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इस फ़रेबी ज़माने से अन्जान है, ऐ मेरे यार तू कितना नादान है. - ममता सिंह की ग़ज़लें


ग़ज़ल -1-ममता सिंह

इस फ़रेबी ज़माने से अन्जान है
ऐ मेरे यार तू कितना नादान है

बिन तेरे अब न रहना गवारा मुझे
साथ में जीने मरने का अरमान है

तुझको चाहूँगी तुझको सराहूंगी मैं
तू इबादत मेरी, तू ही भगवान है

मैं दिया तो जलाऊँगी, ज़िद है मेरी
मानती हूँ बहुत तेज तूफ़ान है

इन अंधेरों से भी अब गुज़र जाऊँगी
तू उजाला मेरा, तू ही दिनमान है

है बड़ी बात 'ममता' निभाना उसे
कोई रिश्ता बनाना तो आसान है

--

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ग़ज़ल-2- ममता सिंह

उलझनों से कभी न हारूँगी
ज़िन्दगी यूँ ही मैं सन्वारूँगी

दाग़ दामन पे आ न जाए कहीं
इस तरह तुमको मैं निहारूँगी

दौर कैसी भी मुश्किलों का हो
हँस के मैं ज़िन्दगी गुज़ारूँगी

हर घड़ी इम्तहान वाली है
मैं मदद को किसे पुकारूँगी

ख्वाहिशें आज फिर से जागी हैं
कब तलक अपने मन को मारूँगी

दुनिया देखेगी रूप 'ममता' का
इस तरह दिल को मैं निखारूँगी

--

ग़ज़ल- 3-ममता सिंह

तुम लगाओ मुहब्बत की क़ीमत नहीं
हर जगह काम आती ये दौलत नहीं

उसकी जिस मुस्कुराहट पे हम मर मिटे
वो दिखावा था उसका मुहब्बत नहीं

यूँ लगा जैसे वो मेरे नज़दीक हो
सिर्फ एहसास था वो हक़ीक़त नहीं

उस सितमगर ने ढाए सितम तो बहुत
पर हमें उससे कोई शिकायत नहीं

क्यों अचानक ये आँखें छलक आई हैं
हमको आँसू बहाने की आदत नहीं

बात इतनी सी 'ममता' वो समझे कहाँ
मैं भी इंसाँ  हूँ पत्थर की मूरत नहीं

--

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ग़ज़ल-4-ममता सिंह

नैनों को न अब तुम तरसाओ
राधा के प्यारे कान्हा जी
हमको भी दर्शन दे जाओ
जशुदा के दुलारे कान्हा जी

जब से तुम मन में आन बसे
सुध बुध हमने बिसराई है
इन आँखों में सोते जगते
हैं ख्वाब तुम्हारे कान्हा जी

हर आस में तुम, हर साँस में तुम
इस जीवन का आधार हो तुम
दर छोड़ तुम्हारा जाऊँ कहाँ
तुम ही हो सहारे कान्हा जी

इस जीवन रूपी सागर में
मेरी नैया डगमग  डोल रही
आ जाओ न देर लगाओ अब
ले चलो  किनारे कान्हा जी

हमको भी तुम्हारे चरणों की
रज बनने का सौभाग्य मिले
'ममता' की यही है अभिलाषा
जग के रखवारे कान्हा जी
    ***Mamta Singh

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ममता सिंह (Mamta singh ) का परिचय

जन्म-3 अप्रैल- 1972
पिता- श्री छेदी सिंह गौतम
माता- श्रीमती पवित्री सिंह गौतम
पति- श्री अरवेन्द्र सिंह गहरवार
शिक्षा- एम.ए., एम एस डब्ल्यू
लेखन विधा- ग़ज़ल, गीत, दोहा आदि
सम्प्रति- डीलर इण्डियन ऑयल
सम्पर्क- एम आई जी- 135, सनसिटी कॉलोनी
छतरपुर (म.प्र.)
ग़ज़लें

ग़ज़लें 4080721707821395193

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