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राजेन्द्र अविरल की कविता : मां


मातृ दिवस विशेष

तपते मरु में ,राहत देती
माँ बरगद -सी छांव है .
दया- से उफनते जीवन में
मां ,पार लगाती नाव हैं

- राजेन्द्र अविरल

मां
(1)



बेटा /बेटी के होने पर
नारी माँ का दर्जा पा जाती है.
फिर सारे जीवन भर उनपर
ममता -रस बरसाती है ,

शोर शराबों वाले घर में
चुप होकर सब कह जाती है
कर त्याग तपस्या परिवार में
मां मौन साधिका बन जाती है

लगे भूख जब बच्चों को मां
सब्जी -रोटी बन जाती है
धूप लगी जो बच्चों को
मां छांव सुहानी हो जाती है .

ग़र मर भी जाए तो
हर मूरत में नज़र जाती है
झूठ -फरेब की दुनिया में
मां बडी जरूरत बन जाती है.

मां जीवन में ही समग्र
चेतन परमेश्वर बन जाती है
मां के अलावा कहीं ना मिलता
तभी तो ईश्वर कह्लाती है.

मां
(2)


तपते मरु में ,राहत देती
माँ बरगद -सी छांव है .
दरिया- से उफनते जीवन में
मां ,पार लगाती नाव हैं
उबड-खाबड राहों पर
माँ छोटी -सी पगडंडी है
भूखे ,छोटे बच्चों के लिए
माँ चूल्हे पर पकती हंडी है
खारे पानी की दुनिया में
माँ ,मीठे पानी का झरना है
हौले से समझाती मां
लेकिन नहीं किसी से डरना है.
झांसा-फरेबों की दुनिया में
मां भोर का उलियारा है
हर बच्चे के लिए
मां का रूप जहाँ से न्यारा है.
दुनिया का ये रूप दिनों दिन
मां से ही निखरता जाता है
ढूंढों ना कहीं तुम ईश्वर को
वो मां में ही मिल जाता है

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rachana

maa pe aap ki kavitaon ne dil chhu liya
saader
rachana

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