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अनुज नरवाल ‘रोहतकी’ की तीन कविताएं

कविताएं


- डॉ. अनुज नरवाल 'रोहतकी'


(1) अमन के दुश्मन

छुप-छुपकर हम पर करता है क्यूं तू वार

अपनी नामर्दानगी का क्यूं सबूत देता है हरबार

हमारे सामने आ, या जी चाहे जहां हमें वहां बुला

कसम मां भारती की, अब पानी सर से गुजर गया

युद्ध में आ, मुहब्बत में आ , अमन में आ

तेरी मर्ज़ी, तेरी रज़ा, चाहे जिस चीज में आ

हर बार मुंह की खाई है, याद है कि भूल गया

जयपुर के सीरियल बम्ब लास्ट हों फिर या

कारगिल घुसपेट हो या मुंबई बम्ब धमाके

क्या जी नहीं भरा तेरा, हमको सताके

अरे! बेवकूफ,

तूने जब भी हमको हादिसा दिया

इस बात पर क्या ग़ौर नहीं किया

हर हिंदू हर मुस्लमां

मेरे वतन का हरेक इन्सां

बुरे वक्त में एक है मिला

अ मूर्ख अब भी समझ जा

माना मैं वजह हूं तेरे दर्द की

और वजह मेरे गम की

पर ये भी सच है यार मेरे

हम मरहम हैं, इक-दूसरे के ज़ख़्म की।


2

अमन के दुश्मन

वतन के दुश्मन

ओ दहशतगर्द

ओ नामर्द

बेकसूरों को मारता है

डराता है धमकाता है

क्यूं दूध अपनी मां का लजा़ता है

तुझे हादिसा देना आता है

हमें हादिसे से उभरना आता है

मत भूल

सहन-शक्ति है हममें गांधी-सी

और हमें सुभाष भी बनना आता है


(3)

एक अक्ल का पुतला

अक्ल के घोड़े दौड़ा रहा था

कौन अपना है कौन पराया है

हिसाब ये लगा रहा था

ये सोचते-सोचते उसकी सोचनशक्ति

चरखे की तरह चक्कर काटने लगी थी

यानी उसकी अक्ल चकराने लगी थी

उसकी अक्ल पर था पत्थर पड़ा

उस अक्ल के दुश्मन को न था ये पता

कि चल पड़ा है उसका वक्त बुरा

उसको ये इल्म न था

कि आदमी का जब वक्त बुरा होता है

जैसे सोचता है वो वैसे कब होता है

यानि ऊंट पर बैठे को कुत्ता काट लेता है

और आदमी अपने थूके को चाट लेता है

आदमी का जब वक्त बुरा होता है

मैंने उससे कहा-

अ बछिया के ताऊ

दुनिया की रीत कब तेरे समझ आवेगी

इस बगुला भक्त दुनिया में

बकरे की मां कब तक खैर मनावेगी

बड़ी मछली, छोटी मछली को ही तो खावेगी

मैंने उससे कहा-

ये दुनिया

पहले तो तेरी अपनी बनकर

बात तेरे मन की पूछ जावेगी

और एक बात की फिर बात सौ बनावेगी

फिर मज़ाक तेरा उड़ावेगी

यानि जख़्मों पर तेरे नमक लगावेगी

दुनिया की ये रीत कब तेरे समझ आवेगी

मैंने फिर कहा-

इस दुनिया में अगर है रहना

पड़ेगा इस दुनिया-सा होना

यानी सीख ले पगले

बहती गंगा में हाथ धोना

करे कोई अहसान तुझपे

उस अहसान को भूल जाना

यदि किसी से काम हो निकलवाना

मीठी छुरी बनकर उसके अंदर घुस जाना

मरने के बाद ही बैद्य बुलाना

माल मुफ्त, दिल बेरहम

इस नीति को अपनाना

मेरी मान मुंह देखे की मुहब्बत

समझे है ये जमाना

यदि ऐसा करता जावेगा

भली करेंगे राम जरूर

तेरा अच्छा वक्त भी आवेगा

तेरा हर काम सरल हो जावेगा

बिल्ली के भाग्य ये

हर छीका टूट जावेगा

आने वाली पीढ़ियों को

तेरा तज़रबा काम आवेगा

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संपर्क :

डॉ. अनुज नरवाल ‘रोहतकी’

454/33 नया पड़ाव, काठ मण्डी

रोहतक-124001 हरियाणा

ईमेल - dr.anujnarwalrohtaki@gmail.com

टिप्पणियाँ

  1. बहुत उम्दा रचनायें. आभार इसे प्रस्तुत करने का.

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