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अनीता मिश्र की कविता - कितने दुखी हो तुम

क्‍या तुम्‍हारा दुख उससे बड़ा है ? सात साल की वो मासूम जो कचरे के ढेर से एक जोड़ी चप्‍पल मिलने पर खुश है अपनी छोटी बहन को पहना कर न...

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प्रमोद भार्गव का आलेख - लड़की को लड़का बनाने की चाहत

पितृसत्तात्‍मक मानसिकता और जीव वैज्ञानिक रूढ़िवाद हमारे देश के जन-मानस में कितनी गहरी पैठ बनाए हुए है, इसका पता लिंग परिवर्तन के लिए की जा ...

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विजय वर्मा की रचना - बीते हुए दिन

      बीते हुए दिन मस्तीभरी अब वो शमाँ नहीं है पहले जैसी यह जहाँ  नहीं है. ग़ुम है मतवाली कोयल की कूक साबुन,पानी,बुलबुले और फूँक . कहाँ  ...

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पुरुषोत्तम व्यास की कविता - अपनी कविता पढ़कर

अपनी कविता पढ़कर   अपनी कविता पढ़कर उसे याद करता भूली भूली  सी याद को फिर आंखों भरता हूँ खड़ी है अब भी वही देख रही है मुझ को ह्दय ...

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संजय दानी की ग़ज़ल - मुहब्बत विरह के धूप में तपती जवानी के सिवा क्या है...

मुहब्बत तेरी मेरी कहानी के सिवा क्या है, विरह के धूप में तपती जवानी के सिवा क्या है। तुम्हारी दीद की उम्मीद में बैठा हूं तेरे दर, तुम्हारे...

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मुक्त होती औरत - पुस्तक समीक्षा

समीक्षा - कथा संग्रह - मुक्‍त होती औरत - समकालीनता की दास्‍तान ‘ मुक्‍त होती औरत' समीक्षक - शीना एन. बी. स्‍वस्‍थ सामाजिक जीवन के नि...

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हरीश नवल की तीन व्यंग्य रचनाएँ

त्रिकोणीय न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी बचपन में एक गाना सुनते थे, ‘मधुवन में राधिका नाची रे।' कितनी भली थी तब राधिका जो बिना किसी ...

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शोभा रस्तोगी 'शोभा' की कविता - मेरी बिटिया

हंसती, मुस्काती , नाचती , गाती हर्षाती, इठलाती,बतियाती, मनाती कभी मनवाती कौन ...... मेरी बिटिया आंगन में खेल बड़ी हो रही रुनझुन करती, कुनम...

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प्रमोद भार्गव का आलेख - आभासी मीडिया और क्रांति की संभावना

        पत्रकारिता के नए माध्यम आभासी (ऑन लाइन) मीडिया को क्रांति का वाहक माना जा रहा है। इसे वैकल्पिक या भविष्य का मीडिया भी कहा जा रहा है...

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हरदीप कौर सन्धु की कविता - "चिड़िया - कबूतर पकड़ना"

बचपन में नन्हों की नन्हीं नन्हीं सी बातें टोकरी ले छोटी सी छड़ी से थोड़ा टेड़ा करते छड़ी को एक लम्बी  रस्सी बाँधते टोकरी के...

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सुरेन्द्र अग्निहोत्री का आलेख - आपात् काल का खतरा अभी टला नहीं

(25 जून 1975 पर विशेष जब इस देश में इस काले कानून को लागू करके नागरिक अधिकारों का हनन हुआ था) ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ (दिनकर) प...

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पुस्तक समीक्षा - दिल ले दर्पण के अक्स बने "वक्त के मंज़र"

दिल ले दर्पण के अक्स बने   "वक्त के मंज़र" ग़ज़ल-संग्रह: वक़्त के मंज़र लेखक: डा॰ ब्रहमजीत गौतम अपनी ग़ज़लों के लिए अपनी ज़ुबान...

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अजय कुमार तिवारी की कविता - हम जीतेंगे

हम जीतेंगे मैने  देखा  आसमान में  खिचड़ी बँटते , हरिश्चंद्र के  चेलों को  वादों से  नटते । गाली बकते हैं जिसको  पानी पी पीकर , उसके एक इ...

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नमन दत्त की ग़ज़ल

ग़ज़ल = दुनिया है बाज़ार, सुन बाबा.      हर नज़र करे व्यापार, सुन बाबा. बेमानी है एहसासों की बात यहाँ,      ख़ुदग़र्ज़ी है प्यार, सुन बाबा....

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प्रमोद भार्गव का आलेख - समान शिक्षा की आदर्श मिसाल

गरीब बच्चों के साथ सरकारी स्कूल में पढ़ती है कलेक्टर की बेटी:- समान शिक्षा की आदर्श मिसाल प्रमोद भार्गव         सरकारी शिक्षा में सुधा...

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रचनाकार के नियमित ग्राहकों की संख्या (रेगुलर सब्सक्राइबर) 1000 से ऊपर पहुँची

हिंदी साइटों के लिए 1 हजार  की जादुई  संख्या कोई कम नहीं है. आज रचनाकार के नियमित ग्राहकों की संख्या 1007 तक पहुँच गई. नीचे स्क्रीनशॉट देखे...

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दीप्ति परमार की कविताएँ - परिभाषा प्रेम की

फितरत चाहत यूं ही  मिल जाये कीमत नहीं होती जिन्दगी यूं ही मिल जाये कीमत नहीं होती । जो मिल जाये आसानी से उसे सम्हालने की फितरत नहीं होती ...

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संजय दानी की ग़ज़ल - मत झुकाओ नीमकश आखों को और, और कुछ दिन जीने का अरमान है।

मेरी तेरी जब से कुछ पहचान है, मुश्किलों में तब से मेरी जान है। प्यार का इज़हार करना चाहूं पर, डर का चाबुक सांसों का दरबान है। इश्क़ में दरवे...

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दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़ल - बस है बहस में आज के अखबार की बातें...

ग़ज़ल खूब  करली  खुद  गरज  संसार की बातें। आ  बैठ  करलें  चंद  लम्‍हें सार की बातें॥   बासी खबर बन रह गयी जिन्‍दा जली दुल्‍हन, बस है बहस में...

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दिनेश पाठक ‘शशि' का व्यंग्य - आदत से लाचार'' बनाम ‘‘हम नहीं सुधरेंगे

व्‍यंग्‍य रचना- ‘‘आदत से लाचार'' बनाम ‘‘हम नहीं सुधरेंगे'' डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि' अरे वाह! क्‍या बात करते हैं आप भी, ...

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हिमकर श्‍याम की पितृदिवस विशेष कविता

प्रा णों पे उपकार पिता के जीवन के आधार में लयबद्ध संस्‍कार में नाम में, पहचान में झंझावतों, तूफान में प्राणों पे उपकार पिता के डांट में, फ...

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दयानंद पांडेय का आलेख - अरविंद कुमार को शलाका सम्मान : एक सार्थक और प्रेरक ज़िंदगी जी है अरविंद कुमार ने

"...और अब अरविंद कुमार ने 1947 के देशभक्ति के अपने मूल मंत्र का पालन करते हुए बनाया है इंटरनेट पर ज़ारी होने वाला अनोखा अरविंद लैक्सिकन...

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