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पुस्तक समीक्षा :: गजल संग्रह “मसाफत-ए- ख्वाहिशात” लेखिका श्रीमति शुचि भवि

पुस्तक समीक्षा :: गजल संग्रह “मसाफत-ए- ख्वाहिशात” लेखिका श्रीमति शुचि भवि ,

प्रकाशक :: साहित्य कलश पब्लिकेशन ,

मूल्य :: ३०० रू

ईमेल shuchilekha@gmail.com

ये चंद शेर , मुहब्बत के अशआर , तन्हाई की गजल , तल्खियों में तंज , अपने मिजाज से जिस शायरा ने लिखी है , उसका नाम, हलक ऐ अदब में श्रीमती शुचि भवि है |

उभरती हुई शायरा ने कम समय में गजल लिखने और उसके तौर-तरीकों को  बहर-मीटर में निर्वाह करने की जो क्षमता पाई है, वो काबिले तारीफ है |

इसका पूरा श्रेय वो अपने उस्ताद शायर श्री सागर सियालकोटीजी को देती हैं |

यह ,आन लाइन प्रशिक्षण का नायाब उदाहरण,महीनों की मेहनत और सीखने-सिखाने की पक्की धुन इस गजल संग्रह की परिणिति बनी, सामने  है |

यूँ तो खेलो के उस्ताद को गुरु द्रोण पुरूस्कार से नवाजने की परंपरा है , मगर सैकड़ो साहित्य के उस्ताद, जिन्होंने राष्ट्रीय मानक के शायर दिए, इनाम –इकराम से कभी नहीं नवाजे गए | साहित्य बिरादरी की तव्वज्जो, उन्हें इस दौड़ में शामिल करने की परंपरा की शुरुआत करेगी |

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गजल लिखने के लिए स्वस्फूर्त जज्बा ,उर्दू शब्द भंडार ,भाषा में पकड़ ,अध्ययनशीलता, मनन ,एकाग्रता इन सभी का होना जरूरी होता है | गजल को रूहानी बातों के अलावा भी अब बहुत कुछ कहने की जरूरत समय सापेक्ष सा हो गया है | सामयिक सारोकार भी गजल की पृष्ठभूमि सी बनती जा रही है इसलिए गजलकार इन सबसे जुदा रहकर अपनी रचना को प्रभावी नहीं बना सकता | शायरा शुची भवि को शायद ये इल्म था ,तभी उनने हटकर बात कहने की कोशिश की और कामयाब   |

उनके उस्ताद मानते हैं कि शुची के पास दिलकश ख्यालों का एक बड़ा जखीरा है |अपनी जरखेज सोच से संभावना के कल को क्या- क्या देने जा रही है | हम प्रतीक्षारत रहें | असीम संभावनाओं की नेत्री को उनकी गजल संग्रह मसाफ़त ऐ ख्वाहिशात पर हार्दिक बधाई |

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मेरी पसंद में उतरे .....ये सब .... आपकी नजर ...

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खुद से खुद मिलने का ए दोस्त ख्याल अच्छा है

तुम मिले हो तो लगता है कि साल अच्छा है

कैसे मैं कह दूं क्या होगा मेरा मुस्तकबिल

न तो माझी मेरा अच्छा था न हाल अच्छा है

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अश्क  में भी बगावत की बू आ गई

क्या कोई आंख का अब सगा रह गया

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बनाई है जमाने ने किताबों में पकी रोटी

कलाकारों में भी भूखा हमें आवाज देता है

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भला कोई किसी का है कहां सारे जमाने में

लगे हैं सब के सब एक दूसरे को आजमाने में

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भले गुरबत में है लेकिन अजब दौलत कमाता है

दुआएं रोज मिलती है उसे पानी पिलाने में

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लिया है आपने क्यों बेसबब बिन काम का पैसा

हरम आमेज हो जाएगा ये आराम का पैसा

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हमने खुद को रंग कर देखा है तेरे प्यार में

वैसे पक्के रंग की पिचकारी होती नहीं

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वहीं उनकी नजरों से बचकर सदा मैं

मगर फिर भी उनके इशारों ने लूटा

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सुर्ख  सुर्ख होठों पर आग सी दहकती है

टूट कर भी औरत हर हाल में संभलती है

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नींव ही  तो करती है तय कि घर बने कैसा

सोच जब हो अच्छी तो जिंदगी महकती है

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गम के सैलाब में कश्ती ए जिंदगी

चलती बढ़ती रहे दिल की पतवार से

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दिल में तुमको बसा कर देख लिया

सच को भी आजमा के देख लिया

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राज कितने दिनों में दफन हुए

थोड़े हमने छुपा के देख लिया.....

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खुदा के पास जाऊं तो करूंगी ये शिकायत मैं

कि औरत को ही वो क्यों इस कदर नाजुक बनाते हैं

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धूप में सारा दिन जो जलता है

भूख  घर से लिए निकलता है

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बेटा सरहद से आज लौटा तो

मां ने जाना कि ‘भवि’ दुआ क्या है

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वो मासूम बच्चा किसी झोपड़ी का

कहो क्या वो कल का सितारा नहीं है

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कितने उत्तम रहे हैं बाबूजी

और बबुआ की चाल मत पूछो

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आस टूटी है मां की बेटे से

क्यों है ‘भवि’ वो निढाल मत पूछो

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बहुत कम बच गए हैं हौसले वाले जमाने में

मिले जो कोई तुमको तो उसे लाचार मत करना

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हम अहले इश्क उल्फत का समुंदर ले के चलते हैं

अना वाले तो बस हाथों में पत्थर ले के चलते हैं

वो  चलते हैं मोहब्बत के गुलों को हाथ में लेकर

मगर नफरत के कांटे दिल के अंदर लेकर चलते हैं

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नई तहजीब देखी है बदलते वक्त में हमने

सब अपनी छोड़ गैरों की जमीं जर ले के चलते हैं

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हकीकत है किसी अंजाम से डर कर नहीं चलते

जिगरवाले कफन अपना तो अक्सर ले के चलते हैं

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सिपाही रात दिन लड़ते हैं सरहद की हिफाजत में

वो अपनी मौत को ‘भवि’  अपने सर पर ले के चलते हैं

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लोग एहसान गिनाते हुए मर जाते हैं

और हम कर्ज चुकाते हुए मर जाते हैं

पहले मर मर के बनाते हैं मकामे उल्फत

और फिर रिश्ता निभाते हुए मर जाते हैं

शम्स खुद अपने को कहते हैं जो एक रोज वही

बात जुगनू की बताते हुए मर जाते हैं

जिन परिंदों का शजर  देख रहा है रास्ता

लौट कर ‘भवि’ वही आते हुए मर जाते हैं

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हमने चाहा था वो सुधर जाए

महके फूलों सा रोज घर आए

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सिर्फ उन्माद बढ़ाने पर तुली है दुनिया

हंसते लोगों को रुलाने पे तुली है दुनिया

जब गिरे थे तो कहा था कि खड़े हो जाओ

अब खड़े हैं तो गिराने पे तुली है दुनिया

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वही बरगद वही पनघट वही मंदिर वही मस्जिद

कहां बदला है बरसों बाद भी कुछ रहगुजारों में

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