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कहानी : आत्म-समर्पण

संजय विद्रोही 'सुनो कँवर साब आज एक अजीब बात सुनी है.' पापाजी ने आकर बैठते हुए कहा. 'क्या पापाजी?' परेश ने कुर्सी की तरफ ...

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हास्य-व्यंग्य : स्त्री स्तोत्र

-भारतेंदु हरिश्चंद्र इस पूजा में अश्रु जल ही पाद्य है, दीर्घश्वास ही अर्ध्य है, आश्वासन ही आचमन है, मधुर भाषण ही मधुपर्क है, सुवर्णालंकार ...

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रामनारायण मिश्र की कहानी : मंगल सूत्र

**-** कहानी : मंगलसूत्र - रामनारायण मिश्र चिलचिलाती गर्मी के सन्नाटे ने एक रहस्यमयी उदासी की मानिन्द पूरे वातावरण को घेर रखा था. विचित्र ...

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कथाकार-उपन्यासकार हृदयेश का हृदय को बींधता संस्मरण

**-** आत्म-कथ्य : हृदयेश ने हड्डियाँ निकलवा दी हैं, चोट नहीं लगती. **-** -हृदयेश हृदयेश ग्यारह बजे के आसपास बाहर आ गए थे, सड़क पर, डाक क...

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आलेख : मस्जिद में हिन्दू, मन्दिर में मुसलमान

वही है धर्म-ईमान -स्वामी वाहिद काज़मी मुमकिन है शीर्षक पढ़ते ही कुछ पाठकों के मन में विचार उठे कि आगे शायद कुछ कविता जैसी चर्चा होगी। नह...

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मोहन द्विवेदी की हास्य - व्यंग्य कविताएँ

हास्य - व्यंग्य कविताएँ **-** पीर हरो नेताजी! **.** भूखी आँखें सूखे ओंठ देख रहे हैं तेरी ओर, इनकी पीर हरो नेताजी।। शादी को है घर में बाल...

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मोहन द्विवेदी की दो कविताएँ

मोहन द्विवेदी की दो कविताएँ : जब चला था छोड़कर **-** उस रास्ते के मोड़ को जब मैं चला था छोड़कर संबंध अभिशापित हुए अनुबंध सारे तोड़कर। धू...

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व्यंग्यः सर को क्यों न किया जाए बेअसर?

- राजकुमार कुम्भज अपने आका को ‘सर’ कहने की प्रथा का आविष्कार अंग्रेज़ों ने किया. हम भारतीयों में अपने आकाओं को ‘सर’ कहने की प्रथा को प्रति...

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भारतेंदु हरिश्चन्द्र की दो हज़लें (हास्य ग़ज़लें)

हिन्दी साहित्य के पितामह भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की दो हास्य ग़ज़लें **-** (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र संस्कृत, उर्दू, गुजराती, पंजाबी, मराठी, बँगल...

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