प्राची - जनवरी 2016 - कविताएँ

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  जीवन न बने क्षेत्र ‘रण’ का डॉ. राजकुमार ‘सुमित्र’’   महत्वपूर्ण है ‘जन’ और ‘संख्या’ है अर्थपूर्ण. सम्पूर्णता मिलती है ‘जन’ को ...

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जीवन न बने क्षेत्र ‘रण’ का

डॉ. राजकुमार ‘सुमित्र’’

 

महत्वपूर्ण है ‘जन’

और

‘संख्या’ है अर्थपूर्ण.

सम्पूर्णता मिलती है

‘जन’ को ‘संख्या’ से

और ‘संख्या’ को ‘जन’ से.

मन से

उठती है आवाज

कि आज

कितनी जनसंख्या देश की

क्या स्थिति है परिवेश की?

आज

भूख/बेकारी/गरीबी और

भ्रष्टाचार

हिला रहे हैं आधार

समृद्धि का,

कारण है

जनसंख्या वृद्धि का.

अधिक है क्षेत्रफल

कम है उपज और उत्पादन,

इसलिए

अभाव पीड़ित है

साधारण जन.

महंगाई सुरसा हो रही है.

खुशी उड़नछू हो रही है तो

जीवन न बने क्षेत्र ‘रण’ का

ध्यान रखना होगा

जनसंख्या नियंत्रण का.

संपर्कः 112 सराफा वार्ड, जबलपुर (म.प्र.)

मोः 09300121702

 

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दो गजलेंः शिवशरण दुबे

एक

अब तो हम बैसाखियों पर चल रहे

चौकड़ी भरने के दिन वे खल रहे

 

याद आते तो कुतरते जेहन को

दिन पुराने धीरे-धीरे ढल रहे

 

था समय, जब था पसीना इत्र-सा

आज अपने हाथ दोनों मल रहे

 

सब्र करना आजकल हम सीखते

फूल-से अहसास सारे जल रहे

 

तिलमिलाने के कई मौके यहां

दिल मिलाने के महूरत टल रहे

 

हम इशारों से चलाते थे जिन्हें

वे हमे हमदर्द बनकर छल रहे

 

था पिलाया दूध जिनको दूर से

हैं वही आस्तीन में अब पल रहे

 

दो

दफ्तर में बड़ा साहब औकात पूछता है

औकात से भी पहले वो जात पूछता है

 

बेटी बियाहने को भावी दमाद से

इक बाप आय-व्यय का अनुपात पूछता है

 

व्यापार खेती-बारी की बात न पूछे

किस ‘जॉब’ में है बेटा तैनात पूछता है

 

शादी के बाद दूल्हा दुल्हन से रात में

नैहर से मिली क्या-क्या सौगात पूछता है

 

देखा है एक खूसट को, नौजवान से

जो न बताई जाये वह बात पूछता है

 

मुंह पोपला है उसका, पर क्रूर मसखरा

कितने बचे हैं, भीतर के दांत पूछता है

 

बॉटल में रोज लाकर पापाजी क्या पियें

बच्चा ये प्रश्न मां से दिन-रात पूछता है

 

संपर्कः संदीप कॉलोनी, दमदहा पुल के पास, कटनी रोड, बरही-483770 (म.प्र.)

 

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मधुर नज्मी

जो लम्हे मुखातिब हुए मुझसे कल के

वही आज रंगी गजल बन के छलके

गुजरती है क्या गांव वालों के दिल पर

व्यथा उनकी समझेंगे गांवों में चल के

मोहब्बत की इक दास्तां कह रहे हैं

तखय्युल के शीशे में अल्फाज ढल के

गुजारिश यही है सभी हमजबां से

सियासत के सांपों से रहना संभल के

मुसलसल धुआं ही धुआं दे रहे हैं

सियासत के शोलों में एहसास जल के

जिन्हें आज रोटी के लाले पड़े हैं

उन्हें ख्वाब आते कहां हैं महल के

उसी के हवाले से सब कुछ कहा है

जो नश्शा अदब का चढ़ा हल्के-हल्के

मेरी फिक्र को मेरे एहसास को भी

समय ने छुआ किन्तु तेवर बदल के

खयालों के कुछ कुमकुमें हैं जो अक्सर

‘मधुर’ लफ्ज की हैं झंझरियों में झलके

सम्पर्कः ‘काव्यमुखी साहित्य अकादमी’ गोहना मुहम्मदाबाद, जिला-मऊ-276640

मोः 9369973494

 

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दो गजलें

साहिल

एक

एक साये से दूजे को जोड़ा होगा

और आहिस्ता से फिर आइना तोड़ा होगा

सिर्फ राहें ही नहीं मोड़ते हैं दीवाने

जानिबे-राह पूरा दौर भी मोड़ा होगा

हाथ काटे गये फिर भी जुझारू लोगों के

हाथ तूफान का दिन रात झिंझोड़ा होगा

झुर्रियां अपने ही चेहरे की न बरदाश्त हुईं

घर के माहौल को फिर यूं ही मरोड़ा होगा

दूर सहरा से निकलने के लिये लोगों ने

प्यास का रिश्ता सराबों से ही जोड़ा होगा

डूब जाता है जो बिंबों की रगों में तो क्या

शीशे के वास्ते वो शख्स भगोड़ा होगा

लहू के नाम पे साहिल न मिले कतरा तक

वक्त ने ऐसा हर इंसां को निचोड़ा होगा

दो

भीड़ में तनहाई की तकदीर हूं

खल्वतों की फैलती तदबीर हूं

सामने ही मंजिलें मकसूद है

और मैं घर लौटता रहगीर हूं

हौसला-अफजाई के इस दौर में

मैं हर अपने पांव की जंजीर हूं

नाज है मुझको कि मेरी खुद की है

चाहे बिल्कुल मांद सी तन्वीर हूं

आइना पहचान कैसे पाएगा

मैं बदलते वक्त की तासीर हूं

जक्ष्म-गम-आंसू-उदासी-ठोकरें

मैं सरापा दर्द की जागीर हूं

जंग ‘साहिल’ कैसे जीती जाएगी

मैं तो अब इक जंग-जूं शमशीर हूं

सम्पर्कः ‘नीसा’ 3/15, दयानंद नगर, वानिया वाडी, राजकोट-360002

मोः 9428790069

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गीत और मुक्तक

मधुर गंजमुरादाबादी

 

बहुत दिनों के बाद

गांव को आए गंगाधर

भुलभुल, कीचड़ धूल नहीं है

पक्की सड़क बनी.

पर न किनारों पर पेड़ों की

छाया कहीं घनीं.

दूर-दूर तक कहीं न दिखते

हैं छानी-छप्पर.

बैठ गया है कुआं न दिखता

यहां कहीं पनघट,

सूखी हुई नहर गुमसुम है

टूटा पड़ा रहट.

सबके चेहरों पर उतरा

सूखा-अकाल का डर.

जिसे देखकर उनके मन को

लगा बड़ा झटका,

चौराहे पर मधुशाला का

बोर्ड मिला लटका.

ठीक सामने मंदिर से

उठता कीर्तन का स्वर

मिले सभी से किन्तु किसी से

अपनापन न मिला,

झील पटी है, जलकुम्भी से

पंकज-वन न खिला.

सोच रहे हैं क्या पाया है

भला यहां आकर.

1.

काव्य में मुक्ति की लहर आई,

कितनों ने राह नयी अपनाई,

कुछ नहीं, गति न लय रही बाकी-

अब तो मुश्किल नहीं है कविताई.

2.

चाहते पाना यश गजल कहिए,

कुछ न कहिए कि बस गजल कहिए

छोड़िए तख्ती-बहर का झंझट-

एक क्या आप दस गजल कहिए.

3.

किसको मक्ता कहें किसे मतला,

आपके मन से भ्रम नहीं निकला,

काफिए की कहीं नहीं बन्दिश-

एक ही बस रदीफ है किबला.

4.

चुटकुले मंच पर उछालेंगे,

लोग बढ़कर गले लगा लेंगे,

गीत-नवगीत कौन सुनाता है-

हंस के साहित्य का मजा लेंगे.

5.

नीति-नियमों से इनको क्या लेना,

और उत्तर भी किसको क्या देना,

मन में आए करें वही मन की-

राज तो इनका ही यहां है ना.

6.

कैसे-कैसे हैं लोग दुनिया में,

जाने कितने हैं रोग दुनिया में,

त्याग को त्याग चुके हैं कब के-

जिनको करना है भोग दुनिया में.

 

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कविता

जब किसान आंसू बोता है

आचार्य भगवत दुबे

 

जब किसान आंसू बोता है

हर पौधा शोला होता है

कुटियों को नचवाया जाता

जश्न महल में जब होता है

हर चुनाव ने इसको लूटा

मतदाता फिर भी सोता है

लोकतंत्र फल-फूल रहा है

संविधान फिर क्यों रोता है

ग्रंथों से मोती बटोरता

गहन लगाता वह गोता है

ज्ञान नहीं खुद का भविष्य फल

बना ज्योतिषी जो तोता है

अंतर्मन का मैल न धोया

गंगा में तन को धोता है.

संपर्कः पिसनहारी-मढ़िया के पास

जबलपुर-482003 (म.प्र.)

मोः 09300613975

 

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कविता

चाहता हूं इस धरा पर

कार्तिकेय त्रिपाठी

 

चाहता हूं इस धरा पर

स्वर्ग को बसने भी दूं,

पनप रही शाब्दिक कटुता में

प्रेम के मैं रंग भर दूं,

सत्य की ही बात हो

और सत्य की ही जीत हो,

भूखे उर की चाह को मैं

पूर्ण संतुष्टि से भर दूं,

न बहे मदिरा की हाला

दूध, जल बहता रहे,

इस धरापर बेटियों का

कुनबा भी नित बढ़ता रहे,

सुख की हर एक कल्पना को

मैं यहां साकार कर दूं,

प्यार के रंगों में भरकर

खुशियों की बौछार कर दूं,

स्नेह, दया की पाखुंडी से

सब समर्पण मैं करूं,

जिन्दगी को जीने की

बस एक यही पहचान हो,

चाहता हूं इस धरा पर

सबके होंठों पर मुस्कान हो.

संपर्कः 117 सी. स्पेशल गांधीनगर,

453112 इन्दौर (म.प्र.)

मोः 7869799232

 

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कविता

एक निहोरा!

अभिनव अरुण

 

चलो नहरों से कह दें

गांव में कुछ दिन गुजारें

बहुत बेचैन से हैं

वर बने ये खेत सारे

रचे कोहबर हमारे आंगनों में

क्यारी क्यारी

महावर से सजे पगडंडियों के द्वार सारे

नहीं नदियों से हमको कुछ शिकायत

वो चाहे जाएं जा सागर को जी भर कर पखारें

हैं चिर आशीष उनको दे रहे

ये बीज सारे

ये सूखी पत्तियों पर

प्रेम पाती कौन लिखता

कि इतने आर्त्र स्वर में कौन लहरों को पुकारे

किसे बेचैन करती प्रेम कोंपल

जो ठूंठों पर कई रातें बिताते चांद तारे

भला किसको खबर किसको पता है

कि किससे कौन रूठा

कौन सोता है ओसारे

हमीं फिर से करें आदाब सारे और सीखें

चमन के भंवरे सारे फिर सुबह को चल पड़े हैं

तमाम रात की बंदिश बिसारे

चलो नहरों से कह दें

गांव में कुछ दिन गुजारें

बहुत बेचैन से हैं

वर बने ये खेत सारे

सम्पर्कः बी- 12, शीतल कुंज,

लेन-10, निराला नगर, महमूरगंज,

वाराणसी-221010 (उ.प्र.)

 

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कविता

चिर प्रतीक्षा

केदारनाथ सविता

 

मेरे मीत!

तुम आज भी नहीं आये

मैं पूजा की थाली लेकर

मंदिर में देर तक बैठी रही

मैं जानती हूं कि पहले तुम

मंदिर के घंटे की

एक धीमी आवाज पर

दौड़े चले आते थे,

तुम भी जानते हो

कि मैं मंदिर में

पूजा की थाली

भगवान के लिए नहीं लाती

मेरे देवता

तुम्हारे लिए लाती हूं,

केवल तुम्हारे लिए,

मेरे मीत.

मैं कल भी आऊंगी

और तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगी

मैं जानती हूं

कि तुम कल भी नहीं आओगे

कभी नहीं आओगे

मगर मैं इसी मंदिर में

प्रतिदिन तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगी

प्रतीक्षा...चिर प्रतीक्षा.

संपर्कः लालडिग्गी थाना रोड,

सिंहगढ़ की गली, नई कालोनी,

मीरजापुर-231001 (उ.प्र.)

मोः 05442-64389

 

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डॉ डी एम मिश्र की चार गजलें

1

ख्वाब सब के महल बंगले हो गये.

जिंदगी के बिंब धुंघले हो गये.

 

दृष्टि सोने और चांदी की जहां,

भावना के मोल पहले हो गये.

 

उस जगह से मिट गयीं अनुभूतियां,

जिस जगह के चाम उजले हो गये.

 

आसमां को जो चले थे रोपने,

पोखरों की भांति छिछले हो गये.

 

कौन पहचानेगा मुझको गांव में,

इक जमाना घर से निकले हो गये.

 

2

आदमी देवता नहीं होता.

पाक दामन सदा नहीं होता.

 

कब, कहां, क्या गुनाह हो जाये,

ये किसी को पता नहीं होता.

 

आदमी आसमान छू सकता,

वक्त से, पर बड़ा नहीं होता.

 

काम का बस जुनून चढ़ जाये,

उससे बढ़कर नशा नहीं होता.

 

टूटकर हम बिखर गये होते,

साथ गर आपका नहीं होता.

 

जब तलक आंख नम न हो जाये,

हक गजल का अदा नहीं होता.

 

3

जिनके जज्बे में जान होती है.

हौसलों में उड़ान होती है.

 

जो जमाने के काम आती है,

शख्सियत वो महान होती है.

 

सबको क़़़ुदरत ने बोलियां दी हैं,

आदमी के जुबान होती हैं.

 

ये परिन्दे भी जाग जाते हैं,

भोर की जब अजान होती है.

 

सब किताबें हैं बाद में, पहले,

भूख की दास्तान होती है.

 

हम मुसाफिर हैं रुक नहीं सकते,

पांव में बस थकान होती है.

4

प्यार मुझको भावना तक ले गया.

भावना को वन्दना तक ले गया.

 

रूप आंखों में किसी का यूं बसा,

अश्रु को आराधना तक ले गया.

 

दर्द से रिश्ता कभी टूटा नहीं,

पीर को संवेदना तक ले गया.

 

हारना मैंने कभी सीखा नहीं,

जीत को संभावना तक ले गया.

 

मैं न साधक हूं, न कोई संत हूं,

शब्द को बस साधना तक ले गया.

 

अब मुझे क्या और उनसे चाहिए,

एक पत्थर, प्रार्थना तक ले गया.

 

सम्पर्कः 604, सिविल लाइन, निकट राणा प्रताप पी जी कालेज,

सुलतानपुर-228001

मोः 09415074318

 

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अभिनव अरुण की दो गजलें

1

बंद दरवाजे देखे घर घर के.

कैसे जीते हैं लोग मर मर के.

 

है सुकूं उनको भी नहीं गोया,

जी रहे जो फरेब कर कर के.

 

हमने तर्पण किया है मूल्यों का,

अपनी अंजुरी में रेत भर भर के.

 

आदमी दास है मशीनों का,

हैं नजारे अजब शहर भर के.

 

हर गली मोड़ पर तमाशा है,

देखता हूं ठहर ठहर कर के.

 

किस शहर में हमें ले आये मियां.

लोग मिटटी के घर हैं पत्थर के.

 

हाथ में उसके जाल भी देखो,

देखते हो जो दाने अरहर के.

 

दांव पर कौन है लगा बोलो,

किसकी मुट्ठी में पासे चौसर के.

 

आज भी द्रौपदी है सहमी सी,

ढंग बदले हुए हैं शौहर के.

 

हमने शेरों में खुदा को देखा,

तुमने देखे लिबास शायर के.

 

2

दुश्मनी सबसे पुरानी है तो है.

मेरी आदत खानदानी है तो है.

 

झूठ को मैं झूठ कहता हूं सदा,

गर ये मेरी बदजुबानी है तो है.

 

तुझमें देखे पीर देखे औलिया,

मां तेरा चेहरा नूरानी है तो है.

 

मेरे आंगन बारिशें होती नहीं,

फिर भी फस्ले जाफरानी है तो है.

 

बा अदब वो शेर पढ़ते हैं मेरे,

फिक्र ही मेरी रुहानी है तो है.

 

गुलशनों की सैर मैं करता नहीं,

शेर में खुशबू लोबानी है तो है.

 

चापलूसों को नवाजा जा रहा,

आप की ये हुक्मरानी है तो है.

 

खौलता हूं जुल्म होता देख कर,

पागलों की ये निशानी है तो है.

 

इस सियासत से मिला है क्या भला,

पर यही चादर बिछानी है तो है.

 

आप बिरयानी उड़ायें शौक से,

अपने हिस्से भूसा सानी है तो है.

 

सैकड़ों करते बसर फुटपाथ पर,

ये तरक्की की निशानी है तो है.

 

चांदी की चौखट है सोने का पलंग,

आपकी किस्मत सुहानी है तो है.

 

गांव की संसद करे हर फैसला,

ख्वााब ये भी आसमानी है तो है.

 

ये अदब तहजीब से वाकिफ नहीं,

सर्फ होती नौजवानी है तो है.

 

बांध तुमने बांध डाले सैकड़ों,

अब ये गंगा सूख जानी है तो है.

 

लाल कर देगा जमीं को छोर तक,

खून में मेरे रवानी है तो है.

COMMENTS

BLOGGER: 1
  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 06 मार्च 2016 को लिंक की जाएगी...............http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद! 

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आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: प्राची - जनवरी 2016 - कविताएँ
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