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हास्य कविताएँ

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हास्य कविताएं

-अरुण मित्तल ‘अद्‌भुत’

कैसे कैसे उत्पाद

एक जगह बहुत भीड़ लगी थी

एक आदमी चिल्ला रहा था

कुछ बेचा जा रहा था

आवाज कुछ इस तरह आई

शरीर में स्फुर्ति न होने से परेशान हो भाई

थकान से टूटता है बदन

काम करने में नहीं लगता है मन

खुद से ही झुंझलाए हो

या किसी से लड़कर आए हो

तो हमारे पास है ये दवा

सभी परेशानियां कर देती है हवा

मैंने भीड़ को हटाया

सही जगह पर आया

मैंने कहा इतनी कीमती चीज

कहीं मंहगी तो नहीं है

वो बोला आपने भी ये क्या बात कही है

इतने सारे गुण सिर्फ दो रुपए में लीजिए

भाई साब दिलदार बीड़ी पीजिए

 

फुटकर हास्य कविताएँ -

1

पिताजी ने बेटे को बुलाया पास में बिठाया,

बोले आज राज की मैं बात ये बताऊंगा।

शादी तो है बरबादी मत करवाना बेटे,

तुमको किसी तरह मैं शादी से बचाऊंगा।

बेटा मुस्कुराया बोला ठीक फरमाया डैड,

मौका मिल गया तो मैं भी फर्ज ये निभाऊंगा।

शादी मत करवाना तुम कभी जिन्दगी में,

मैं भी अपने बच्चों को यही समझाऊंगा।

2

एक नए अखबार वाले सर्वे कर रहे थे

मैंने कहा मैं भी खूब अखबार लेता हूं

जागरण, भास्कर, केसरी ओ हरिभूमि

हिन्दी हो या अंगरेजी सबका सच्चा क्रेता हूं

पत्रकार बोला इतनों को कैसे पढ़ते हैं

मैंने कहा ये भी बात साफ कर देता हूं

पढ़ने का तो कोइ भी प्रश्न ही नहीं है साब

मैं कबाड़ी हूं पुराने तोलकर लेता हूं

3

एक हास्य कवि जी के पास एक नेता आया

बोला हॅंसाने की कला हमें भी सिखाइए

कवि ने कहा कि योगासन है अलग मेरा

सुबह सुबह चार घंटे आप भी लगाइए

बुद्धि तीव्र हो जाएगी नाचने लगेगा मन

सीख लीजिए ना व्यर्थ समय गवांइए

नेताजी ने कहा कविराज बतलाओ योग

कवि बोला यहां आके मुर्गा बन जाइए

4

जीवन का किसी क्षण कोई भी भरोसा नहीं

जोखिम ना आप यूं अकेले ही उठाइए

सबसे सही है राह फैलाए खड़ी है बांह

बीमा कम्पनी को इस जाल में फंसाइए

पति पत्नी से बोला फायदे का सौदा है ये

प्रिय आप भी जीवन बीमा करवाइए

पत्नी बोली करवा रखा है आपने जनाब

उससे कोई फायदा हुआ हो ता बताइए

 

डर नहीं लगता

उस रात मैं बहुत डर रहा था

क्योंकि मैं एक कब्रिस्तान के पास से गुजर रहा था

एक तो मौसम बदहाल था

और दूसरा गर्मी से मेरा बुरा हाल था

अचानक मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं

जब मेरी नजरें कब्र पर बैठे एक आदमी पर चढं गईं

मैंने कहा इतनी रात को यहां से कोई

भूलकर भी नहीं फटकता

यार तू कब्र पर बैठा है

तुझे डर नहीं लगता

मेरी बात सुनते ही वो ऐंठ गया

बोला इसमें डरने की क्या बात है

कब्र में गरमी लग रही थी,

इसलिए बाहर आके बैठ गया

 

 

टुकड़े टुकड़े हास्य

1

कमबख्त

गम जुदाई सब साथ कर गया

अच्छे अच्छों को माफ कर गया

मैंने सोचा दिल पर रख रहा है हाथ

कमबख्त जेब साफ कर गया

2

विशेष छूट

हेयर ड्रेसर ने, विशेष छूट के शब्द, इस तरह बताए

बाल काले करवाने पर, मुंह फ्री काला करवाएं

दोहे

पढ़कर सुनकर देखकर निकला यह निष्कर्ष

योद्धा बन लड़ते रहो जीवन है संघर्ष

 

जग में सबके पास है अपना अपना स्वार्थ

केवल तेरा कर्म है मानव तेरे हाथ

 

कर्मक्षेत्र में जो डटे लिया लक्ष्य को साध

वही चखेंगे एक दिन मधुर जीत का स्वाद

 

रखती है प्रकृति सदा परिवर्तन से मेल

शूरवीर नित ढूंढते सदा नया इक खेल

 

मौन हुआ वातावरण मांग रहा हूंकार

वक्त पुकारे आज फिर हो जाओ तैयार

 

जागो आगे बढ़ चलो करो शक्ति संधान

केवल दृढ़ संकल्प से संभव नवनिर्माण

 

कुछ तो ऐसा कर चलो जिस पर हो अभिमान

इस दुनिया की भीड़ में बने अलग पहचान

----------------------------

 

कविता खुशबू का झोंका

कविता खुशबू का झोंका, कविता है रिमझिम सावन

कविता है प्रेम की खुशबू, कविता है रण में गर्जन

 

कविता श्वासों की गति है, कविता है दिल की धड़कन

हॅंसना रोना मुस्काना, कवितामय सबका जीवन

 

कविता प्रेयसी से मिलन है, कविता अधरों पर चुंबन

कविता महकाती सबको, कविता से सुरभित यह मन

 

कभी मेल कराती सबसे, कभी करवाती है अनबन

कण कण में बसती कविता, कवितामय सबका जीवन

 

कविता सूर के पद हैं, कविता तुलसी की माला

कविता है झूमती गाती, कवि बच्चन की मधुशाला

 

कहीं गिरधर की कुंडलियां, कहीं है दिनकर का तर्जन

गालिब और मीर बिहारी, कवितामय सबका जीवन

 

कविता है कभी हॅंसी तो, कभी दर्द है कभी चुभन है

बन शंखनाद जन मन में, ला देती परिवर्तन है

 

हैं रूप अनेकों इसके, अदभुत कविता का चिंतन

मानव समाज का दर्शन, कवितामय सबका जीवन

 

 

ये है पर्यावरण हमारा, इसकी रक्षा सबका धर्म

 

ये है पर्यावरण हमारा, इसकी रक्षा सबका धर्म

इसमें प्राण बसे हैं सबके, करले मानव यह शुभ कर्म

 

खेतों से हरियाली खो गई, उजडे जगल सारे

देख धरा की ऐसी हालत, रोते चांद सितारे

 

मारे वन्य जानवर सारे, कुछ तो कर मानव तू शर्म

ये है पर्यावरण हमारा, इसकी रक्षा सबका धर्म

 

प्राण बसे हैं मानव तेरे, शुद्ध हवा में जल में

जीने की सुध सीखी, तूने कुदरत के आंचल में

 

पल में वरना बनते खाक, ये तेरे हाड मांस और चर्म

ये है पर्यावरण हमारा, इसकी रक्षा सबका धर्म

 

अगर प्रदूषण यूं फैलेगा, हम सब होंगे रोगी

त्यागो अपनी नादानी को, बनो न इतने भोगी

 

योगी होकर पुण्य कमाओ, समझो ये कुदरत का मर्म

ये है पर्यावरण हमारा, इसकी रक्षा सबका धर्म

 

 

कब तक नारी यूं दहेज की बली चढाई जाएगी

 

कब तक यूं खूनी दलदल में, धंसा रहेगा मनुज समाज

कब तक औरत को रौंदेगा, ये दहेज का कुटिल रिवाज

 

कब तक इस समाज में अंधी, रीत चलाई जाएगी

कब तक नारी यूं दहेज की, बली चढाई जाएगी

 

नारी पूजा, नारी करुणा, नारी ममता, नारी ज्ञान

नारी आदर्शों का बंधन, नारी रूप रंग रस खान

 

नारी ही आभा समाज की, नारी ही युग का अभिमान

वर्षों से वर्णित ग्रंथों में, नारी की महिमा का गान

 

नारी ने ही प्यार लुटाया, दिया सभी को नूतन ज्ञान

लेकिन इस दानव दहेज ने, छीना नारी का सम्मान

 

उसके मीठे सपनों पर ही, हर पल हुआ तुषारापात

आदर्षों पर चलती अबला, झेले कदम कदम आघात

 

चीखें उठती उठकर घुटती, उनका क्रंदन होता मौन

मूक बना है मानव, नारी का अस्तित्व बचाए कौन

 

कब तक वो यूं अबला बनकर, चीखेगी चिल्लाएगी

कब तक नारी यूं दहेज की, बली चढ़ाई जाएगी

 

इस समाज में अब लडकी का, बोझ हुआ देखो जीवन

नहीं जन्म पर खुशी मनाते, होता नहीं मृत्यु का गम

 

एक रीति यदि हो कुरीति, तो सब फैलें फिर अपने आप

इस दहेज से ही जन्मा है, आज भ्रूण हत्या सा पाप

 

वो घर आंगन को महकाती, रचती सपनों का संसार

पर निष्ठुर समाज नें उसको, दिया जन्म से पहले मार

 

कोई पूछो उनसे जाकर, कैसे वंश चलाएंगे

जब लडकी ही नहीं रहेंगी, बहू कहां से लाएंगे

 

लडकों पर बरसी हैं खुशियां, लडकी पर क्यूं हुआ विलाप

प्रेम और करुणा की मूरत, बन बैठी देखो अभिशाप

 

कब तक उसके अरमानों की, चिता जलाई जाएगी

कब तक नारी यूं दहेज की, बली चढाई जाएगी

 

इस दहेज के दावनल में, झुलसे हैं कितने श्रृंगार

कितनी लाशें दफन हुई हैं, कितने उजड़े हैं संसार

 

स्वार्थों के खूनी दलदल हैं, नैतिकता भी लाशा बनी

पीड़ित शोषित और सिसकती, नारी टूटी स्वास बनी

 

धन लोलुपता सुरसा मुख सी, बढती ही जाती प्रतिक्षण

ये सचमुच ही है समाज के, आदर्षों का चीरहरण

 

खुलेआम लेना दहेज, ये चलन हुआ व्यापारों सा

अब विवाह का पावन मंडप, लगता है बाजारों सा

 

इस समाज का यह झूठा, वि”वास बदलना ही होगा

हम सब को आगे आकर, इतिहास बदलना ही होगा

 

कब तक अदभुत यह कुरीती, मानवता को तडपाएगी

कब तक नारी यूं दहेज की बली चढ़ाई जाएगी

******

 

 

जो सपनों को तोड़ चुके हैं -----

 

हम रो रोकर लिखते हैं वो यूं हंसकर पढ़ जाते हैं

जो सपनों को तोड़ चुके हैं वो सपनों में आते है

 

आंसूं बरसाती आंखों ने टूटे ख्वाबों को ढोया

वादों की यादों में पड़कर जाने मन कितना रोया

 

अब धीरे धीरे ग़ज़लों से जख्मों को सहलाते हैं

तड़पाया है हमें जगत ने उलझे हुए सवालों से

 

फिर भी मन को हटा न पाया उनके मधुर खयालों से

तन्हाई में ही जीना है ये दिल को समझाते हैं

 

दर्दों गम की दीवारों में जब से कैद हुए हैं हम

सांसों में अहसास नहीं है बीते कोई भी मौसम

अब समझा हूं लोग इश्क में क्यों पागल हो जाते हैं

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arun mittal

रचनाकार संपर्क:

अरुण मित्तल ‘अद्भुत’`

(एमबीए, एमफ़िल, पीएच डी (शोधार्थी), लेक्चरर, बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉज़ी)

हरियाणा टिम्बर स्टोर

काठ मण्डी, चरखी दादरी

भिवानी ; हरियाणा

दूरभाष- ०१२५०-२२१४८०

भ्रमणभाष- 09818057205

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रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

बहुत ही बढ़िया, जो सपनों को तोड़ चुके हैं ----- दिल को छू गई।आपकी सृजनता बनी रहे ,एही कामना है ।

जो सपनों को तोड़ चुके हैं -woe...........excellent

kya khu likha hai sir aap ka jabab nahi. jo sapno ko todchuke hai dil ko chugai hai. aap ke ye rachna apne friends ko jarur send karu ga

PURNIMA GUPTA

apki 6oti 6oti kavitay kafi ach6i h, jisko padhkar aisa lga ki ku6 khash zindagi me, jisko apne bohot sahajta se apni lekhni me utara h. Apka hardik dhnyawad sahitya ko ye anmol tofa dene k liye.

बेनामी

mujhe कब तक नारी यूं दहेज की बली चढाई जाएगी bahut ajhe lagi usme jo bhi hai saaj hai

bharat

bhai saab rachnaye achee h. desh or samaj k bare me b likhiye.

ASHISH SHUKLA

ASHISH SHUKLA: SIR G KYA LIKHA HAI JISKA KOI JABAB NAHI HAI LOG IS KAVITA KO PADHKAR APNI KALPANAO ME KHO JATE HAI SAMBHAWTAH HAR PERSION KE SATH AIS HUA RAHTA HAI

बेनामी

bahut achi kavita likhi hai

satywan saurabh

wah aapki rachnao ko kai saal bad padkar maja aa gaya kya haal hain kya kar rahe ho aajkal pata chala kaun satywan saurabh koi poorana dost i am waitina for yr reply

kavitaniketan333@gmail.com 9466526148

exellent i also write but not just like u

बेनामी

good very nice

achi hi desh parem par likhe manjeet singh pmanjeet999@gmail.com

achi hi desh parem par likhe pmanjeet999@gmail.com

Mr. Arun,
Achha likhte ho aur mai bhi likhne ki koshish karta hun lekin kahan likhu
kuch sujhaw dijiye

पिताजी ने बेटे को बुलाया पास में बिठाया,

बोले आज राज की मैं बात ये बताऊंगा।

शादी तो है बरबादी मत करवाना बेटे,

तुमको किसी तरह मैं शादी से बचाऊंगा।

बेटा मुस्कुराया बोला ठीक फरमाया डैड,

मौका मिल गया तो मैं भी फर्ज ये निभाऊंगा।

शादी मत करवाना तुम कभी जिन्दगी में,

मैं भी अपने बच्चों को यही समझाऊंगा।

aise naaree ke liye naaree maa hai us par likhna kuchh theek nahin

उमेश

बहुत अच्छी आप कि कविताएँ है !!

dahej ki kavita vakai me dil ko chunee wali he i m proud of u

vyang ki ye bhaasha bhitar tak gudguda gayi,
aapaki kavita men hai ek chetna nayi,
kamal hai aapane samaj se jude kisi ko bhi nahin choda,
nami garami kaviyon se nata joda,
sach kahun kavitaen bahut sundar thi,
maine bhi ras bhari chuski li.

bahut khoob...!!

kya bat kya bat or kya bat............

vishnu

kya bat h

vishnu

kya bat h

BAHUT ACHCHA SIR JI.

बेनामी

its only poem not seriously matter
you just take it another way
postitive way

VANDANA AWASTHY

"KAB TAK NARI U DAHEJ KI ......VASTVIK RUP SE SRAHNIY H,AAP NIRANTAR PRAGAI KI OR AGRSAR HO HMARI YHI KAMNA H........

बेनामी

AAP PRAGATI KI OR AGRSAR HO............

ALL ARE THE MIND BLOWING POETRIES, SPECIALLY ON THE FEMALE AND WHAT IS POETRY ARE THE BEST. I LIKE TO APPRECIATE.
PREMCHAND MURARKA
HINDI POET
MANY POETRY PUBLISHED IN KAVYA KOSH AND HONOURED AS BEST POET FOR THE MONTH FEB,2012<APL & MAY 2012.

बेनामी

very nice poetry ......

very nice your poetry and you.

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विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

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