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बात बिगड़ने पर अपने भी अपनों को, जब चाहें तब आँख दिखाने लगते हैं। - तेजपाल सिंह 'तेज' की कुछ ग़ज़लें


  -एक-

फिक्र के मारे फिक्र  छुपाने लगते हैं,
  बेफिक्री की दवा बताने लगते हैं।

घुटमन चलने पर तो नन्हें-मुन्ने भी,
दादी-माँ से हाथ छुड़ाने लगते हैं।

मिलती नहीं तवज्जो जिनको अपनों से,
वो गैरों से हाथ मिलाने लगते हैं।

बात बिगड़ने पर अपने भी अपनों को,
जब चाहें तब आँख दिखाने लगते हैं।

‘तेज' करूं क्या गिनती बाकी साँसो की,
बीते दिन भी अब अफसाने लगते हैं।
*****

-दो-

आज नहीं तो कल, मैं चश्मेतर में रहूँगा,
न सोचिए कि मैं सदा बिस्तर में रहूँगा।

अंधेरे आए तो लेकिन, छूकर गुजर गए,
अब हरनफस मैं धूप के दफ्तर में रहूँगा।

एकला चलने की कसक खूब है लेकिन,
है मन मिरा कि अबकी मैं लश्कर में रहूँगा।

जीस्त ने, न मौत ने अपना किया मुझे,
कौन जाने अबकी मैं किस घर में रहूँगा।

मैं कि बिखर जाउंगा, इतना भी नहीं टूटा,
छोड़कर धरती मैं अब अम्बर में रहूँगा
*****


-तीन-

मन की बात कहे सो कविता,
बे-अन्दाज  बहे सो कविता।

जो रोते—रोते भी मुस्काए,
ग़म बेतोल सहे सो कविता।

दुनिया का दुख-सुख पहचाने,
हर-श्रृंगार गहे सो कविता।

पीकर जहर कुलाँचें मारे,
तरकश तीर गहे सो कविता।

‘तेज' ग़ज़ल दोहा चौपाई,
गीत अगीत कहे सो कविता
*****

-चार-

फक्कड़पन तो अपना मीत पुराना है,
मययखाने तो रोज का आना-जाना है।

जलते-जलते राख हुआ मेरा तन-मन,
अब दुनिया में क्या खोना क्या पाना है।

आँख से आँख मिलाने में कतराता है,
लगता है कोई अपना यार पुराना है।

वो समझें न समझें कोई बात नहीं,
हमको तो पर अपना फर्ज़ निभाना है।

`तेज' मुझे क्या लेना-देना दरपन से,
चेहरा बदले गुजरा एक ज़माना है
*****

-पाँच-

अभी तो कुछ और तमाशे होंगे,
बस्ती-बस्ती में धमाके होंगे।

कहाँ सोचा था ये, कि उनके,
इतने नापाक इरादे होंगे।

सच को धरती पे लाने  के लिए,
ज़ाया कुछ और जमाने होंगे।

अपनी आँखों से पुराने चश्में,
हमको हर-हाल हटाने होंगे।

जिनके सीने में आग बसती है,
हाँ! वोही लोग सयाने हो
*****

-छ्ह-

बात दिल की कही नहीं जाती,
गोया फुरक़त सही नहीं जाती।

उनको बिछड़े यूँ तो हुए बरसों,
याद उनकी मगर नहीं जाती।

वादा करते हैं मुकर जाते हैं,
शर्म उनकों मगर नहीं आती।

जीने मरने के सवालात न कर,
ज़िन्दगी यूँ ही गुजर नहीं जाती।

ऐसी उलफ़त का ‘तेज’ क्या होना,
जिसमें हरकत नजर नहीं आती।

*****

-सात-

तीर है, कमान है,
थका-थका बयान है।

हौंसलों के नाम पर,
नजर-नजर थकान है।

कातिलों की बाकसम,
सादगी कमाल है।

रोटियों के वास्ते,
होता नित धमाल है।

भूख के सवाल पर,
बे-जुबां जहान है।

*****

-आठ-

बिन्दी, टिकुली, सेहरा देख,
सिर पर आँचल फहरा देख।

होठों होठों पर है लेकिन,
खामोशी का पहरा देख।

कभी आइने में तू भी तो,
अपना उजड़ा चेहरा देख।

सहरा-सहरा घनी आँधियाँ,
आँगन-आँगन सहरा देख।

‘तेज' तू पर अपनी आँखों में,
तल्ख समंदर ठहरा देख
*****

-नौ-

ग़म मिरे बेशक किसी से कम नहीं हैं,
हाँ! मगर आँखे मिरी पुरनम नहीं हैं।

लोकशाही का किया, सत्ता ने सर कलम,
पर कहीं भी शहर में मातम नहीं है।

महफिल में अपनी आज तू खुद सरनिगूं है,
है शुक्र कि महफिल में तेरी हम नहीं हैं।

कि दीपक जलाकर आँधियों को सौंप दें,
नाअक्ल इतने सिरफिरे भी हम नहीं हैं।

छोड़ भी दे `तेज' तू नाहक दिलों से खेलना,
कि खेलने को यां खिलौने कम नहीं हैं।
*****
(सरनिगूं = शर्मिन्दा)

-दस-

सूरज-सूरज आग तो है,
बाकी अभी रिवाज तो है।

भूखी नंगी आबादी के,
हाथों आज किताब तो है।

उम्मीदों की तंग गली में,
मंहका कोई गुलाब तो है।

सत्ता के कलुषित चेहरे से,
उट्ठा तनिक नकाब तो है।

घनी आँधियों के आँगन में,
रखता कोई चिराग तो है।
****
(तूफाँ की जद में से प्रस्तुत)

     
पुस्तक के लेखक तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की दर्जनों  किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण  ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच  निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। सामाजिक/ नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं। आजकल आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं।
सम्पर्क  :  E-mail — tejpaltej@gmail.com

ग़ज़लें 8198458945177296648

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