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कहानी - गलफाँस - देवेन्द्र कुमार पाठक

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कहानी गलफाँस देवेन्द्र कुमार पाठक तब लोगों ने समझाया तो बहुत पर अपनी तंगहाली, दो बाल-बच्चेदार बेटों की बेरोजगारी और थोड़ी-सी बिना सींच की ज़मी...

कहानी

गलफाँस

देवेन्द्र कुमार पाठक


तब लोगों ने समझाया तो बहुत पर अपनी तंगहाली, दो बाल-बच्चेदार बेटों की बेरोजगारी और थोड़ी-सी बिना सींच की ज़मीन पर खेती के बूते खींच-तानकर,जैसे-तैसे गुजर कर पाने की मज़बूरी के चलते,वह कुछ भी नहीं समझ-सोच सका था. बीस बरस के लिए अपनी बाड़ी में टॉवर लगाने की मंजूरी उसने मोबाइल कम्पनी के जिस अधिकारी को दे दी थी; उस अधिकारी ने कई तरह के कागजात पर उसके दस्तख़त और पास-पड़ोस के चार लोगों की गवाही ली थी. हर महीने के पहले हफ्ते में भूमि का किराया बिलानागा चुकाने का बीस साल का इकरारनामा कम्पनी से से हुआ था. हरिहर के अलावा इसका दावेदार नामनी ललन ही था.दोनों बेटे और बहुएं भी खुश थीं कि हर महीने घरेलू खर्च के लिए आमदनी का एक पक्का जरिया बन गया है. कुछ नुकसान जो टॉवर में ज़मीन फंसने के कारण होनेवाले थे,उनकी भरपाई इस किराये के रुपयों से होने के अलावा भी फायदा ही होना तय था.
बाड़ी की ज़मीन पर मोबाईल कम्पनी के चार मिस्त्रियों ने पहाड़-सा ऊँचा पखवाड़ा बीतते-बीतते खड़ा कर दिया था,


उस ज़मीन से कड़ी मेहनत के बाद कुछ सब्ज़ियाँ,मकाई और राई की फ़सल साल भर में जो मिलती थीं,उनकी तुलना में किराये से होनेवाली बिना मेहनत की आमदनी चौगुनी होनी तय थी. टॉवर के चौगिर्द बच रही ज़मीन पर हरिहर को अब भी कुछ सब्ज़ियाँ उगाने की कोई रोक-टोक न थी.बाजू में एक कोठरी बनायी गयी,जिसमें चौबीस घँटे कम्पनी का एक ऑपरेटर रहने लगा था,वह टॉवर की देख-रेख करता था. हरिहर से उसको भी मुफ्त में खाने को ताजी सब्जी मिल जाती थी.दिन में चार-छः बार ददन के साथ बैठ वह तम्बाखू खाता और गप्पें मारता था.


हरिहर का पूरा परिवार उस दिन ख़ुशी से गहगहा उठा,जिस दिन पहले माह का किराया हरिहर के हाथ आया.ढाई हजार रुपये महीने की आमदनी गंवई-गांव के मानुष के घर-परिवार के लिए कितना बड़ा तोहफा है,यह कोई शहरिया नौकरीपेशा भला क्या खाक़ समझेगा,जिसे पचास हजार रुपये महीने की पगार भी कम पड़ती है.एक बिल पास करने के लिए या कचहरी में पेशी की तारीख बढ़ाने के एवज में लोगों से हजार-पांच सौ ऐंठ लेने वाले बाबुओं,वकील-मुंशियों को ऐसी छोटी सी,बंधी-बंधायी आमदनी की अहमियत कतई समझ न आयेगी;न उस सुख-सुकून का अंदाजा ही हो सकेगा, जो हरिहर चौबे जैसे छोटे किसान को बाड़ी में गाड़े गये मोबाइल टॉवर के बदले में मिलने वाले ढाई हजार रुपये मासिक किराये से मिल रहा था. पास-पड़ोसियों को मन-ही-मन हरिहर से जलन भी हो रही थी,भले ही कोई ज़ाहिर नहीं करता.

हरिहर की पत्नी गौरी कई बरस पहले हैजे की बीमारी और समय पर ज़रूरी इलाज न होने से असमय उसका साथ छोड़ गई थी.ललनऔर ददन दो बेटे, बहुएं सत्या और अंजु.दोनों के एक-एक बेटा-बेटी हैं. पोते और पोती की तोतली बोली-बानी सुनता,उन्हीं से बतियाता हरिहर अपने को परम सुखी और सम्पन्न मानता है.......


दिन-दिन कर हफ्ते गुजरे,हफ्ते-हफ्ते करके माह,माह-माह कर साल गुजरे और साल-साल कर तीन साल,सहसा क्या हुआ कि वह मोबाइल कम्पनी किसी दूसरी कम्पनी वाले ने खरीद ली.मोबाइल टॉवर की मशीन एक दिन ट्रक में लदकर चली गई.ऑपरेटर भी अपना बोरिया-बिस्तर लपेट कहीं दूसरी जगह जा हिलगा.दो-तीन माह किराया मिला फिर वह भी मिलना भी बन्द हो गया. हरिहर और बेटे-बहुओं के हाथों के तोते उड़ गये. हरिहर की आमदनी का जरिया उजड़ गया. बड़का बेटा ददन तो मेहनती बैल सा सीधा लीक पर चलनेवाला मानुष था,दुनिया के तीन-पांच से परे,अपने खेत-बाड़ी और फसलों में रमनेवाला-दसवीं फेल. छुटका ललन ही कुछ चपल-चालाक मेट्रिक पास था,जिसका एक पांव कभी शहर में तो कभी गांव में होता. वही ले-देकर हाथ-पांव मारने लगा. ललन कम्पनी के कार्यालयों में फोन लगाता.शिकायत,आर्जू-मिन्नत करता और उधर से मिलते आश्वासनों में हिलगा इंतजार करता रहा कि कम्पनी से कोई आयेगा लेकिन आश्वासन पर आश्वासन, इंतजार और इंतजार करते दिन,हफ्ते,महीने बीतते गये और साल बीत गया.


दैत्याकार टॉवर देख-देख हरिहर और उसके परिवार का जितना ही जी जलता,गांववालों को उतना ही सुकून मिलता.पड़ोसी औरतें भी दोनों बहुओं को ताने मारतीं.वे मन मसोसकर रह जातीं.दोनों बहुयें अपनी-अपनी कोठरियों में जब आतीं, तोअपने-अपने पति ददन और ललन पर सारा गुस्सा उतारतीं. बीवियों से खिजियाये दोनों भाई बाहर निकल कम्पनीवालों की दइया-मइया करते और नाकाम विक्षोभ में धुंधुआते रह जाते. ददन को तो ज्यादा कुछ सूझता नहीं,वह जर्दा मलके मुंह में भकोस मौनी बाबा बन जाता.ललन फोन लगाकर इस उससे बतियाता. कुछ उपभोक्ता फोरम में शिकायत लगाने को कहते,कुछ वकील के जरिये कम्पनी पर दावा ठोंकने को हुलसाते. ललन शहर जाकर वकीलों और जानकारों से मिलता पर परिणाम वही ढाक के तीन पात. कुछ करने के लिए रूपये की जरुरत थी.....


हीचा-हारा हरिहर टॉवर के नीचे और आसपास की भूमि पर बैगन-टमाटर के पौधे गोड़ता रहता.अब इंतजार के सिवा चारा ही क्या था.
टॉवर उसके लिए गलफांस होकर रह गया था. बस एक ही भरोसा है,जो ललन देता रहता है कि लाखों रुपये की कीमत का टॉवर का स्टील अभी भी उनके कब्ज़े में है.महीनों की भाग-दौड़ और जाने किस-किस जानकार से ललन ने तौर-तरकीबें जान-समझ कर उस मोबाईल- कम्पनी के किसी क्षेत्रीय अधिकारी से आख़िरकार फोन पर टॉवर और बकाया किराये को लेकर बात की.अधिकारी ने आश्वासन दिया कि निकट भविष्य में इस मामले में कम्पनी कदम उठाने वाली है.जहाँ,जिसकी भी ज़मीन पर टॉवर खड़े हैं,वहां भूस्वामी का बकाया किराया चुकाकर ही टॉवर उखाड़े जायेंगे;मुमकिन है, कुछ जगहों के टॉवर फिर से चालू किये जायें. ...........इन दिनों ललन अपने बेटे और पत्नी अंजु के साथ शहर में ही जा टिका है.किराये की कोठरी में रहता और किसी रसूखदार राजनेता के निजी स्कूल में रात भर चौकीदारी करने लगा है.गांव में हरिहर,बड़का ददन,उसकी पत्नी सत्या और उनकी बिटिया ही रह गए हैं.....

हफ्ते-पखवाड़े में ललन गाँव का फेरा लगा, बाप और भाई को कुछ खर्चा दे जाता है.कमाई कुछ खास तो है नहीं उसकी.रात भर की चौकीदारी की पगार तीन हजार रुपल्ली,ऊपर से हजार रुपया महीना किराये की कोठरी. पड़ोसी किरायेदार यादव की बीवी घर पर ही औरतों की माला गूंथने का काम करती है. अंजु भी करने लगी.अभी हाथ नहीं सधा उसका पर पच्चीस-तीस रूपया रोज कमा ही लेती है.ललन दिन में सोता है लेकिन शाम को स्कूल के लिए जल्दी ही निकल लेता है.बच्चों की छुट्टी के बाद स्कूल के बरामदे-कमरों की झाड़-बुहारी के एवज में तीन सौ रूपये उसे अलग मिल जाते हैं. किसी तरह खींच-तान कर,जोड़-जुगाड़ और जाँगर पेरकर ललन और अंजु ने अपनी ज़िन्दगी को एक ढर्रा दे रखा है.


साल भर सब कुछ ठीक से चलने का हरिहर का भरम अचानक उस दिन टूट गया, जब ललन एक रविवार को गाँव आया. एकबारगी उसने घर-ज़मीन के बंटवारे की बात कर दी.ददन तो भोला-भला,जड़,भुच्च ठहरा; बाउर-सा भाई को देखता रह गया.भौजाई भी भौचक थी.ललन भैया के अचानक बदले तौर-तेवर उसकी सोच-समझ से परे थे. हरिहर को इसके पीछे छुटकी बहू अंजु की लगाई-बुझाई का अंदेशा हो रहा था. हैरान-परेशान रह गया हरिहर.....


उस दिन बंटवारे की चिंगारी-सी फेंककर ललन शहर लौट गया था.अधसूखे कंडे-सा धुँधुआता रहा हरिहर का तन,मन और ज़ेहन.एक हेक्टेयर से भी कम है पुश्तैनी ज़मीन,जिस पर काबिज़ है हरिहर. पुश्तैनी घर. बरसों पुरानी कच्ची दीवारों से बने खपरैल दो कमरे, आगे-पीछे परछी,एक परछी में ओट लगाकर रसोई बना ली है और पिछवाड़े की परछी में एक और कोठरी है; दोनों तरफ आँगन और यह बाड़ी. बाड़ी में दानवकाय टॉवर खड़ा है. उससे आगे ढलवान पर उसके पुश्तैनी खेत हैं-दो फसली........
पीछे की कोठरी में ललन और छुटकी अंजु बीच के पहले कमरे में ददन,बड़की सत्या और बिटिया के साथ रहता है;दूसरे में अन्न की दो कुठलियां,एक कोठार कुछ मटके-मटकियां.कुल इत्ती-सी गृहस्थी बना-संवार के छोड़ गई है गौरी-ददन की महतारी.


यह ललन तब पहली कक्षा में पढ़ने जाने लगा था.उसी साल पड़ा था हैजा इलाके भर के बीसों गांव-गंवइयों में.जिसकी चपेट में आई गौरी, कै-दस्त के चलते दम तोड़ गई थी...... सामने की गली से घर में घुसते ही छींद की टटियों से छायी गौशाला है,जहाँ कभी बैल,गाय,बछड़े-बछिया बंधते थे.वहां अब एक बूढी मरणासन्न गाय है .अब तो गांव में गिनती के चार-पांच खेतिहर बचे हैं, जो हल-बैल चला रहे हैं.खेती का जरिया अब ट्रैक्टर ही है,जिसे सबने मन-बेमन से अपना लिया है.......पीछे की परछी में पुराने हचर-मचर करते तख्त पर हरिहर का सोना-खाना होता है.....अब इसमें क्या- कितना,कैसे बाँटेगा वह.गहना-गुरिया,माल-असबाब?
बाँटने को है ही क्या? मानो किसी अपने की मौत की खबर मिली हो.बड़की बहू,ददनऔर हरिहर बैठे हैं अवाक्. सोच रहा है हरिहर.' मैं किस बेटे के हिस्से जाऊँ?'एक इस सवाल ने कई-कितने और कैसे-कैसे सवालों के मुँह खोल दिए हैं....इस बाउर ददन को देह पेरने के सिवाय कुछ नहीं आता. इसकी दुलहिन भी अक्षर ज्ञान के बूते ऐंड़े-बेंड़े दस्तख़त करने और चूल्हे-चौके से आगे उपवास-व्रत,आरती-पूजा करने तक महदूद है.देवर ललन और छुटकी से बड़ा भरोसेमंद उसका कोई नहीं.भतीजी को कितना चाहता है ललन.शहर से जब भी आता है, कोई खिलौना-फ्राक,मोज़े,कंटोपा फल-बिस्कुट लाना नहीं भूलता.दोनों बहुओं का निकहा नेह-मनजोड़ है;ददन को दादा -दादा करती छुटकी अंजु ने ही तो कहीं ये अलगाव का ज़हर-बीज ललन की सोच-समझ में न रोप दिया हो? अभी साल भर भी रही नहीं शहर में और चरित्तर दिखाने लगी. कब-कैसे,कहाँ-किससे पढ़-सीख लिया फूट का पाठ अंजु ने?.....परन्तु मुख्य सवाल तो अब भी मानो लट्ठ ठोंकता मुकाबिल खड़ा है. जिस तौर-तेवर में ललन कह-जता गया है,उससे तो साफ लगता है कि बंटवारा करवा कर ही मानेगा.......गांव वालों को हरिहर चौबे के घर-परिवार की यह टूट-फूट कई दिनों के बाद तब समझ में आई,जब उनके बंटवारे में एक पेंच फंस गया.......!

उम्मीद से परे बंटवारे के दिन हरिहर चौबे के बहनोई जगतराम तिवारी आ धमके. ललन के हाथों के तोते उड़ गये.वह हैरान-परेशान कभी अंजु को देखता,कभी बाप हरिहर को.अपने इस फूफा के कारनामों से ललन खूब वाकिफ़ है.प्रपंचीऔर तिकड़मी तो हैं ही महाराज,उससे भी चार पाँव बढ़कर चुगलखोर,फेंकू और राई पर सारस बैठा देने वाले. मुफ़्त की सलाह देने और किसी के भी फटे में पांव घुसेड़ने वाले इन जगतराम फूफा की दखलंदाजी से जात क्या परजात भी नहीं छूटा.


ज़मीन,जानवर,मकान की दलाली से लेकर चुनाव, सियासत,पुलिस,कोर्ट-कचहरी,गवाही,व्याह-बारात,बारहों-मुंडन,दशगात्र-तेरहवीं,झगड़ा-समझौता,बिक्री-बंटवारा,रैली-उद्घाटन,कथा-भागवत,तीर्थ-उद्यापन आदि दुनिया के तमाम क्रिया-कलापों में इनकी मौजूदगी से हर कोई वाकिफ़ है.जबरिया ठसियल!पधार गये आखिरकार यहाँ भी........ बुआ को परलोक सिधारे बरसों हो गये लेकिन रिश्ता कभी- कहीं मरता है मरनेवाले के साथ.सो साल में एक-दो फेरा तो लगा ही लेते हैं महाराज.......
ज़मीन-मकान आधे-आधे बाँटने का दोनों भाइयों का आपसी फैसला तो रात को ब्यालू के बाद हो गया था. लेकिन कहाँ-कैसे बँटे हरिहर! तो उसकी मर्जी, चाहे जिसके साथ रहें,जैसा चाहें वैसा रहें. उसका कौन सा भारी खर्चा है.सादा भोजन,देशी पहनावा-दो धोती,दो
कुरता,गमछा,पनही और सूख चून-तम्बाखू;...........


लेकिन फूफा जगतराम तिवारी जो ठहरे. अपने साले हरिहर चौबे के परम पूज्य बहनोई,अग्रगण्य हितुआ नात! चाय,चून-तम्बाखू के बाद हरिहर को बहला कर जाने किस गली के किस घर में जा हिलगे और घड़ी भर बाद लौटे. बस इसी बीच पेंच फंसा दी. जाने कब हरिहर के कान भर दिये.....


पांसा पलट चुका था.कहाँ तो रात में घर-ज़मीन आधा-आधा बाँट देने का मन बना चुके थे हरिहर और अब जो कुछ ललन सुन -समझ रहा है,विश्वास ही नहीं कर पा रहा. कैसी पट्टी पढ़ा दी फूफा ने! ये क्या कह रहे हैं दद्दा? तीन हिस्से होंगे ज़मीन -घर के.तीसरा हिस्सा हरिहर का,जो उनकी सेवा करेगा,भोजन-वसन,दवा-इलाज करेगा,वही हक़दार होगा....................ललन ने सुना,उसकी मेहरारू अंजु ने सुना;ददन,उसकी मेहरारू सत्या के साथ आस-पड़ोस के बिरादरी और परजनों ने सुना और हरिहर के पक्ष में बिना मांगे सहमति-समर्थन भी दे दिया. सही-सही बंटवारे का यश लूट लिया जगतराम ने. ..
अब पेंच फंसा देख एक ही चारा था; एक बटा तीन हिस्सा लेकर आगे सोचें-समझें कि बाप की सेवा कर सकेंगे या नहीं. ललन की पत्नी छुटकी बहू अंजु ने दो टूक मना कर दिया लेकिन दबी आवाज़ में ललन के कान में मन्त्र फूंकने से चूकी भी नहीं. टॉवर वाले हिस्से को लेकर उसने समझाईश दी."तुम तो टॉवर वाला हिस्सा लेने से मना ही करना.जब दद्दा और जेठ जी जबरन कहें, तो बेमन से लेने का दिखावा कर,थोड़ी ना-नुकुर के बाद मान लेना.वैसे भी नामनी तो तुम्ही हो.पर हाँ,पहले ही लार न टपकाने लगना,नहीं तो फूफाजी भाँपकर दद्दाजी को लेने को उकसायेंगे.बाद में वही दौड़-धूप कर सारा रुपया गड़प लेंगे.दद्दाके पांव पूजे बहनोई जो ठहरे. समझ गये न! जरा ध्यान से,संभल के..."


.......  किन्तु अंजु के मन की मुराद पूरी न हुई. जब ललन ने गलफाँस बन चुके उस टॉवर वाले हिस्से को लेने से सख्ती से मना किया, तो जगतराम का माथा ठनका. लगा की टॉवर के लफड़े में दौड़-धूप,कोर्ट-कचहरी की चक्करबाजी और खर्च को भांपकर इस बला को ललन अपने सर डालने से बच कर, ददन को फंसाना चाहता है.यह मौका जगतराम ने तत्काल लपक लिया.टॉवर का हिस्सा ददन के गले डाल दिया और उसे बाप के साथ कर दिया. अब सारी दौड़-भाग करने को हरिहर और ददन के लिये उनके सगे- हितुआ जगतराम ही रह गये.
बंटवारा हो गया.ललन मन मसोसकर रह गया.ददन और सत्या ने हरिहर के साथ रहने को अपना सौभाग्य माना. हरिहर कमोबेश खुश ही था.टॉवर का मसला सुलझाने को अब ललन न सही,बहनोई जगतराम तो थे.अपने हिस्से की कोठरी में ताला डाल ललन और अंजु शहर निकल गयेबोर अपनी खेती एक भूमिहीन को बंटाई पर हिलगा दी.कई माह गुजरे जगतराम को दांव-पेंच आजमाते या मामला निबटाने का दिखावा करते लेकिन टॉवर का मामला अभी भी नहीं सुलझा.

ललन की पत्नी अंजु अपने आप को कोसती और पछताती रहती है. जिस दिन भी यह टॉवर उखाड़ने कम्पनी वाले आयेंगे लाखों के वारे-न्यारे होंगे. सारा रुपया ससुरजी जेठ और जेठानी सत्या को सौंप देंगे.उधर हरिहर अपने सीधे-सादे,मेहनती बेटे ददन के परिवार के साथ बहुत सुखी हैं. टॉवर आज भी है पर वह हरिहर से ज्यादा अब बहनोई जगतराम की गलफाँस है.उसे बहनोई पर पूरा भरोसा है.लेकिन हरिहर की सोच कितनी गलत थी. टॉवर का प्रेत उसे अभी और पेरनेवाला था.काँस के फूलों-सी खुशियाँ माहबड़ो माह ही टिकीं........


एक दिन किसी वकील को साथ ले बहनोई जगतराम गांव-घर आ पहुंचे.किसी अर्जी पर उनके नाम की चिड़िया उनसे बिठवाई और कम्पनीवालों पर केस दायर करके,ब्याजसहित बाकी किराया और पैदावार की नुकसान की भरपाई वसूलने का भरोसा देकर कुछ रुपया खर्च के नाम पर ले गए. अब रुपया तो पास में था नहीं; ब्याज पर गांव के महाजन से उठाना पड़ा. .......
माह-पखवाड़े में जगतराम इसी तरह आता, जल्दी ही मामले का फैसला अपने पक्ष में होने का पुरजोर भरोसा थमाकर,वकील की फ़ीस के नाम पर रुपया ले जाता. बहनोई जो ठहरा.हरिहर गाँव के महाजन से रुपया उठा लाते सूद पर और बहनोई जगतराम को दे देते.यह सिलसिला जो चल पड़ा तो खिंचता ही चला गया. महाजन भी आश्वस्त था कि देर से सही पर रुपया मिल ही जायेगा. वह बेउज्र क़र्ज़ दे रहा था.कई हजार के कर्ज़दार हो चुके हरिहर ने अपने हिस्से की ज़मीन महाजन को गिरवी रख दी थी.जगतराम के आश्वासन और टालमटोल की डोर बढ़ती ही गयी.साल बीत गया.


पछतावे और दुश्चिंता से घिरा-भरा हरिहर भला अब ललन से भी अपना दुखड़ा किस मुंह से रोता. बंटवारे के बाद ललन एक बार ही आया था गांव. घर की और झांकना भी उसे नागवार गुजरा था. बंटाई दार के साथ खलिहान गया, वहीँ से आनाज उठवाया और सीधे शहर ले गया था. बाप,भाई-भौजाई,भतीजी किसी की भी खोज-खबर लेना अपनी मुसीबत को खुद नेवता देना था.
ललन के इस परायेपन और रूखे व्यवहार ने हरिहर को अंतस तक पीर पहुंचाई. बेबसी और मनघुन्नस का जैसे रोग ही लग गया वह बीमार रहने लगा.रूखा-सूखा जो जबरन पेट में डालता भी तो शरीर को लगता ही न था.व्यथित,असहाय मन और हर घड़ी घुटता ज़ेहन ! घुनलगे बाँस सा भीतर से खोखला होता निरीह हरिहर. .........


बरसात से पहले ललन जब घर आया, तो बाप की दुर्दशा देख कलेजा मुंह को आ लगा! बादल सा फट पड़ा उसका अंतस;धाराधार बह गया मन का सारा रोष-कलुष. बाप की जर्जर छाती से आ लगा ललन खूब हिलक-हिलक रोया............सत्या भौजी ने फूफा की तमाम करतूतेँ कह-सुनाईं .ललन चोट खाये सांप-सा फ़ुफ़कारने लगा.कहाँ तो वह अपने हिस्से की ज़मीन बंटाई में देने गांव आया था,यहाँ बाप और भाई के हिस्से के खेत भी इस साल ब्याज पर बोने की चेतावनी दे रखी थी साहूकार ने.  ....


ललन को निजी स्कूल की चौकीदारी में लम्बी छुट्टी मिलती ही कहाँ है! इसीलिये वह अंजु को मायके छोड़ता हुआ गांव आया था.अब जो उसका अंतस क्रोध की आग में सुलग रहा है तो उसे समझाता, रोकता-टोंकता कौन?.....क्रोधाग्नि में दहकता अंतस लिये ललन ब्यालू कर कोठरी में सोने चला गया था................कोठरी में खाट पर पड़ा ललन आत्मग्लानि में गल रहा है.'बाप की इस दुर्गति का असल दोषी वही है. यदि टॉवर के मामले का सारा सच वह बाप और भाई-भौजाई से न छुपा रखता,तो फूफा को घर में घरदारी करने का मौका ही न मिलता'.दुनिया के दन्द- फन्द,पुलिस,कानून,कोर्ट-कचहरी तो क्या,कभी मण्डी-आढ़त,बाजार के झमेले में भी नहीं पड़ा था हरिहर. ललन ने जब से होश सम्भाला,महतारी को ही मर्द की तरह हाट-बाजार,खरीद-फरोख्त करते और गृहस्थी के काम मुस्तैदी से करते देखा था.  .....................

दरअसल लालच ने अपनी गिरफ्त में ललन को कुछ इस तरह लिया कि उसका सारा अपनापा कुंद पड़ गया.कुछ शहर में रहने-बसने की अंजु की ललक,कुछ उसके भीतर की आशंका की नागफनी को सींचने और खाद देकर पनपाने में लगी उसकी कुचेष्टाओं का दुष्फल........


ललन को अक्सर लगता कि भाई ददन के सीधेपन के चलते हरिहर का नेह-मोह उनसे ज्यादा ही रहता है.टॉवर का रुपया यदि मिला तो मुमकिन है,भाई ददन को ही बाप सारा रुपया सौंप दे.अभी भले ही सही जानकारी उसने छुपा रखी है सबसे.सच्चाई ये है कि टॉवर-कंपनी के एरिया मैनेजर से उसकी लम्बी बात हुई.और बात क्या बहस हुई गर्मागर्म. ललन ने उसे धमकी दे डाली थी कि यदि हमारा तयशुदा मासिक किराया जो-जितना बकाया है,कम्पनी नहीं चुकाती, तो एक नोटिस देकर वह टॉवर में लगा स्टील बेच देगा............ मैनेजर छोटी-सी रकम देकर मामला सुलटाने के लिये ललन को लालच दे रहा था क्योंकि ललन नामनी था.बीस साल के करारनामे के अनुसार लाखों रूपये चुकाने के बाद ही टॉवर हटाया जा सकता था..................' यदि ये तमाम बातें हरिहर को ललन पहले ही बता देता तो वह अपने बहनोई जगतराम को हितुआ मानकर इस मामले में उससे मदद लेता ही क्यों?इस कर्ज़-ब्याज की गुंजलक में घिरता-फंसता ही क्यों? हरिहर के सीधेपन और ललन की बाप से नाराज़गी का खूब नाजायज फायदा उठाया है फूफा जगतराम ने; सीधे ओर भोले बाप को कोर्ट-केस कचहरी-वकील की फ़ीस के खर्चे के नाम पर फांसकर उसे गांव के सेठ का कर्ज़दार बना दिया है '.............


कोठरी में पड़े ललन का दिल-दिमाग फूफा की बदमाशी पर विक्षुब्ध हो रहा है. बाप हरिहर,ददन भाई और सत्या भौजाई के सोने की बेसब्र प्रतीक्षा करता वह अलाव से कौंझियाने-ऊँघने लगा है......
                    '....................रात गहराते ललन चुपचाप उठा और बाड़ी के रास्ते घर-गाँव से निकल सड़क पर आ गया.उसने देखा एकादशी का चन्द्रमा पश्चिम के आकाश में अधलटका है. उसके पैरों को मानो पंख लग गये हैं. जगतराम फूफा के गांव का वह दस किलोमीटर का फासला उसने घण्टे भर में ही पांवोंपाँव नाप ली और फूफा के गाँव जा पहुंचा. समूचे गांव पर मानो नींद का जादू सा छाया जान पड़ा. शातिर चोर की सी सावधानी से वह फूफा के घर में दाखिल हो गया. उसे पता है कि फूफा अपने घर के बाहरी बरामदे की परछी में बनी कोठरी में ही सोता है.ललन ने खिड़की में मुंह धँसाकर आवाज़ दी,"फूफाजी,किवाड़ खोल्या!हम हैं ललन!" कई बार आवाज़ दी,तब जाकर वह कुनमनाया," यतनी रात कउन हई हो.....?"


ललन को इतनी रात में दबी आवाज़ में दरवाजा खोलने को कहते देख हैरान रह गया जगतराम. उठ कर शंकित मन से आने का कारण पूछा.ट्रेन से उतरकर पैदल आने का बहाना बता ललन ने किवाड़ खुलवाये और फूफा से बतियाने लगा. इधर-उधर की बातों के बाद ललन जब टॉवर के मुद्दे पर आया तो जगतराम से पीला तो कहासुनी कायदे से हुई लेकिन जगतराम के उल्टे-पुल्टे जवाबों से कुछ ज्यादा ही बढ़ गई.फूफा जगतराम ने उठकर ललन को जब लात मारकर,ललन को माँ की गाली दी और घर से निकालने को धकियाने लगा,तब अड़ गया ललन; .....बतबढ़ में जगतराम ओर ज़्यादा गाली-गलौज पर आ उतरा,तो ललन से लपटा-लपटी होने लगी. ललन का क्रोध जगतराम के छल पर भारी पड़ा.क्रोधावेश में ललन ने जगतराम को पीछे धकेल दिया.वह उतान गिरा पलंग पर,पुराना जर्जर पलंग टूट गया.सहसा जगतराम उठा और खपरैल में खोंस-छुपाकर रखी दराँती खींच ली और पूरी ताक़त से ललन की गर्दन पर प्रहार किया. फूफा को दराँती निकालते देख सावधान हो चुका था ललन;वह दो पग पीछे हटा,बाजू से हवा में खाली घूमा और बाजू में आ चुके जगतराम के हाथ को उल्टा पकड़,पीछे को धर मरोड़ा और जगतराम को दीवार पर दे दबोचा.फिर ललन ने लात-घूंसों की जो दनादन बौछार की,तो जगतराम लस्त-पस्त पड़ बेसुध हो गया.उसके नथुनों और मुंह से बहते खून को देख ललन पल भर घबराया ,फिर समझ से काम लिया.दराँती उठाई और वहाँ से भाग निकला.


इसी दौरान गाली-गलौज करते बाप जगतराम की आवाज़ सुन जाग चुके उसके बेटा और बहू जगतराम की कोठरी की ओर दौड़े......जगतराम को अधमरा छोड़ ललन वहां से फरार हो गया. उसने सोचा,पुलिस को आने में घण्टों लगें भले पर आएगी जरूर.कहाँ जाऊँ? मेरे गांव,ससुराल या शहर के कमरे में सबसे पहले ही पकड़ने जायेगी;इन जगहों पर पकड़ा जाना निश्चित है. पुलिस की सोच से जुदा सोचकर,वह विपरीत दिशा में सड़क छोड़ खेतों की मेड़ों के रास्ते निकट के रेलवे-स्टेशन कीऒर चल पड़ा.उसने देखा,अब तक चन्द्रमा भी आकाश से गायब हो गया है..........

इधर पुलिस ललन की खोज में जब सम्भावित जगहों पर उसे नहीं पकड़ पाई तो हरिहर,ददन और उसकी पत्नी सत्या को हवालात में डालकर पूछने लगी.बाप -बेटे की खूब पिटाई हुई पर वे बताते क्या?उन्हें कुछ मालूम ही नहीं था.तब ललन की पत्नी और उसके मायकेवालों की भी पुलिसवालों ने खबर ली.वे पहले ही चेत गये थे.उनके एक रिश्तेदार कुछ अँकड़-पकड़,पहुँच-पहचान वाले थे. पहले ही कोर्ट से जमानत करा ली.
अगले दिन जमानत पर हरिहर और ददन और सत्या को भी छूट कर गाँव-घर आ गये.हरिहर ददन और सत्या की जमानत उन्हीं सेठजी ने ली,जो पहले ही हजारों रुपये क़र्ज़ दे चुके थे. हरिहर के हिस्से की ज़मीन पर उनकी गिद्ध दृष्टि पहले से थी.हरिहर ने उसी सेठ को ज़मीन बेचकर पिछला और अभी के कोर्ट,थाना-पुलिस का सारा खर्च पटा देने का ज़ुबानी करार गाँव के रसूखदार पाँच पन्चों के सामने कर लिया है.........
महीना बीत रहा है,अब भी पुलिस ललन की तलाश ही रही है...... जगतराम को उसका बेटा अस्पताल से अब अपने गांव-घर ले आया है लेकिन वह बिस्तर पर पड़ा हर पल होती असह्य पीड़ा के साथ ललन को याद कर जब-तब सिहर- सिहर उठता है............


इधर एक माह और बीता.कृष्ण-जन्माष्टमी की सुबह ललन ने देखा, टॉवर से अपनी धोती बांध,उसका फन्दा गले में डाल हरिहर ने आत्महत्या कर ली है.टॉवर से झूलते बाप के लटकते पांवों से लिपट ललन रो रहा है, बस रोये जा रहा है...............'कोठरी में बिस्तर पर सो रहा ललन गहरी सपनीली नींद में रो रहा है;रो रहा है...... बस रोये ही जा रहा है !........."का होइ गवा रे ललन; अइसन काहे रोये जा रहा हय ?" ललन को झकझोर-झकझोर कर जगाते हुये हरिहर ने एकबारगी रुआँसे कंठस्वर में कहा. "....." लागत हय तु कौनो डरावन सपन देख्या का हो ललन?" सत्या भौजाई ने ललन के सर पर हाथ फेरा और पूछा.ददन बाउर सा खड़ा भौचक देख रहा है. ललन ने उस भयावह सपनीली नींद से बाहर आकर जब सामने बाप को देखा, तो उससे लिपट गया और जोर-जोर से रोने लगा.हरिहर भी उसे अपने बाहुपाश में भर-भींच लिया है.........
                    ******************


आत्मपरिचय-


देवेन्द्र कुमार पाठक म.प्र. में कटनी जिले के दक्षिणी-पूर्वी सीमांत पर,छोटी- महानदी ग्राम्यांचल के एक गांव भुड़सा(कटनी) में जन्म.शिक्षा-M.A.B.T.C.  अब शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश से सेवानिवृत्त.दस साल तक कमोबेश अवरुद्ध रहा लेखन, पिछले साल से लेखन में पुनः सक्रिय.कमोबेश हर विधा में लेखन-प्रकाशन;'महरूम' तखल्लुस से गज़लें कहीं...................
प्रकाशित किताबें-
                                     2 उपन्यास, ( विधर्मी/अदना सा आदमी ) 4 कहानी संग्रह,( मुहिम/मरी खाल : आखिरी ताल/धरम धरे को दण्ड/चनसुरिया का सुख ) दिल का मामला है,कुत्ताघसीटी ;( व्यंग्य संग्रह ) दुनिया नहीं अँधेरी होगी; (गीत-नवगीत संग्रह) ओढ़ने को आस्मां है;(ग़ज़ल संग्रह ) सात आंचलिक नवगीतकारों के संग्रह 'केंद्र में नवगीत' और 'आँच' लघुपत्रिका के कुछ अंकों का नवगीतकार मित्रों के सहयोग से संपादन. वर्षों तक मंचों से कविताई की शुरुआती भूलें भी कर लीं.....                                                                                       

    'हंस', वागर्थ', 'नया ज्ञानोदय','मनस्वी', 'अक्षरपर्व','चकल्लस','नया ज्ञानोदय', 'अन्यथा', ,'वीणा',आजकल','दिशा','नई गुदगुदी','वैचारिकी', 'कथन','कहानीकार','आज','अवकाश','उन्नयन','कदम', 'नवनीत', 'अवकाश' ', 'शिखर वार्ता', 'हंस','राष्ट्रदूत', 'भास्कर','बालहंस'आदि पत्र-पत्रिकाओं और 'रचनाकार',  v.             'साहित्यम्' आदि बेव पत्रिकाओं में रचनायें. प्रकाशित.आकाशवाणी,दूरदर्शन से प्रसारित.
'दुष्यंतकुमार पुरस्कार','पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पुरस्कार' आदि कुछ पुरस्कार भी जाने कैसे हाथ लगे.!...
अब बेव पत्रिकाओं पर जब-तब हाज़िरी हाज़िरी दे लेते हैं.


सम्पर्क-
1315, साईंपुरम कॉलोनी, रोशननगर;साइंस कॉलेज डाकघर-कटनी;जिला-कटनी.483501;म.प्र.

Email  (devendrakpathak.dp@gmail.com

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रचनाकार: कहानी - गलफाँस - देवेन्द्र कुमार पाठक
कहानी - गलफाँस - देवेन्द्र कुमार पाठक
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