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भूपेन हजारिका की जीवनी : दिल हूम हूम करे (4)

भूपेन हजारिका


दिल हूम-हूम करे


-दिनकर कुमार

(पिछले अंक से जारी....)

(साथ में सुनिये रेडियोवाणी पर भूपेन दा के गीत यहाँ पर)

दस
‘एरा बाटर सुर' बनाने के बाद भूपेन ने निश्चय किया कि ‘नील आकाशेर नीचे' नामक बांग्ला फिल्म बनाएंगे। बनारस में पढ़ते समय भूपेन का परिचय महादेवी वर्मा से हुआ था। महादेवी वर्मा की एक कहानी के आधार पर भूपेन इस फिल्म का निर्माण करना चाहते थे। उसी समय डेलू नाग नामक व्यक्ति ने आकर भूपेन को बताया कि इस कहानी पर फिल्म बनाने का अधिकार वह महादेवी वर्मा से खरीद चुका है। कहानी एक चीन देश के फेरीवाले के जीवन पर आधारित थी जो एक बंगाली लड़की को बहन बनाता है। बाद में फेरीवाले की मौत हो जाती है।


भूपेन ने डेलू नाग से कहा कि वह कहानी का अधिकार उनको बेच दे। नाग तैयार हो गया। भूपेन ने सोचा कि पटकथा ऋत्विक घटक से लिखवानी चाहिए। उन दिनों घटक ‘अयांत्रिक' बना रहे थे और उनके पास समय नहीं था। भूपेन ने मृणाल सेन से बात की। पन्द्रह सौ रुपये लेकर मृणाल सेन ने पटकथा लिखी। भूपेन हेमन्त कुमार से मिले। हेमन्त कुमार ने आश्वासन दिया कि फिल्म के लिए रुपये वे देंगे। संगीतकार के रूप में हेमन्त-भूपेन का नाम जाएगा। इसी दौरान भूपेन को किसी ने बताया कि डेलू नाग ने कहानी का अधिकार खरीदने के बारे में झूठी जानकारी दी थी। वास्तव में कहानी का अधिकार उसके पास नहीं था।


भूपेन महादेवी वर्मा से मिलने रानीखेत गये। महादेवी उनको पहचान नहीं पायीं। भूपेन ने बनारस की मुलाकात के बारे में बताया। अपना ‘सागर संगमत' गीत गाकर सुनाया और हिन्दी में उसका अर्थ बताया। महादेवी प्रसन्न हुईं। भूपेन को उन्होंने खाना खिलाया।
भूपेन ने उनसे पूछा कि चीनी फेरीवाले की कहानी उन्होंने बेच दी है क्या ? महादेवी ने बताया कि एक लड़का आया था, जो खरीदना चाहता था, मगर वह दुबारा नहीं आया। भूपेन ने उनसे अपनी योजना के बारे में बताया। महादेवी ने उनको अपनी कहानी का अधिकार दे दिया। उस समय देश में हिन्दी- चीनी भाई-भाई का माहौल था। चीन के काउंसलर को बुलाकर भूपेन ने मुहुर्त करवाया था। लता मंगेशकर को क्लैपिस्टिक देने के लिए आमंत्रित किया था। लता ने मजाक में कहा था - ‘भूपेन दा, मैं जिस फिल्म के लिए क्लैपिस्टिक देती हूं, वह फिल्म बनती नहीं है।' लता का मजाक सच साबित हुआ। रातोंरात भूपेन-हेमन्त प्रोडक्शन की जगह हेमन्त-बेला प्रोडक्शन बन गया और मृणाल सेन फिल्म के निर्देशक बन गये। एक तरह से लंगडी मारी गयी थी और फिल्म के प्रोजेक्ट से भूपेन को बाहर कर दिया गया। मृणाल सेन ने फिल्म बनायी। जिस दिन फिल्म कलकत्ता में रिलीज हुई, उसी दिन चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया और फिल्म बुरी तरह पिट गयी।


भूपेन हताश नहीं हुए। उन्होंने ग्वालपाडा के लोकजीवन को पृष्ठभूमि में रखकर ‘माहुत बन्धुरे' का निर्माण किया। इस फिल्म में ग्वालपाडा की बोली का प्रयोग किया गया था और ग्वालपडिया लोकगीत की गायिका प्रतिमा पाण्डेय के गीतों का इस्तेमाल किया गया था। ‘माहुत बन्धुरे' को जबर्दस्त सफलता मिली। फिल्म की प्रशंसा जवाहरलाल नेहरू ने की। उन्होंने सभी दूतावासों को यह फिल्म भिजवाई।

ग्यारह
भूपेन को भीषण आर्थिक संघर्ष करना पड़ रहा था। प्रियम बीच-बीच में आती थी और वापस बड़ौदा चली जाती थी। एक फिल्म में संगीत देने के बदले चार हजार रुपये मिलते थे। तब तक गीत गाने के बदले भूपेन पैसे नहीं लेते थे।


सन् 1960 में कलकत्ता में पोस्टर लगाया गया - ‘भूपेन हजारिका का खून चाहिए।' असम में चल रहे बांग्ला विरोधी आन्दोलन की प्रतिक्रिया में कलकत्ता में असमिया लोगों के खिलाफ घृणा का वातावरण तैयार हो रहा था। असम से सूर्य बोरा ‘शकुन्तला' फिल्म के सिलसिले में कलकत्ता गये थे और भूपेन के घर में ठहरे थे। बाहर निकलने पर उनकी हत्या कर दी गयी। उत्तम कुमार ने भूपेन को सन्देश भेजा कि जरा भी असुविधा महसूस हो तो वे उनके घर आकर रह सकते हैं। ज्योति बसु तब मंत्री नहीं बने थे। उन्होंने भूपेन को लाने के लिए गाड़ी भेज दी थी।


भूपेन जहां रहते थे, उस इलाके में ‘मस्तान' टाइप लड़कों ने उनसे कहा - ‘हम आपका बाल भी बांका होने नहीं देंगे। हमारी लाश पर चढ़कर ही कोई आप तक पहुंच सकता है। असम से भागे बंगाली सियालदह पहुंच चुके हैं। आपको असली खतरा उनलोगों से ही है।'
भूपेन के खिलाफ पोस्टर चिपका रहे एक लड़के को ऋत्विक घटक ने थप्पड़ मारकर पूछा था - ‘किसने सिखाया है तुझे भूपेन हजारिका के खिलाफ पोस्टर लगाने के लिए ?' बाद में पता चला था कि एक संगीतकार के इशारे पर वैसा किया गया था।


एक दिन भूपेन बाहर से घूमकर घर लौटे तो नौकर ने बताया कि पैंतीस आदमी आये थे। कह रहे थे कि वक्त ठीक नहीं है। भूपेन दा से कहना रात नौ बजे के बाद कहीं गाने के लिए न जाएं।


20 अगस्त 1960 को असम के खिलाफ कलकत्ता की सड़कों पर जुलूस निकला था। उस दिन भूपेन महाजाति सदन के पास खड़े थे। उनके साथ कृष्णफली चाय बागान के समर सिंह थे। जुलूस आगे बढ़ रहा था। समर सिंह ने कहीं छिपने के लिए कहा। भूपेन ने कहा कि उन्हें कोई डर नहीं है। मगर समर सिंह नहीं माने। दोनों सोनागाछी चले गये। एक वेश्या के कोठे पर गये। वेश्या स्नान कर बाहर निकली। उसने कहा कि यह सब क्या हो रहा है। आज तो पूरा बाजार बन्द है, आपलोग कैसे आये ?


भूपेन ने अपना परिचय नहीं दिया। उन्होंने कहा कि वे रात गुजारना चाहते हैं। वेश्या ने उनके लिए भोजन का प्रबन्ध किया। फिर वह बोली - ‘आपलोग बैठिए, मैं जरा बाहर से आ रही हूं।' भूपेन को आशंका हुई कि कहीं गुण्डों को बुलाने के लिए तो नहीं जा रही है ! कुछ देर बाद वह ढेर सारे रिकार्ड लेकर लौटी। रिकार्ड प्लेयर पर वह रिकार्ड बजाने लगी। पहला गाना था भूपेन का ‘सागर संगमत', दूसरा गाना था भूपेन का, तीसरा और चौथा गाना भी भूपेन का ही था। वेश्या ने कहा - ‘सुना है असमिया-बंगाली के बीच कुछ हुआ है ? ऐसी हालत में आपलोग यहां क्यों आये हैं ? मैं यह धंधा जरूर करती हूं पर आपको दूर से देखने के लिए महाजाति सदन में जाती हूं। आफ गाने मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। मैं असम जा चुकी हूं। एक चाय बागान के मालिक के साथ। नाम नहीं बताऊंगी। असम इतना प्यारा है। यह सब क्या हो रहा है।'


सुबह पौ फटते ही भूपेन ने महिला से विदा मांगी और अपने घर लौट आये। 1960 में असमिया विरोध का जो माहौल बना, उसका गहरा प्रभाव भूपेन पर पड़ा। उनको फिल्म का काम मिलना बन्द हो गया। प्रियम बड़ौदा में थी। भूपेन और नौकर को गुजारे के लिए हर महीने पांच सौ रुपये की जरूरत होती थी। पांच सौ रुपये का जुगाड कर पाना कठिन हो जाता था। काफी कर्ज हो गया था। गुवाहाटी में भी परिवार को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था।


इसी दौरान भूपेन ने ‘आमार प्रतिनिधि' में स्तम्भ लिखना शुरू किया। मासिक दो सौ रुपये मिल जाते थे। भूपेन ने सोचा कि किसी तरह पैसों का जुगाड कर ‘शकुन्तला' बनायी जाए। उधार लेकर उन्होंने ‘शकुन्तला' का निर्माण किया। फिल्म काफी सफल हुई। ‘शकुन्तला' को श्रेष्ठ आंचलिक फिल्म का पुरस्कार मिला। इस फिल्म के चलने से भूपेन को आर्थिक रूप से कुछ राहत मिली। एक साल तक के लिए भूपेन निश्चिन्त हो गये।
भूपेन ने कम बजट में एक हास्य आधारित फिल्म ‘लटिघटी' बनायी, जिसकी शूटिंग उन्होंने तेरह दिनों में पूरी की। भूपेन को प्राग जाने का निमंत्रण मिला। प्राग से लौटने के बाद भूपेन असम गये और हेमांग विश्वास के साथ सांस्कृतिक टोली बनाकर जगह-जगह घूमते हुए असमिया-बंगाली सद्भाव का सन्देश देने लगे। तत्कालीन मुख्यमंत्री विमला प्रसाद चालिहा ने लगभग रोते हुए भूपेन से कहा था कि वे स्थिति को नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं और उनके जैसे कलाकार ही कुछ कर सकते हैं। भूपेन को कई तरह की धमकियों का भी सामना करना पड़ा, परन्तु धैर्य खोए बिना उन्होंने अपना सांस्कृतिक अभियान जारी रखा। उत्पल दत्त ने ‘न्यू एज' में लिखा - ‘भूपेन हजारिका की तरह कौन कलाकार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए सड़क पर उतरता है ? क्या हम उतरते हैं ? क्या हमने कलकत्ता में ऐसा कोई प्रयास किया है ?'


बारह
‘लटीघटी' बनाने के बाद भूपेन ने खासी समुदाय की पृष्ठभूमि पर ‘प्रतिध्वनि' फिल्म का निर्माण किया। इस फिल्म को पेरिस फिल्म महोत्सव में दिखाया गया। पैसे की कमी के कारण भूपेन फ्रेंच में फिल्म के सबटाइटल की व्यवस्था नहीं कर पाए।


इस बीच भूपेन के दाम्पत्य जीवन में दरार बढ़ता जा रहा था। दस सालों के अन्तराल के बाद अचानक भूपेन की प्रेमिका को प्रियम अपने साथ घर लेकर आयी। उस दिन भूपेन को बुखार था। तब बड़ौदा से प्रियम आयी थी। उस दिन कलकत्ता के एक क्लब में एक असमिया परिवार ने दावत दी थी और भूपेन को आमंत्रित किया था। भूपेन जा नहीं पाए। दावत में प्रियम गयी थी। वहीं प्रियम की मुलाकात भूपेन की पूर्व प्रेयसी से हुई, जो किसी और की पत्नी थी। दोनों में घनिष्टता हो गयी। प्रियम के साथ वह अक्सर भूपेन के घर आने लगी। भूपेन प्रथम प्रेम को भूल नहीं पाये थे और इतने दिनों के बाद उसे पाकर पिघलने लगे थे।


इसी तरह बम्बई की एक मशहूर कलाकार जब कलकत्ता आती थी तो भूपेन के घर में ठहरती थी। उसने प्रियम से कहा कि वह भूपेन जैसे जीनियस कलाकार की देखभाल ठीक से नहीं कर पा रही है। एक दिन भूपेन और प्रियम उस कलाकार को विदा करने हवाई अड्डे पर गये। कलाकार ने प्रियम के साथ एकान्त में बातचीत की और विमान पर सवार हो गयी। प्रियम रोने लगी। भूपेन ने रोने की वजह पूछी तो प्रियम ने बताया - ‘वह कह रही थी कि मुझसे ज्यादा वह तुमसे प्यार करती है।'


पूर्व प्रेमिका के साथ भूपेन का मेलजोल बढ़ता गया। उसके पति को भी मामला समझ में आ गया। उसने दोस्ती का सम्मान किया। चारों एक साथ फिल्म देखने जाने लगे, होटल में खाना खाने लगे।


सन् 1950 में भूपेन ने प्रियम से विवाह किया था। 1963 में दोनों ने तय किया कि विवाह बन्धन से मुक्त हो जाना उचित होगा। भूपेन ने सिद्घार्थ शंकर राय को अपना वकील बनाया। दोनों ने तलाक ले लिया। भूपेन ने मुस्कराते हुए हावड़ा स्टेशन पर प्रियम को अलविदा कहा। प्रियम कनाडा में रहती है। भूपेन जब भी जाते हैं, प्रियम से जरूर मिलते हैं।


तलाक के बाद प्रियम का छोटा भाई यादवपुर विश्वविद्यालय में पढ़ने आया तो वह भूपेन के साथ ही रहने लगा। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में उच्च पढ़ाई करने चला गया, जहां से उसने भूपेन को खत लिखा कि वह भूपेन की छोटी बहन रूबी से ब्याह करना चाहता है। भूपेन ने प्रियम के साथ सलाह-मशविरा किया। प्रियम ने अपनी सहमति दे दी और कहा कि रूबी को किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होगी। भूपेन ने रूबी का ब्याह प्रियम के भाई के साथ करवा दी।


दाम्पत्य जीवन से मुक्त होने के बाद भूपेन खुद को काफी एकाकी महसूस करने लगे और काफी शराब पीने लगे। रात-रात भर घर से बाहर रहने लगे।


सन् 1965 तक भूपेन कहीं गाने जाते थे तो उसके लिए पैसे नहीं लेते थे। उनकी आदत-सी बन गयी थी कि हर कार्यक्रम के लिए एक नये गीत की रचना जरूर करनी है। सन् 1965 में जोरहाट के इण्टर कॉलेज में गायन प्रस्तुत करने के बाद भूपेन को हवाई यात्रा के अलावा पारिश्रमिक के रूप में पांच सौ रुपए मिले थे।


भूपेन को बार-बार यह अहसास सालता था कि अपने परिवार को वे कुछ ठोस मदद नहीं दे पा रहे थे। मां को लकवा मार गया था। भूपेन की मां पहले सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाती थी। उन्होंने असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से हिन्दी की पढ़ाई भी की थी।


छोटा भाई अमर हजारिका दो बार टीबी का शिकार हो चुका था। भूपेन ने अमर को एक छोटा प्रेस खोलने में सहायता की थी। एक और भाई प्रवीण हजारिका नेफा में नौकरी करते थे। बाद में लन्दन में अध्यापक की नौकरी मिल गयी। छोटे भाई-बहनों को भूपेन कलकत्ता के घर में बुलाकर रखते थे और सबकी पढ़ाई-लिखाई और रोजगार की चिन्ता करते थे।


भूपेन के छोटे भाई जयन्त हजारिका ने गायक के रूप में जबर्दस्त प्रसिद्घि हासिल की थी। अल्पायु में जयन्त की मौत हो गयी। जयन्त की दर्दीली आवाज के प्रशंसक असम के लोग आज भी हैं।


सन् 1966 में भूपेन के पिता का देहान्त हो गया। श्राद्घ में विष्णुप्रसाद राभा, फणि बोरा आदि आये थे। विष्णुप्रसाद राभा ने भूपेन से कहा था - ‘क्या तू लेटर टू एडीटर ही बना रहेगा ? आर्ट के क्षेत्र में कुछ करने के लिए विधानसभा के भीतर जाना होगा। वहीं अपनी बात को कानून बना सकोगे।' फणि बोरा ने नाउबैसा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का सुझाव दिया। भूपेन ने कहा कि वे पहले नाउबैसा इलाके का दौरा करेंगे, उसके बाद कोई फैसला करेंगे।
भूपेन जब लखीमपुर पहुंचे तो अनगिनत प्रशंसकों को पाकर अभिभूत हो गये। युवाओं ने कहा कि देवकान्त बरुवा ने जो उम्मीदवार खड़ा किया है, वह एक नम्बर का गुण्डा है, जो बान्ध तोड़कर नये सिरे से बान्ध बनाने का ठेका लेता है। दूसरे प्रतिद्वन्द्वियों ने कहा कि अगर भूपेन चुनाव लड़ना चाहेंगे तो वे भूपेन का समर्थन करेंगे। भूपेन कोई निर्णय लिए बिना कलकत्ता लौट गये। इसी बीच अखबारों में छपा कि भूपेन हजारिका चुनाव लड़ने वाले हैं। माकपा की असम शाखा ने कहा कि वह भूपेन का समर्थन करेगी।


सन् 1967 में भूपेन ने चुनाव लड़ा और देवकान्त बरुवा के उम्मीदवार को चौदह हजार मतों से पराजित किया। उस साल भूपेन के साथ-साथ विष्णुप्रसाद राभा, लक्ष्यधर चौधरी, सतीनाथ देव और महीधर पेगू जैसे साहित्यकार व्यक्ति एम. एल. ए. बनकर असम की तत्कालीन राजधानी शिलांग पहुंचे थे।


सन् 1967 से 1971 तक विधायक रहते हुए भूपेन तीन महीने शिलांग में गुजारते थे। शेष नौ महीने संगीत और फिल्म में व्यस्त रहते थे। वे निर्दलीय उम्मीदवार थे और उन्होंने शुरू में ही कह दिया था कि विपक्ष में रहकर वे जनहित के सवालों को उछालते रहेंगे।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

संस्मरण 8451318775251297038

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  1. भूपेन हजारिका का एक अलग ही पहलू पढने को मिल रहा है ।

    शुक्रिया।

    उत्तर देंहटाएं
  2. क्या जीवन रहा है!!
    वाकई इतना कुछ पाने के लिए कितना मूल्य चुकाना पड़ा उन्हें!!
    शुक्रिया!

    उत्तर देंहटाएं
  3. अदभुत और प्रशंसनीय प्रस्‍तुति । आपकी ये श्रृंखला भले जल्‍दी ही समाप्‍त होने वाली हो पर हम रेडियोवाणी पर भूपेन दा के नगमे छेड़ते रहेंगे ।
    :P

    उत्तर देंहटाएं

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