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नन्दलाल भारती का उपन्यास : चांदी की हँसुली

  जाड़े की रात । हाड़फोड़ शीत लहर। सियारों की चिल्‍लाहट । रह रहकर कुत्‍तों का रोना भय पैदा करने को काफी था । ज्‍यों ज्‍यों रात बढ़ती ज...

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नरेन्द्र निर्मल के गीत व कविताएँ

नौकरी मिलेगी नहीं छोकरी मिलेगी कहां उफ हू उफ हूं-3 नौकरी मिलेगी नहीं छोकरी मिलेगी कहां यार न मिलेगी प्यार होगी कहां उफ हूं उफ हूं...

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राकेश कुमार पाण्डेय की कविताएँ

'माटी की परी' खेतों में माटी ढोती, इक अलहड़ सी बाला ने, घर आ उतार कुदाल, माँ से कुछ ऐसे बोली । पेट क्षुधा के हाथों शोषित...

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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' के कुछ गीत

***** गीत २ कागा आया है जयकार करो, जीवन के हर दिन सौ बार मरो... राजहंस को बगुले सिखा रहे मानसरोवर तज पोखर उतरो... सेव...

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सोमेश शेखर चन्द्र की कहानी : सफर

बस रूकती, इसके पहले ही वह उससे कूद, रेलवे स्टेशन के टिकट घर की तरफ लपक लिया था। उसकी ट्रेन के छूटने का समय हो चुका था इसलिए वह काफी जल्दी...

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कृष्ण कुमार यादव की कविता : हे! राम

हे राम एक बार फिर गाँधी जी खामोश थे सत्‍य और अहिंसा के प्रणेता की जन्‍मस्‍थली ही सांप्रदायिकता की हिंसा में धू-धू जल रही थी ...

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पुरू मालव का आलेख : प्रेमचंद की अज्ञानता या आलोचक की महामूर्खता

  पाखी के दिसम्बर 2008 अंक में श्री रत्नकुमार साम्भरिया का एक लेख पूस की रात और प्रेमचंद की अज्ञानता प्रकाशित हुआ है। उसी संदर्भ में मेरा ...

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गौतम कुमार ‘सागर’ की कुछ कविताएँ

मंगल करने वाली मां, कहलाती है मंगला माँ !! एक निवेदन करुँ मैं तुमसे खड़ा हो कर दरबार में . मुझ पर थोड़ी करना कृपा खड़ा मैं भी क...

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नन्दलाल भारती का आलेख : वर्तमान समय में साहित्यकारों की भूमिका

साहित्यकार आस्था विश्वास,सामाजिक न्याय एवं दर्शन को सदियों से हस्तानान्तरित करते एवं समय के संवाद को शब्द का अमृतपान कराकर मानव कल्याण हेत...

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गणेश लाल मीणा की रपट : रेत पर उदयपुर में संगोष्ठी

उदयपुर। पारम्परिकता रेत के शिल्प को शिथिल नहीं कर सकी और जरायमपेशा समाज पर लिखे जाने के बावजूद यह अतिरंजना से बचता है। सुपरिचित आलोचक एवं...

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सीमा सचदेव का कविता संग्रह : मेरी आवाज भाग -2

भूमिका:- भाषा भावों की वाहिका होती है | मेरी आवाज़ भाग-२ उन भावों का संग्रह है जो समय-समय पर कहीं अंतरमन में उमड़े और लेखनी का रूप ले लिया |उ...

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