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परगाई शंकर सिंह की कविताएं

परगाई शंकर सिंह

शोधार्थी

शिक्षा विभाग

बिरला परिसर श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखण्ड हिन्दुस्थान (इंडिया)

shankar.pargai@gmail.com

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1.विजित पत्थर

एक आदमी ने
पत्थर विजित किया
वो उसे उठाकर
घर ले आया
दिन रात उसकी
पहरेदारी करने लगा
वो आजाद होने का
गुमान करता रहा
मगर
उन्हीं ढकोसलों में
जीते जीते
उसने
जिन्दगी गुजार दी
फिर उसने
उसी पत्थर से बंधकर
समंदर में तैरने की सोची
वो वहीं
डूब गया
उसी पत्थर के साथ
जिसे वो
विजय का प्रतीक समझता

दरअसल

वो पत्थर

जिसकी वो गुलामी

जिन्दगी भर करता रहा

उसी के साथ

मृत्यु के गाल में समाया

वो संकेत था

उसकी गुलामी का

जिसे वो

अपनी विजय का

प्रतीक समझता रहा।

2. झूठ

वो
झूठ को सत्य
बताकर
बिगुल बजा रहे हैं
मगर
स्थायी कुछ नहीं
सिवाय सत्य के
इतिहास उनके
ढकोसलों को
वहीं फेंक देगा
जहाँ
हिटलर जैसे लोग
वास करते हैं।

3. मुखौटा

वो झूठ को बेचेंगे
हर जगह
ज़ब तक झूठ
अपने

पैर नहीं पसार लेता
ज़ब तक उसकी जड़े
सबके जहन में
अपने लिए
मिट्टी खाद
इकठ्ठा नहीं कर लेती
तब उन जड़ों से
अंकुर आ जायेंगे
वो तब अभिनय करेंगे
मुखौटा
एक नहीं कही होगा
धर्म /जाति /राष्टप्रेम /जनहित
सब मुखौटा पहन
घूमेंगे
मुखौटा मुखौटा देख के
हँसेगा

एक मुखौटा

दूसरे मुखौटे को नोचेगा
राजा खुश होगा
मुखौटा पहनी

जनता ढूंढेगी
अपने चेहरों को
वो आकर सरेआम
पहना देंगे
अपना ही चेहरा
हरेक चेहरे को

चेहरे के भीतर

होगा चेहरा

मुखौटे के भीतर

होगा मुखौटा

हरेक हाथ

लहूलुहान हो

अंत में

मुखौटा

उतारने की कोशिश करेंगे

राजा सबके हाथ कटवा देगा

मुखौटे

फिर हँसेंगे

एक दूसरे पर

राजा फिर खुश होगा

राजा बेहद खुश होगा।

4.चुनावी शोर

सारे मुद्दे
अब
चुनावी शोर के मध्य
कही भटक जायेंगे
या सीमित हो जायेंगे
भाषणों तक
या किसी कागज पर
लिखें जायेंगे
असल में अब
राष्ट्र प्रेम का
ढकोसला
और
चुनावी उन्माद
बिखरा हुआ मिलेगा
चारों ओर
सावधान लोकतंत्र के
वोटरों
चुनावी दौर आ रहा है
सारी पार्टियां
एकजुट होकर
चुनावों में उतरेगी
हम ही होंगे
जो अलग थलग होकर
लड़ते रहेंगे
धर्म जाति
और पार्टियों के झण्डों को
कंधे में उठाये
असल में लोकतंत्र
हमसे ही शुरू होना है
ये समझना जरुरी है।

5. युद्द का विचार

युद्ध
मानव के खोपड़ियों में
नाचता है
वैमनस्य
स्पर्धा
शक्ति का प्रदर्शन बनकर
या स्वयं के
वर्चश्व को बनाये रखने के लिए
हर कोई
ज़ब भी चढ़ता है ऊपर
हथियारों के साथ
वही बैठा
युद्ध मुस्कराता है
कि शांति में भी लोग
पूजते है उसे
युद्ध कही और नहीं
समाज के उस हिस्से में है
जिस हिस्से में
हम मानव को ही
मानव का प्रतिद्वन्दी समझते हैं।

6. लूट चक्र

शासक
राजा बने रहता
लोकतन्त्र
मात्र
वोटतंत्र हो जाता
यही चक्र
चलते रहता
जनता पीसते रहती
इन दो पाटों के बीच
चक्की से धुआँ निकलता
ताजे गेहूं की
बालियों की खुशबू
दूर दूर तक
फ़ैल जाती है
रोटी की उम्मीद में
एक ओर

दौड़ लगाते है लोग
वहां राजा
हाथों में हथियार लिए
पहरेदार बैठाये रहता।

7. सफेदपोशी

वो जो सत्ता के
भूखे है
सफेद पोशी है
तुम्हारे - हमारे
सच को भी
झूठा
साबित कर देंगे
वो तुम्हारे
जीने के अधिकार को भी
बदल देना चाहेंगे
वो चाहेंगे
तुम ओ़ढ़़ लो
उनके ही ढकोसले को
वरना वो
चुपके से तुम पर
हमले करेंगे
तुम्हारी अस्मिता पर
चोट पहुंचायेंगे
वो तुम्हारे पूजा करने के
तरीकों को भी
चाहेंगे बदल दे
और चाहेंगे
उनकी इच्छाओं के बल पर हो
वो समाज के
बहरूपये है
जो खोखला कर देना चाहेंगे
हरेक चीज को
जैसे वो है
उनके पीछे चलने पर तुम्हें
पुरष्कृत करेंगे
न चलने पर पर
पीठ में छुरा
घोंपने हेतु
तुम्हारे ही साथी को
चुनेंगे
जो बहक जाएंगे
उनके अपने मारे जाएंगे
जो नहीं बहकेंगे
उनको बहकाया जायेगा
ये दौर जारी रहेगा
उनकी ओर से
जब तक तुम्हारी
असमिता को धूमिल नहीं कर देंगे
मगर तुम
उठोगे एक दिन
क्योंकि
तुम बचे रहोगे
सत्य के साथ ।

8. इश्क

तेरे आसमां
होने की बात है
मेरे जमीं हो जाने की
साथ में
इन दोनों के मध्य
जो रिक्तता है
वही इश्क है।

9. प्रेम आवर्तन

तुम्हारे
इर्द गिर्द
घूमता
ये जो आवर्तन है
ये आवर्तन
उस प्रेम का है
उस एक
बिंदु के इर्द गिर्द
जिसमें सम्पूर्ण जीवन है
और जानते हो तुम
आवर्तन के हरेक चक्र में
तुम और निखर आते हो
जैसे
हरेक स्याह रात के बाद
निखर आती है जमीं।

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कविता 2502426559961917556

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