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कहानी - क्रांति - प्रियंका कौशल

क्रांति

जंगलों में चलते-चलते कब सोमारू को बुधिया से प्यार हो गया। पता नहीं चला। जीवन इतना पथरीला है कि उसमें प्यार का अंकुरण भी हो सकता, ऐसा सपना भी कभी नहीं देखा था सोमारू ने। बुधिया ने भी कहां ऐसा सोचा होगा।

क्रांति की राह पकड़े ये नौजवान अपने जीवन में एक लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। सरकार तुम्हारे खेत, जंगल, गांव हथिया लेगी। सरकार को अपने इलाके में घुसने नहीं देना है। लोकतंत्र जैसी कोई चीज नहीं है। ये सत्तासीन लोग तुम आदिवासियों को तुच्छ समझते हैं। नहीं चाहिए हमें इनके स्कूल, बिजली, सड़क, अस्पताल। नहीं चाहिए हमें इनका विकास। हम अपनी सरकार खुद बनाएंगे, जनताना सरकार। कुछ ऐसे नारों के बीच युवा हुए थे सोमारू और बुधिया।

सोमारु दण्यकराण्य में एरिया कमांडर था और बुधिया उसकी कमेटी की एक सदस्य। नहीं सदस्य भर कहना काफी नहीं होगा। सबसे सक्रिय सदस्य, निशाना तो ऐसे साधती, जैसे कोई ओलंपिक में भाग लेने वाली निशानेबाज हो। दिमाग से तेज और अपने लक्ष्य के लिए प्राण देने में भी पीछे ना हटने वाली लगन। इन्हीं खूबियों के कारण सबके बीच लोकप्रिय भी थी बुधिया। बचपन में जब दादा लोगों (नक्सलियों को बस्तर में दादा कहकर संबोधित किया जाता है) ने गांव आना शुरु किया, तो उनकी बातें बड़ी अच्छी लगती थी बुधिया को। उम्र कोई ज्यादा तो ना थी, यही कोई 8-9 वर्ष की रही होगी। खूब पढ़ना चाहती थी। बचपन में मां इलाज के अभाव में गुजर गई थी। बड़े होकर डॉक्टर बनना चाहती थी। ये भी सच था कि उसका सपना केवल सपना ही रह जाने वाला था। नारायणपुर जिले के सुदूर बसे बड़े जम्हरी गांव, जहां जाने के लिए आजादी के 70 सालों बाद भी पक्की सड़क ना बन सकी हो, वहां की कोई आदिवासी, गरीब बच्ची डॉक्टर बनने का केवल सपना ही देख सकती है। बुधरी के गांव में जब कोई बीमार हो जाता तो बैगा-गुनिया ही सहारा थे उसे ठीक करने के लिए। बात जब बैगा-गुनिया के बस के बाहर हो जाती, तो गांववाले मरीज को तकरीबन 40 किलोमीटर पैदल ढोकर लाते, ताकि उसका जीवन बचाया जा सके। उस गांव की महिलाएं मीलों चलतीं राशन लाने के लिए। कभी राशन दुकान पहुंचकर पता चलता कि आज दुकान नहीं खुलेगी तो फिर मीलों लौटकर आतीं। फिर दूसरे दिन जाती राशन लेने, इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि दुकान दूसरे दिन भी खुली मिलेगी। यह चक्र अनवरत् चलता रहता।

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लेकिन बावजूद इसके बुधिया पढ़ना चाहती थी। लेकिन उसे अच्छे-बुरे की पहचान नहीं थी। हो भी कैसे, जब उसके गांव के बड़े-बुजुर्ग अपने लिए अच्छा या बुरा सोचने या चुनने के अधिकार से वंचित थे, तो बुधिया में यह गुण कैसे आता भला। तो जब उसके गांव में दादा लोगों की आमद हुई, तो बुधिया को उनकी क्रांतिकारी बातें बड़ी अच्छी लगी। सरकारी कर्मचारियों से सताए हुए लोग भी दादा लोगों की शरण लेने लगे। कभी किसी फारेस्ट गार्ड को जनता से भरी अदालत में दो थप्पड़ लगा देने या फिर किसी पुलिसकर्मी की सरेआम पिटाई कर देने से लोगों को लगने लगा कि ये दादा लोग ही हमारे दुख को दूर सकते हैं। बुधिया भी इसी आकर्षण की गिरफ्त में जाने लगी। वो उनकी दुनिया के बारे में कुछ नहीं जानती थी, लेकिन बंदूक उठाए वर्दीधारी लोग उसे बड़े आकर्षक लगते, पुलिस से भी बलशाली, जंगलवाले साहब से ज्यादा ताकतवर। डॉक्टर बनने के सपने देखने वाली बुधिया कब बंदूक उठाकर जंगल की तरफ निकल गई, उसे खुद भी याद नहीं रहा। 10 साल की उम्र में ही उसने बंदूक चलाना सीखा। बड़े-बड़े नारे, उसके दिल को हिला देते। उसे लगता कि कितना शोषण हुआ है उसके समुदाय के साथ। सच में ये सरकारी लोग किसी नरभक्षी से कम नहीं है। स्कूल में गांधी-सुभाष पढ़ने वाली बुधरी अब मार्क्स, लेनिन, स्टालिन और माओ को पढ़ने लगी है। उसकी नसों में क्रांति ऐसे फड़कती है, जैसे पूरी दुनिया के लिए वो अकेली ही लड़ रही हो। अपने दल के साथ जंगलों में वो मीलों पैदल चलती। कभी नहीं थकती। अपनी विचारधारा के लिए पूरी निष्ठा रखती।

कभी कोई दल के खिलाफ जाता तो भूल जाती कि कभी वो साथी भी रहा है। क्रूरता की हद पारकर के उसे दंड देती। अपने ही हाथों से अपने समुदाय की संस्कृति/परंपराओं को भी नष्ट करने में उसे कभी हिचक महसूस नहीं हुई। घोटुल में इकट्ठे होने वाले युवाओं को चेताती कि यह सब बंद करो। क्यों करो, इसका कोई ठोस जबाव तो उसके भी पास नहीं था। लेकिन ऊपर से आदेश आया है, अब ये सब नहीं चलेगा। अब जंगल का नया कानून है, उसका पालन करना ही होगा। उसकी निष्ठा का फल भी उसे जल्द ही मिल गया। अब उसे रमन्ना के दल में ले लिया गया है। रमन्ना इन दिनों उनका सबसे बड़ा लीडर है। उसका बेसकैंप अबूझमाड़ में है। बुधिया को उसके सुरक्षा दल में शामिल किया गया है। रमन्ना के सुरक्षा दल में होना बड़े गर्व की बात है। ये सोचकर ही बुधिया रोमांचित हुई जा रही है। लेकिन उसे क्या मालूम कि यही वह क्षण है, जब उसका जीवन एक नया ही मोड़ लेने वाला था। जी हां, बुधिया और सोमारू की पहली मुलाकात यहीं हुई, नक्सल कमांडर रमन्ना के दल में। दोनों ही रमन्ना के सुरक्षाकर्मी थी। रात-दिन साथ रहते-रहते कब एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो गए। उन्हें पता ही नहीं चला। दोनों ने दल के सामने शादी करने की इच्छा जताई। किसी ने कोई विरोध नहीं किया। दोनों ने शादी कर ली। अभी कुछ ही दिन बीते थे, साथ रहते। सोमारु को कांकेर एरिया कमेटी में भेज दिया गया। दोनों अलग-अलग हो गए। कभी-कभी किसी जंगल से गुजरते हुए दोनों की मुलाकात हो जाती। कभी दोनों महीनों नहीं मिल पाते। ऐसे ही दो बरस बीत गए। बरसात के दिन थे, बुधिया का दल दंतेवाड़ा के जंगलों से गुजर रहा था, सामने से सोमारु भी नक्सलियों की एक टुकड़ी के साथ वहां निकला। दोनों का आमना-सामना हुआ। भोजन का समय हो चुका था, दोनों दलों ने साथ ही खाना पकाकर खाने की योजना बनाई।

उनके कुछ साथी घरों से चावल और बर्तन लेने पास के गांव में चले गए। कुछ लकड़ियां बीनने और कुछ भोजन की दूसरी तैयारियों में लग गए। ऐसे में सोमारु और बुधिया को काफी वक्त एक दूसरे के साथ गुजारने के लिए मिल लिया। फिर जब दोनों चलने को हुए तो जैसे कलेजा फटा जा रहा था। बुधिया सोमारु को तब तक जाते हुए देखती रही, जब तक वह नजरों से ओझल नहीं हो गया।

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आज जी बहुत घबरा रहा है, सुबह से बैचेनी हो रही है। बुधिया ने सोरी से कहा। दो-तीन महीनों से मासिक चक्र भी नहीं आया। बुधिया की बात सुनकर सोरी घबरा गई। कहीं तू मां तो नहीं बनने वाली। अरे ये तो मैंने सोचा ही नहीं, बुधिया चौंकी। सुन सोरी, ये बात किसी को नहीं बताया। बुधिया की बात अनसुनी करते हुए सोरी ने कहा कि तूने नसबंदी नहीं करवाई। तू कैसे बची रह गई। किसी का ध्यान क्यों नहीं गया तेरी तरफ। सोरी ने कहा। हमेशा शेरनी की तरह दहाडने वाली बुधिया गिडगिडाई, नहीं सोरी, मैंने नसबंदी नहीं करवाई, ये मेरी गलती है। लेकिन अभी मेरे गर्भवती होने वाली बात किसी से ना कहना। पर सोरी कहां सुनने वाली थी। उसने बुधिया को याद दिलाया कि कैसे उसने सोरी की जबरिया नसबंदी करवाई थी। नक्सल कैंप का उसूल है कि महिलाओं की नसबंदी करवा दी जाती है। कई बार पुरुषों की भी नसबंदी करवाई जाती है। लेकिन महिलाओं की तो अनिवार्य है। वे अपनी पंसद से शादी-ब्याह कर सकती हैं, संबंध भी बना सकती हैं। लेकिन बच्चा पैदा कर परिवार बढ़ाने की अनुमति उन्हें नहीं है। बुधिया ने इसी नियम का पालन करते हुए सोरी की नसबंदी करवाई थी।

अब सोरी को मौका मिला था बुधिया से बदला लेने का। वो कैसे पीछे रहती। उसने कमांडर रमन्ना की पत्नी को बुधिया के गर्भ से होने की बात को बता दिया। पहले तो बुधिया को समझानी दी गई कि बच्चे को गिरा दे। लेकिन बुधिया के मन तो ममता की नदी बह निकली थी। वह अपने बच्चे को जन्म देना चाहती थी। उसने दल से अपनी दुनिया में वापस लौट जाने की इजाजत मांगी। उसने कहा कि वो पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर सामान्य जीवन जीना चाहती है, इस बच्चे को जन्म देना चाहती है। उसकी बात सुनकर जैसे कोहराम मच गया। उसका बच्चा जबरदस्ती गिराए जाने की तैयारी होने लगी। बुधिया को कैद कर दिया गया। सोमारू को इत्तला कर दी गई। सोमारु को लगा जैसे अब बुधिया नहीं बचेगी। तीन माह के गर्भ को गिराने का मतलब है बुधिया की जान को भी खतरा। वो भागा-भागा वहां पहुंचा, जहां बुधिया थी। लेकिन सोमारू को आने में देर हो गई। जब तक पहुंचा बुधिया अपने बच्चे के साथ दूसरे लोक में जा चुकी थी। अपने अजन्मे बच्चे को महसूस करने के लिए वो बार-बार मृत बुधिया के पेट पर हाथ फेर रहा था। खुद को अपराधी महसूस कर रहा था। बुधिया की लाश को गोदी में रखकर सोमारू सोच रहा था कि क्या सही में हमें अपने मुताबिक जीने की आजादी है? क्या जो नारे हमें जीवनभर घोटकर पिलाए गए, उनका असली अर्थ यही है। क्या यही वह क्रांति है, जिसके लिए हम बंदूक उठाए जंगलों में भटक रहे हैं।

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प्रियंका कौशल
संक्षिप्त लेखक परिचय -लेखिका पिछले 15 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। नईदुनिया, दैनिक जागरण, लोकमत समाचार, जी न्यूज़, तहलका जैसे संस्थानों में सेवाएं दे चुकी हैं। वर्तमान में भास्कर न्यूज़ (प्रादेशिक हिंदी न्यूज़ चैनल) में छत्तीसगढ़ में स्थानीय संपादक के रूप में कार्यरत् हैं। मानव तस्करी विषय पर एक किताब "नरक" भी प्रकाशित हो चुकी है।

ईमेल आई.डी-priyankajournlist@gmail.com

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