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अल्का सैनी की कहानी : मरीचिका

अपराजिता के जीवन का यह पहला अवसर था ,जब वह किसी बड़े नेता से मिलने आई थी .उनके ऑफिस में प्रवेश करते समय वह पूर्णतया सहमी हुई थी .मगर बचपन...

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अल्का सैनी की कहानी : मंजिल

प्रतीक्षा के कॉलेज का पहला दिन था, वह अपने पिताजी के साथ डी. ए. वी कॉलेज की ओर बस में जा रही थी. वह मन- ही-मन बहुत खुश थी,बस की खिडकियों ...

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क़ैश जौनपुरी की लघुकथा - निष्काम

लघुकथा. निष्काम... निष्काम, साईं संध्या, माता की चौकी, कीर्तन, सुन्दरकाण्ड हेतु सम्पर्क करें 98********10 --- - क़ैश ज...

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यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : स्नान-सुख

  आज मैं सुख की चर्चा करूंगा। एक जमाना था, जब मैं विवाहित नहीं था। फिर कुछ ऐसा चक्कर चला कि गृहस्थ हो गया। अब हालात ये है कि दिन बाद में ...

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हरि जोशी का व्यंग्य : भीख

अधिकारी – तिवारी जी, यह पांच वर्ष का लड़का भीख मांगता है? अभी से ही मां बाप भीख मांगने की आदत डाल देते हैं, मैं कभी पैसे वैसे नहीं देता....

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सरोजिनी साहू की कहानी : छिः!

छिः! मूल कहानी: सरोजिनी साहू हिंदी रूपांतरण: दिनेश माली ( कहानी 'छिः!' कहानीकार की सफलतम नारीवादी कहानीयों में से एक है।...

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पृथ्वीराज चौहान, सुकीर्ति भटनागर व शिवराज भारतीय की बाल कविताएँ

पृथ्वीराज चौहान की कविता -मां सुबह खुद जल्दी उठकर हमें उठाती है मां पास अपने बिठाकर भजन सुनाती है मां।   नहलाकर हमें सुन्...

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गिरीश पंकज का व्यंग्य - डबलरोटी में 'ग्रीस' : जीने की बख्शीश

एक खबर किसी अखबार में छपी, कि डबलरोटी के पैकेट में 'ग्रीस' मिला (गिरीश नहीं)। यह ग्रीस कपड़े में लिपटा हुआ था। अब इस...

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श्याम गुप्त की ग़ज़ल – माँ शारदे!

माँ शारदे है चाह,  तेरी शान में,   कह दूं ग़ज़ल माँ  शारदे ! कुछ कलम कारी का मुझे भी ज्ञान दो माँ शारदे ! वन्दना के स्वर ग़ज़...

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रामकृष्ण ''देहाती'' की कविता – सरस्वती आराधना

सरस्‍वती आराधना करके कृपा मुझ दीन को । कुछ दान दो वरदायिनी॥   करना क्षमा गर त्रृटि हो । नादान हूं वरदायिनी॥   कर दूर मेरे अ...

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हर्षकांत शर्मा की कविताएँ

अस्तित्व सच कहूं बिन तुम्हारे, मेरा अस्तित्व ही कहाँ है, मेरी पूर्णता ही केवल संग तुम्हारे,   कहो कहीं देखा है सूरज, बिन कि...

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सीताराम गुप्ता का आलेख : जब हम अपने लिए कोई रोल मॉडल चुनते हैं

हमारा कोई न कोई रोल मॉडल या नायक अवश्‍य होता है जो हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हमारे समाज, हमा...

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सुजान पंडित का व्यंग्य गीत : छब्बीस जनवरी का त्यौहार

छब्बीस जनवरी का त्यौहार ---------- छब्बीस जनवरी का त्यौहार फिर से आया रे | मैली कुरसी में नूतन, कवर चढ़ाया रे ||   चौराहों पर सुब...

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अनुज नरवाल रोहतकी की गणतंत्रिया ग़ज़लें

1 हाय! गुन्‍डे-मवाली लोग सियादत1 कर रहे हैं कैसे-कैसे लोग यहां सियासत कर रहे हैं   बिठाकर इनको अपनी सर-आँखों पर हम क्‍यों खरा...

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