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शशांक मिश्र भारती का आलेख - शैक्षिक जगत में भ्रष्‍टाचार समस्‍या एवं समाधान

भ्रष्‍टाचार दो शब्‍दों से मिलकर बना है। भ्रष्‍ट+आचार। जिसका अर्थ हुआ भ्रष्‍ट आचरण। जिस तरह से आचरण से गिरा व्‍यक्‍ति पतित-दुराचारी कहलाता ...

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अमरीक सिंह कुंडा की लघुकथाएँ - लंगड़ा आम, बिजी डे

कंडे का कंडा लंगड़ा आम ‘‘पंडित जी, हमारा काम नहीं चलता। यह हमारा टेवा देखिए और हम पर कृपा कीजिए।’’ लाला विष्णु प्रताप ने पंडित से कहा, ‘‘आप...

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रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - लो हट गई गरीबी!

व्यंग्य लो हट गई गरीबी! डॉ. रामवृक्ष सिंह बचपन में एक नारा सुनते थे-गरीबी हटाओ। लेकिन आज चार दशक बाद भी, जब बुढ़ापा हमारे जिस्म और ज़हन, दो...

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अतुल कुमार रस्तोगी की कविता - ओस, अब कहाँ!

ओस, अब कहाँ ! निशब्द अँधेरे में पिघलने का सुख तैरकर पत्तों पर फिसलने का सुख किरणों में कण-कण चमकने का सुख अब कहाँ ! आर-पार दिखने दिख जाने ...

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यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - सरकार के गरीब

इधर सरकारी सँस्‍था योजना आयोग ने फिर गरीब की रेखा का जिक्र कर के सरकार की किरकिरी कराई है।सरकारी आक़डों के अनुसार शहरी गरीब अलग होता है और ...

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अमरीक सिंह कंडा की लघुकथाएँ - सियासत, उधार की उम्र

कंडे दा कंडा सियासत भेड़ का मेमना नदी की ढलान पर पानी पी रहा था। अचानक उसकी नजर शेर पर पड़ी। शेर भी पानी पीने लगा। मेमने को अपने पड़दादा ...

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एस. के. पाण्डेय की लघुकथा स्वार्थी

स्वार्थी रामू मोटरसाइकिल चला रहा था। राज पीछे बैठा था। राज ने अचानक कहा रोको-रोको। रामू ने गाड़ी रोक दिया और बोला क्या हुआ। राज बोला वह ...

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प्रवासी साहित्य और साहित्यकार पर दो दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी

संगोष्‍ठी समाचार दिनांक 27-28 फरवरी 2012 को खालसा कॉलेज फॉर विमेन, अमृतसर के हिन्‍दी विभाग द्वारा विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग के सौजन्‍य स...

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मीनाक्षी भालेराव के गीत व कविताएं

आकार भोली-भाली मेरी मंशा, नींद की खुमारी सी, जाग उठी नव स्वप्न का आकर लिए! जैसे बूँदे आ मिलती धरती से, मैं पिय-मिलन को आतुर वैसे ! जैसे ...

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प्रमोद भार्गव का आलेख - शीर्ष न्‍यायालय और गरीबी रेखा

देश के गरीबी रेखा की खिल्‍ली उड़ाने के साथ योजना आयोग ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय की भी खिल्‍ली उड़ाई है। क्‍योंकि इसी न्‍यायालय ने दिशा-निर्देश...

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अमरीक सिंह कंडा की लघुकथा - भगवान की मौत

कंडे दा कंडा -अमरीक सिंह कंडा भगवान की मौत मैं अपनी बचपन की तस्वीरों वाली एलबम देख रहा था तो मेरी 7 वर्षीय पोती अपने पास आ गई और एलबम देखन...

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यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - इमर्जेंसी सूत्र

(यह व्यंग्य सत्तर के दशक में लिखा गया था जब देश में इमर्जेंसी लगाया गया था. यूँ तो कहने को स्वतंत्रता हासिल है, मगर अपरोक्ष इमर्जेंसी तो हर...

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अमरीक सिंह कंडा की कहानी - कंडे दा कंडा

कंडे दा कंडा -अमरीक सिंह कंडा आप जी ....? आप जी का जन्म नहीं हो रहा था। समय दस महीने हो चुके थे। आप जी की माता ने ऊपर वाले के आगे अरदास ...

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त्रिलोक सिंह ठकुरेला के हाइकु नवगीत

हाइकु नवगीत मेरा जीवन   मेरा जीवन सुख - दुःख पूरित अंक गणित।   और और की सघन कामना में जीवन बीता।   आखिर मिला मुझे जीवन - घट रीता...

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खलील जिब्रान की एक कविता

  अनुवाद - डॉ. पुनीत बिसारिया आपके बच्चे वास्तव में आपके बच्चे नहीं हैं वे स्वतः प्रवाहित जीवन में पुत्र और पुत्रियाँ हैं वे आए हैं मगर आप...

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देवेन्द्र कुमार पाठक की चैतहर कविताई

नवगीत/चले चैतुए ~ - ~ - ~ अपने घर-गाँव छोड़ चले चैतुए ! कब तक भटकाएगी ? पगडण्डी पेट की , साँसोँ का कर्ज़भार छाती पर लादे : जाने किस ठौर-ठाँव ...

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देवेन्द्र पाठक 'महरूम' की की कविताई/ बधाई ! नव विक्रम संवत्सर,चैती चाँद एवं गुड़ी पड़वा के अवसर पर एक ग़ज़ल

ग़ज़ल/ अश्क-ए-ख़ून बहाकर ये गुज़र जाएगा | वो जो आएगा वो भी अश्के ख़ूं बहाएगा ||   अब कहीँ फेरो-बदल के कोई आसार नहीँ ; जलेगा रोम नीरो बाँसुर...

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वीरेन्‍द्र कुमार कुढ़रा की व्यंग्य एकांकी - जिन्दा ! मुर्दा !!

व्‍यंग्‍य एकांकी - जिन्‍दा ! मुर्दा !! - वीरेन्‍द्र कुमार कुढ़रा पात्र परिचय नर्स- बार्डबॉय- जमादार लेखक - संचालक - नेता - ( पर्द...

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गोविंद शर्मा के दो व्यंग्य - फरारी की सवारी, बंदरबांट

  फरारी की सवारी यह किसी फिल्म की कहानी नहीं है फिल्मों से प्रभावित होने वालों की कहानी है। पुलिस के अफसर, जो सरकार के समकक्ष होते हैं, फ...

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प्रमोद भार्गव का आलेख - कथा-कविता समय के बहाने आकाशवाणी का ठसे और ठूंसों हुओं का साहित्‍य-सम्‍मेलन

  शिवपुरी/आकाशवाणी शिवपुरी द्वारा आयोजित दो दिवसीय साहित्‍यिक आयोजन ने ठूंसे व ठसे गए साहित्‍यकारों के कारण गरिमा खो दी। ऐसा इसलिए हुआ क्‍य...

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असग़र वजाहत का नाटक - जिस लाहौर नइ वेख्या ओ जमया हि नइ - पीडीएफ ई बुक के रूप में पढ़ें या डाउनलोड करें

पिछले दिनों यह नाटक रचनाकार में धारावाहिक रूप से क्रमशः प्रकाशित किया गया था. यह पूरा नाटक आप यहाँ पर नीचे लिंक को क्लिक कर सीधे ही पढ़ सकते...

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मोतीलाल की कविता

घरों में रात चढ़ गयी है और अस्मिता की मद्धिम कराह तीसरे पहर में भी रेलवे स्टेशन की तरह जाग रही है बेजान आँचल की हवा नीले समुद्र से होकर नही...

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अवधेश तिवारी की बुंदेली हास्य कविता - कँदर मँदर जी होवे...

  कँ दर मँदर जी होवे        कँदर मँदर जी होवे मेरो कँदर मँदर जी होवे        पिया न लौटे अब तक बिन्नी मेरो मनुआ रोवे|      भुनसारे के निकरे ...

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राजा अवस्थी के दो नवगीत - घर कभी निर्मम नहीं होता

                                                                   घर-1 घर कभी निर्मम नहीं होता कहीं माँ से कम नहीं होता आँधियाँ कठिनाइय...

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एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य : कथन की वापसी

प्रा चीन समय में ऐसे भी राजा होते थे जो अपने कथन की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा दिया करते थे। और तो और स्वप्न में दिए गये कथनों तक की र...

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