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राकेश भ्रमर की कहानी - अंधेरे रास्ते

कहानी अंधेरे रास्‍ते राकेश भ्रमर रात घनी अंधेरी थी, तिस पर वह पिए हुए था․ गिरता-पड़ता और दारू पिलाने वालों की जय-जयकार करता हुआ अकेला चला ...

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नमन दत्त का आलेख : सामाजिक लोकपल्लवन में सांगीतिक प्रतिबिम्ब और उसकी महत्ता

मानव सभ्यता के विकास के साथ ही साथ ललित कलाओं के अस्तित्व की अवधारणा भी समानान्तर रूप से पुष्ट होती गई। आदिकालीन मानव ने जब जीवन में एक सुव...

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प्रमोद कुमार चमोली का व्‍यंग्‍य - दुनिया में जीना है तो विवाद कर प्‍यारे

दुनिया में जीना है तो प्‍यार कर प्‍यारे लगता है ये बात कुछ पुरानी पड़ चुकी है। अब खालिश प्‍यार से काम नहीं चलता है। विवाद बगैर जीना भी कोई...

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पारुल भार्गव की कहानी - सगाई

सगाई पारुल भार्गव शाम के 4 बज चुके थे मैं अपने कमरे में बैठी टी.वी. देख रही थी तभी मेरी जेठानी मेरे कमरे में आई और मुझे टी.वी. के सामने पा...

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मोहसिन खान की कविता : भूमि और पौधे बनाम माँ और सन्तानें

भूमि और पौधे बनाम माँ और सन्तानें ( मदर्स डे पर विशेष ) और बीजों की तरह भूमि के भीतर से उग आया था, एक बीज ! भूमि की छाती पर । जो बीज अभी...

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नारायणसिंह कोरी के भजन

  शिरडी साईं बाबा सांई नाम जप लेना कष्‍टों को मिटाना हो, दुख दूर भगाना हो तो साई नाम जप लेना-2 के साई नाम जप लेना-2 हॉ साई नाम जप लेना...

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देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम' की ग़ज़लें - बाहर सर्द सुबह हूँ पर भीतर दुपहर दहता हूं...

ग़ज़ल झूठ से डरकर रहता हूँ , कड़वा सच पर कहता हूँ.   बूढ़ी माँ की आँखोँ से ; आँसू बनकर बहता हूँ .   बाहर सर्द सुबह हूँ पर ; भीतर दुपहर ...

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ज्योति सिंह का आलेख - संगीत चिकित्सा : एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

ज्योति सिंह, शोध छात्रा,     हिन्दी विभाग, वनस्थली विद्यापीठ,     निवाई, टोंक            संगीत मनुष्य की आरम्भिक अवस्था से जुड़ा हुआ है। प्र...

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शंकर लाल कुमावत की व्यंग्य कविता - ये चुनाव जुल्मी

ये चुनाव जुल्मी ये चुनाव जुल्मी जब भी आता है नेताओं पर बहुत जुल्म ढाता है जीतने के नाम पर इतने नाटक करवाता है की पूरा माहौल फिल्मिया नजर आ...

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गोवर्धन यादव का आलेख - बाल मनोविज्ञान

बाल-मनोविज्ञान को समझना भी एक बडी तपस्या है.-बचपन में लडना-झगडना-उधम मचाना चलता ही रहता है. मुझे अपने बचपन की हर छोटी-बडी घटनाएं याद है. बचप...

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एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - अंतर

अंतर फूला काकी अपने पोते को गो माता का महत्व बताती रहती थीं । लेकिन वह एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देता था । एक दिन काकी ने देखा कि...

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कृष्ण कुमार यादव की कविता : सभ्यता की आड़ में

  सभ्यता के झीने आवरण से दूर वे करते हैं विचरण अपनी दुनिया में जंगली सूअरों और गोह का शिकार कर खाते लोग कभी सीपियों का माँस, तो कभी मछली-क...

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आकांक्षा यादव की कविता : साँसें ही न थम जायें

  मौसम मस्ताना, दिल दीवाना तुझको पुकारे आ जा मौसम का सितम है मेरे सनम अब सह न सकूँगी आ जा। तेरी बाँहों के झूले में खो लूँ इतनी सी इजाजत तो...

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मेजर हरिपालसिंह अहलूवालिया - एवरेस्ट की चुनौती : अंतिम भाग 4

एक पर्वतारोही की एवरेस्ट फतह की रोमांचक दास्तान (अंतिम भाग) पिछले अंक से जारी... इसी बीच फू दोरजी ने काफी तैयार कर ली जिसे पीकर हम आ...

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मेजर हरिपालसिंह अहलूवालिया - एवरेस्ट की चुनौती : 3

एक पर्वतारोही की एवरेस्ट फतह की रोमांचक दास्तान (भाग - 3) पिछले अंक से जारी... थ्यांगबोचे में हम पांच दिन रुके। इस बीच हम पहाड़ों पर ...

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