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महाराणा प्रताप के विषय में भारतीय इतिहास में लिखी भ्रांतियों को दूर करती विजय नाहर की पुस्तक "हिंदुवा सूर्य महाराणा प्रताप" की समीक्षा

हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप के विषय में कतिपय विदेशी- देशी इतिहासकारों ने विशेष रूप से कर्नल टॉड एवं डॉक्टर गोपीनाथ शर्मा ने बड़े भ्रम फैलाए हैं जिनसे अनेक प्रश्न उपस्थित हो गए हैं जैसे

1. अकबर महान या महाराणा प्रताप?

2. महाराणा प्रताप का जन्म स्थान

3. हल्दीघाटी का विजेता कौन?

4. घास की रोटी वाली कथा की ऐतिहासिकता

5. अकबर के कितने आक्रमण? प्रताप एक भी युद्ध नही हारे।

6.क्या महाराणा प्रताप राष्ट्रिय एकता में बाधक थे?

लेखक इतिहासकार विजय नाहर  के ग्रंथ  "हिंदूवां सूर्य महाराणा प्रताप"  में इन सभी भ्रमों का निवारण एवं सभी प्रश्नों का समाधान मिलता है।

इतिहासकार विजय नाहर 10 वर्ष तक मेवाड़ में राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं राजस्थान वनवासी कल्याण परिषद, उदयपुर के संस्थापक संघठन मंत्री रहे है। अपनी शोध के साथ लेखक ने एक मौलिक एवं साक्ष्यों से पुष्ट ग्रंथ की रचना की है। इस ग्रंथ की यह विशेषता देखने को मिलती है कि इतिहास में रुचि रखने वाले व्यक्तियों में प्रताप के विषय में जिन बातों के विषय में भ्रांतियां खड़ी की गई है। उन सभी का सटीक उत्तर इस ग्रंथ में हमें मिलता है। सबसे बड़ी भ्रान्ति मेवाड़ के ही डॉक्टर जी. एन. शर्मा ने खड़ी की है जैसे- 'प्रताप नहीं अकबर महान था ' 'महाराणा प्रताप एक भटका हुआ देश भक्त था' 'महाराणा प्रताप राष्ट्रीय एकता में बाधक थे'। इन सभी प्रश्नों का समाधान लेखक ने अपनी इस पुस्तक में दिया है। लेखक ने अनेक उदाहरण देकर स्पष्ट किया है कि अकबर मुगल मुसलमान था विदेशी था , आक्रांता था। वह हिंदुओं को क्रूरता से दबाकर गुलाम बनाना चाहता था । उसके शासन तंत्र में सभी ऊँचे ओहदों पर विदेशी मुस्लिमों को ही नियुक्त कर रखा था । भारतीय स्वतंत्रता , सभ्यता व संस्कृति को नष्ट करने के लिए हिंदुओं का नरसंहार किया , राजपूत राजकुमारियों के डोले मंगवाए , हिंदू मंदिरों को ध्वस्त किया, मीना बाजार लगा कर हिंदू नव वधुओं को भ्रष्ट करने का प्रयत्न किया । 'इबादत खाना' बना कर हिंदुओं को बेवकूफ बनाकर 'दीन ए इलाही ' धर्म प्रारंभ कर स्वयं पैगंबर बनने का प्रयत्न किया। ऐसा व्यक्ति महान होगा अथवा राष्ट्रीय एकता करेगा , सोचना भारत एवं भारतीय के लिए कैसे उचित और संभव हो सकता है ?

इसके विपरीत महाराणा प्रताप ने अपने संपूर्ण जीवन में हिंदू हिंदुत्व, भारत एवं भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष किया । स्वयं को और अपने परिवार को अपनी उद्देश्य पूर्ति के लिए समर्पित कर दिया । रक्त की अंतिम बून्द तक संघर्ष किया परंतु विदेशी के समक्ष घुटने नहीं टेके । अतः भारत भारतीयों के लिए स्वदेश रक्षक महाराणा प्रताप ही महान एवं महान राष्ट्र भक्त हो सकते हैं, लेखक के तर्क समझ में आने वाले हैं ।

महाराणा प्रताप की विषय में इतिहासकारों में एक भ्रम है की प्रताप का जन्म स्थान कौन सा है ? इस विषय में दो नाम कुंभलगढ़ व पाली सामने आते हैं । प्रस्तुत ग्रंथ में लेखक ने इस बात पर बड़ी गहराई से प्रताप की जन्म कुंडली एवं उस काल की विपरीत परिस्थितियों को बताते हुए साक्ष्यों के साथ यह स्पष्ट किया है की महाराणा प्रताप का जन्म कुंभलगढ़ नहीं पाली में हुआ था । जो महाराणा उदय सिंह का ससुराल था।

हल्दीघाटी का विजेता कौन ? हल्दीघाटी का युद्ध इतिहास में बड़ा प्रसिद्ध है | इस पर भी मत भिन्नता मिलती है परंतु लेखक ने अपने ग्रंथ में बड़े विस्तार से एवं सटीक तथ्यों एवं मुस्लिम इतिहासकार बदायूनी के कथनों को साक्ष्य करके स्पष्ट बताया है कि हल्दीघाटी युद्ध का विजेता महाराणा प्रताप था ना कि मानसिंह। महाराणा प्रताप अपने सेना नायकों के वादों को निभाने के लिए हल्दीघाटी का आमने सामने का युद्ध लड़ा था अन्यथा महाराणा उदय सिंह के द्वारा ईजाद की गई गुरिल्ला युद्ध प्रणाली (छापामार युद्ध प्रणाली ) का ही जीवन भर उपयोग किया। महाराणा प्रताप अपने जीवन में एक बार भी पराजित नहीं हुए। महाराणा प्रताप के विरुद्ध हल्दीघाटी में पराजित होने के बाद स्वयं अकबर ने जून से दिसंबर 1576 तक तीन बार विशाल सेना के साथ महाराणा पर आक्रमण किए, परंतु महाराणा को खोज नहीं पाए , बल्कि महाराणा के जाल में फंसकर पानी भोजन के अभाव में सेना का विनाश करवा बैठे। थक हारकर अकबर बांसवाड़ा होकर मालवा चला गया । पूरे सात माह मेवाड़ में रहने के बाद भी हाथ मलता अरब चला गया । शाहबाज खान के नेतृत्व में महाराणा के विरुद्ध तीन बार सेना भेजी गई परंतु असफल रहा। उसके बाद अब्दुल रहीम खान-खाना के नेतृत्व में महाराणा के विरुद्ध सेना भिजवाई गई और पीट-पीटाकर लौट गया।  9 वर्ष तक निरंतर अकबर पूरी शक्ति से महाराणा के विरुद्ध आक्रमण करता रहा । नुकसान उठाता रहा अंत में थक हार कर उसने मेवाड़ की और देखना ही छोड़ दिया। सभी युद्धों का लेखक ने तथ्यों सहित बड़ा सांगोपांग एवं विस्तार से वर्णन किया है ।

कर्नल टॉड ने जंगल में घास की रोटी की घटना का वर्णन कर एक भ्रम पैदा किया । लेखक ने विस्तार से इस विषय में भी लिखा है । लेखक के अनुसार यह घटना कपोल कल्पित है । इस घटना का वर्णन मेवाड़ के किसी प्राचीन स्रोत में नहीं मिलता और ना ही पारसी साहित्य में। यदि इसमें कुछ भी सच्चाई होती तो फारसी ग्रंथ इसका अवश्य बढ़ा चढ़ाकर वर्णन करते। महाराणा की कोई पुत्री नहीं थी। महाराणा एवं उनका परिवार जिन क्षेत्रों में रहते थे वे संपन्न क्षेत्र थे। मेवाड़ का बच्चा-बच्चा महाराणा के लिए जान छिड़कने के लिए सिद्ध था फिर ऐसी मुसीबत कैसे आ सकती है । इन्हीं दिनों महाराणा प्रताप ने सुंगा पहाड़ पर एक बावड़ी का निर्माण करवाया और सुंदर बगीचा लगवाया । महाराणा की सेना में एक राजा, तीन राव , सात रावत, 15000 अश्वरोही, 100 हाथी, 20000 पैदल और 100 वाजित्र थे। इतनी बड़ी सेना को खाद्य सहित सभी व्यवस्थाएं महाराणा प्रताप करते थे। फिर ऐसी घटना कैसे हो सकती है? उपरोक्त सभी प्रश्नों एवं धर्म के निवारण के लिए सटीक तथ्यों एवं पुष्ट प्रमाण सहित समाधान करने का प्रयास किया है । ग्रंथ की भाषा बड़ी सरल है एवं सटीक शब्दावली का प्रयोग किया है। शैली अत्यंत प्रवाह मान हैं|

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पुस्तक का नाम- हिंदुवां सूर्य महाराणा प्रताप

लेखक- विजय नाहर

प्रकाशक-पिंकसिटी पब्लिशर्स, जयपुर

प्रकाशन वर्ष-2011

आवर्त्ति-प्रथम

आई एस बी एन न.-978-93-80522-45-6

पुस्तक का मूल्य-320 Rs

समीक्षा 81432858174448540

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