुकने की व्यवस्था कर दें..या हम उनके साथ पालघर चले जाएं और सुबह लौटकर उनके साथ वापस आ जाएं। लेकिन मैंने मना कर दिया। मैंने कहा मैं यहीं रुकूँगी..अपनी मम्मी के साथ। हारकर वो सुबह आने का कहकर वापस चले गए।

मैं उसी बेड पर लेट गयी जिस बेड पर 6 घण्टे पहले ममी की निष्प्राण देह पड़ी हुई थी।लेटी हुई मैं पिछले 5 दिनों से मम्मी की आखिर में कही हुई बातों एवम स्मृतियों के साथ सफर करती हुई रोती रही। सुबह 7 बजे के आस पास सूर्य की किरण ने वार्ड की खिड़कियों से अंदर प्रवेश किया। मैं सोच रही थी ..आज ये किस अनजान और अपरिचित भूमि पर सूर्य दर्शन नसीब हुआ है।ये कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

दस बजे डॉक्टर आया और पोस्टमार्टम की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। मैंने बहुत अनुनय विनय की कि प्लीज़ मुझे मेरी माँ की देह ज्यों की त्यों ले जाने दीजिए। लेकिन वे निर्मम नहीं माने।           दोपहर बारह बजे तक सारी ओपचारिकताएँ सम्पन्न हुईं।वकील साहब के मित्र ने एम्बुलेंस का बंदोबस्त कर दिया था। ममी के शव को कॉफिन में लपेटकर एक बक्से में रखकर पिछले भाग में रख दिया गया। भाभी बच्चों के साथ आगे ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठ गईं। क्योंकि शव पर छिड़के गए इत्र की गंध उनके लिए सहनीय नहीं थी। मैं अधमरी हालत में रोती सिसकती पीछे उस बॉक्स के साथ जिसमें मेरी माँ लेटी हुई थी वाली सीट पर बैठ गई।  दोपहर के 12 बजे मैं ममी की पार्थिव देह को लेकर उदयपुर के लिए रवाना हो सकी। पिछले 12 घण्टे उस अनजान जगह चारोटी के अस्पताल में गुज़ारने के बाद अब अगले 12 घण्टे उदयपुर के लिए  मुझे अपने बगल में बक्से में लेटी हुई अपनी माँ और पिछली स्मृतियों के साथ सफ़र करते हुए गुज़ारने थे।

कल शाम को गहनों और नए कपड़ों से लदी जिस माँ के साथ हंसते बतियाते मैं बस में सवार हुई थी..उसे अब इस तरह एक बॉक्स में पैक करके घर ले जाना पड़ रहा है। ये अहसास पिछले 48 घण्टे से मेरी जागी और पथराई हुई आंखों को सोने नहीं दे रहा था। आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। मै शारीरिक और मानसिक रूप से बुरी तरह थक चुकी थी। टूट चुकी थी।जैसे-जैसे उदयपुर पास आता जा रहा था..मेरे दिल की धड़कन और बैचेनी बढ़ती जा रही थी।

पतिदेव बराबर फोन पर तसल्ली दे रहे थे।साथ ही शाबाशी भी। कि तुमने बहुत बड़ा काम किया है। एक बेटा होने का फर्ज अदा किया है तुमने।जिन परिस्थितियों में अच्छे अच्छे पुरुष तक घबरा जाते हैं तुमने उनका हिम्मत से सामना किया है। बस किसी तरह उदयपुर पहुँचो फिर हम सब संभाल लेंगे। भाई भी लगातार ख़बर ले रहा था। उदयपुर में घर पर सभी रिश्तेदार इकट्ठे होकर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। रात को लगभग साढ़े बारह बजे हमने उदयपुर में प्रवेश किया। मैंने फोन कर दिया था। सारे लोग द्वार पर ही खड़े हुए थे।उतरते ही निढाल होकर मैं पति लिपटकर ज़ोर से रो पड़ी। भाई भाभी भी गले मिलकर रोने लगे।मुझे किसी तरह कमरे में पहुँचाया गया। और फिर शुरू हो गयी माँ के अंतिम संस्कार की रस्में। अगले तेरह दिन तक आने जानेवाले मेहमानों को सारी घटना की जानकारी देते हुए मुझे जाने कितनी बार पीड़ा की उसी प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा।

ये मेरे जीवन का एक अप्रत्याशित पहला दुखद अनुभव रहा जिसे मैं चाहकर भी कभी भुला नहीं सकूंगी। पंच तत्व में विलीन हो गयी माँ..। मां की कमी जीवन में कभी पूरी नहीं हो सकती। अभी तक सकते में हूं। शून्य-सी हो गयी हूं। एकाएक एकाकी...सी। कुल मिलाकर.. मातृहीना का अर्थ समझा गयी माँ..


डॉ कविता"किरण" फालना,राजस्थान

संस्मरण 4807594467199861675

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