मंगलवार, 27 मई 2008

अश्विनी केशरवानी का आलेख - छत्तीसगढ़ के विस्मृत साहित्यकार: पंडित हीराराम त्रिपाठी

छत्तीसगढ़ के विस्मृत साहित्यकार: पंडित हीराराम त्रिपाठी

प्रो. अश्विनी केशरवानी

छत्तीसगढ़ में अनेक स्वनामधन्य साहित्यकार हुए जो महानदी की अजस्र धारा से पल्लवित और पुष्पित हुए और काल के गर्त में समाकर गुमनाम बने रहे। ऐसे बहत से साहित्यकार हैं जिनका आज कोई नाम लेने वाला नहीं है। हालांकि साहित्य के क्षेत्र में उनके अवदान को भुलाना संभव नहीं है। उन्हीं साहित्यकारों में एक पंडित हीराराम त्रिपाठी भी हैं। मैं स्वयं महानदी से संस्कारित हूं। जब भी मैं छत्तीसगढ़ के गुमनाम साहित्यकारों पर विचार करता हूं तो पाता हूं कि वे किसी न किसी रूप में महानदी से जुड़े हुये हैं। महानदी छत्तीसगढ़ की पुण्यतोया नदी है। इस नदी के संस्कार मोक्षदायी होने के कारण इसके तटवर्ती ग्राम सांस्कृतिक तीर्थ के रूप में जाने गये। मगर महानदी के तट पर बसा नगर शिवरीनारायण सांस्कृतिक और साहित्यिक दोनों तीर्थ है। सन् 1861 में जब बिलासपुर को जिला बनाया गया तो प्रशासनिक सुविधा के लिए बिलासपुर के अलावा शिवरीनारायण और मुंगेली को तहसील बनाया गया। सन् 1880 में सुप्रसिद्ध साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र के मित्र और सहपाठी ठाकुर जगमोहनसिंह जो एक बहुत अच्छे कवि और आलोचक थे, छत्तीसगढ़ के धमतरी में तहसीलदार होकर आये। दो वर्ष वे यहां रहे और स्थानान्तरित होकर शिवरीनारायण आ गये। यहां के नदी-नाले और पहाड़ी का प्राकृतिक सौंदर्य उन्हें बहुत भाया और यहां रहते हुए उन्होंने कई ग्रंथों की रचना कर डाली। शिवरीनारायण को उनकी कार्यस्थली कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहां उन्होंने काशी के ‘‘भारतेन्दु मंडल‘‘ की तर्ज में ‘‘जगमोहन मंडल‘‘ बनाकर छत्तीसगढ़ के बिखरे साहित्यकारों को समेटने का सद्प्रयास किया जिसमें वे सफल भी हुए। कदाचित् यही कारण है कि शिवरीनारायण एक ‘‘साहित्यिक तीर्थ‘‘ के रूप में भी प्रसिद्धि पा सका। पंडित हीरराम त्रिपाठी जगमोहन मंडल के एक जगमगाते नक्षत्र थे।

भूले बिसरे रचनाकारों को याद करना अपनी परम्परा की पहचान के साथ ऋण शोध भी है। वर्तमान की सही पहचान के लिए अतीत की साझेदारी आवश्यक है। अतीत को उलटने पलटने का मकसद उन भूली बिसरी कड़ियों से अपने को जोड़ना है जिनसे हमारा वर्तमान समूर्तित हुआ है। जातीय स्मृतियों से जुड़कर ही साहित्य युगबोध की सही पहचान कर सकता है। बहुआयामी और बहुरंगी रचनाधर्मिता की पहचान हिन्दी में पहली बार भारतेन्दु युग में मिलती है। कविता के प्रवाह के समानान्तर नाटक, निबंध, उपन्यास और समालोचना का प्रवाह इसी काल में दिखाई देता है। भारतेन्दु यंग का महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय तथ्य है- हिन्दी कविता का केंद्र संक्रमण। इस युग में हिन्दी कविता व्यक्तिगत और दरबारी रूचियों से हटकर नगर रूचियों में संक्रमित होती है। इनसे काव्य संचेतना के सामूहिक विकास के नये केंद्रों को जन्म दिया। काशी ऐसा ही एक प्रमुख केंद्र था और इस केंद्र के न्यूक्लियस थे- बाबू भारतेन्दु हरिश्चंद्र। आलोचकों और इतिहासकारों ने बड़ी शिद्दत के बाद इस तथ्य को स्वीकार किया है कि उस समय की साहित्यिक गतिविधियां भारतेन्दु हरिश्चंद्र की परिष्कृत साहित्यिक सुरूचि एवं जागरूकता के फलस्वरूप केंद्रित होकर नये वातावरण नियोजित करने में प्रतिफलित हुई थी। उस युग की साहित्यिक गतिविधियों की एक झलक हमें छत्तीसगढ़ में भी देखने को मिलती है। इन साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र महानदी का तटवर्ती ग्राम शिवरीनारायण था और ठाकुर जगमोहनसिंह उसके नाभिकेंद्र थे। उन्होंने यहां के आठ सज्जन व्यक्तियों का परिचय अपनी कृति ‘‘सज्जनाष्टक‘‘ में दिया है जिनमें पंडित यदुनाथ भोगहा, महंत अर्जुनदास, महंत गौतमदास, माखन साव, पंडित हीरराम त्रिपाठी, मोहन पुजारी, ऋषिराम और रमानाथ प्रमुख हैं। सज्जनाष्टक के बारे में वे लिखते हैं:-

रहत ग्राम एहि विधि सबै सज्जन सब गुन खान

महानदी सेवहिं सकल जननि सब पय पान ।

यौ जगमोहन सिंह रचि तीरथ चरित पवित्र

सावन सुदि आठै बहुरि मंगलवार विचित्र ।

संवत् विक्रम जानिए इन्दु वेद ग्रह एक

शबरीनारायण सुभग जहां जन बहुत विवेक ।

सज्जनाष्टक में पंडित हीराराम त्रिपाठी के बारे में वे लिखते हैं:-

अपर एक पंडित गुनखानी मानी हीरारामा ।

हीरा सो अति विमल जासुजस छहरत चहुं छवि धामा।

यह पुरान मनु भयो वांचि कै दस अरू आठ पुराना

जीति सकल इंद्रिन अब बैठ्यो शिव सरूप अभिरामा।

पंडित हीराराम त्रिपाठी महंत गौतमदास के अत्यंत प्रिय थे। उन्हीं की आज्ञानुसार उन्होंने पंडित ऋषिराम द्विवेदी और पंडित विश्वेश्वरप्रसाद त्रिपाठी के सहयोग से ‘‘श्री शिवरीनारायण महात्म्य‘‘ को संस्कृत से हिन्दी भाषा में अनुवाद करके संशोधित किया। यह पुस्तक संवत् 1944 में बलराम प्रेस राजनांदगांव से प्रकाशित हुई। इसकी भूमिका प्रजाहितैषी के संपादक श्री भगवानदत्त शर्मा ने लिखी है। श्री शिवरीनारायण महात्म्य के बारे में त्रिपाठी जी लिखते हैं:-

शिवरीनारायण कथा गौतमदास महंत

लखि इच्छा रच्यौ द्विज हीरा यह ग्रंथ।

वे यह भी लिखते हैं कि यह क्षेत्र आदिकाल से सिद्धपीठ रहा है और इसी कारण हर युग में इस क्षेत्र की अपनी विशेषता रही है। कदाचित् यही कारण है कि ऋषि मुनियों ने इसे अपनी साधना का क्षेत्र बनाया। सतयुग के उत्तरार्द्ध में यहां मतंग ऋषि का गुरूकुल आश्रम था, जिसे विश्व का प्राचीनतम् गुरूकुल विश्व विद्यालय माना जाता है। शबरी यहां की परिचारिका थी जिसके जूठे बेर खाने श्रीराम और लक्ष्मण यहां आये थे। बाल्मिकी रामायण में भी उल्लेखित है:-

मतंगशिष्यातस्त त्रासन्नृषसः सुसमाहिताः

तेषां भाराभितप्रानां वन्यमाहरतां गुरो ।

इस क्षेत्र को सिद्धिपीठ कहे जाने की पुष्टि यहां के मंदिरों में देवताओं की माला लिए साधनारत मूर्तियों से होती है। कहना न होगा कि यहां ऋषि-मुनियों को सिद्धि प्राप्त होती थी। कदाचित् इसी कारण अलग अलग युगों में यहां की महिमा का बखान करते हुए पंडित हीराराम त्रिपाठी लिखते हैं- ‘‘सौनकादिक ऋषियों के श्री नारायण क्षेत्र के बारे में पूछने पर सूत जी भगवत् ध्यानकर इस महा उत्ाम महात्म्य कहते भये कि हे मुनिगण एकाग्रचित्ा होकर सुनिये। नारायण क्षेत्र को साक्षात् भगवत्धाम जानिये। वह नारायण का कला रूप है। इस क्षेत्र का आदि नाम विष्णुपुरी, द्वितीय नाम रामपुर, तृतीय नाम बैकुण्ठपुर और चतुर्थ नाम नारायणपुर युगानुक्रम से जानिये। वहां चित्रोत्पला-गंगा के तट पर पुण्यरूपी कानन मंडित सिंदूरगिरि पर्वत के निकट साक्षात् अविनाशी श्री नारायण विराजमान हैं। उनकी चरण को स्पर्श करती हुई पवित्र ‘‘रोहिणी कुंड‘‘ स्थित है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री बटुसिंह चैहान ने राहिणी कुंड को एक धाम बताया है:- ‘‘रोहिणी कुंड एक धाम है, है अमृत का नीर‘‘ जबकि पंडित मालिकराम भोगहा ने उसे मोक्षदायी बताया है:-

रोहिणि कुंडहि स्पर्श करि चित्रोत्पल जल न्हाय।

योग भ्रश्ट योगी मुकति पावत पाप बहाय ।।

तब त्रिपाठी जी की यह कल्पना कि यहां बसने वाले संत, सज्जन और भगवत भक्त हैं, अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं है। देखिये उनका एक भाव:-

चित्रउतपला के निकट श्री नारायण धाम।

बसत संत सज्जन सदा शिवरीनारायण धाम।।

श्री शिवरीनारायण महात्म्य के अलावा त्रिपाठी जी ने दो पुस्तकें और लिखीं हैं जिनमें भक्ति विषयक पदावलियां हैं। हस्तलिखित उनकी ये पुस्तकें अप्रकाशित ही रहीं और काल के गर्त में समा गई। उनकी भक्ति विषयक पदावलियां छत्तीसगढ़ी रहस में खूब प्रचलित थी। आज भी यत्र तत्र उनके द्वारा लिखित पौराणिक कथाओं का वाचन पंडित लोग करते हैं। उनके काव्य तो लोगों को कंठस्थ थे। देखिए उनका एक काव्य:-

समरस गोपी एक कन्हैया तामे देखे तामे है।

एक से एक बनी सखियां सब दामिनि जनु मेघा में है।

नील मनि मनि बीच कनकके जनुग्रंथित बलमा में है।

कोई बामा कह गये स्थान के कोई लपटात हिया में है।

है अविनासी घट घट वासी सुद्ध असुद्ध घिया में है।

जानत उनके भाव भुवनपति जाके ज्यों न जिया में है।

पंडित हीराराम त्रिपाठी निहायत सज्जन पुरूष थे। वे गहरे आस्थावान व्यक्ति थे। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति उनमें गहरी भक्ति थी। जन कल्याण चेतना से उनका व्यक्तित्व सम्पन्न था। वे अहं चैतन्य से शून्य भोले भाले उदार मनुष्य थे। सहृदयता तो उनमें कूट कूटकर भरी थी। श्री शिवरीनारायण महात्म्य को उन्होंने महंत गौतमदास जी की प्रेरणा से संशोधित और अनुवादित किया था। इस बात को वे स्वयं कहते हैं:-

गौतमदास महंत को प्रेम पुनीत विचार,

द्विजहीरा अल्था कियो पंडित लेहु सुधार।

हरिदासन की दास्यता सदा बसै मनमोर,

मांगत हीराराम द्विज संतन सो कर जोर।

ऐसे सत्पुरूष का जन्म सन् 1826 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के दुर्बन नामक ग्राम में हुआ था। वे किसी कार्य के सिलसिले में छत्तीसगढ़ के बेमेतरा ग्राम आये। वहां से वे रतनपुर आये। यहां उनकी मुलाकात कसडोल के मालगुजार मिसिर जी से हुई। वे उन्हें कसडोल ले आये। कसडोल में त्रिपाठी जी मालगुजारी की देखरेख आम मुख्तियार के रूप में करने लगे। आम मुख्तियार के रूप में उन्होंने मालगुजारी को बहुत अच्छे ढंग से चलाया। यहां की प्रकृति प्रदत्त सुषमा उनके कवि मन को जगा दिया और वे यहां काव्य रचना करने लगे। तभी शिवरीनारायण के तत्कालीन तहसीलदार और सुप्रसिद्ध साहित्यकार ठाकुर जगमोहनसिंह कासडोल आये और हीराराम त्रिपाठी की काव्य धारा से बहुत प्रभावित हुये। उन्होंने त्रिपाठी जी को शिवरीनारायण आने का निमंत्रण दिया। बाद में उनकी नियुक्ति यहां तहसील के खजांची के पद पर कर दी। सन् 1891 में तहसील मुख्यालय शिवरीनारायण से जांजगीर आ गया और इसी के साथ त्रिपाठी जी सपरिवार जांजगीर आ गये। यहां वे अर्जीनवीसी करने लगे। जीवन की अंतिम यात्रा भी उन्होंने यहीं पूरी की। उनके मृत्योपरांत उनका परिवार कहां चला गया, इसकी सही जानकारी नहीं मिलती।

त्रिपाठी जी की रचनाएं एक आस्थावान व्यक्ति की भावानुभूति है। एक सीमित सरोकार को लेकर उनका रचना संसार हमारे सामने आता है। यह सीमित सरोकार धर्म और आस्था का है। उनमें आस्था के नाम पर वैष्णववादिता है। उनकी वैष्णववादिता मध्य युगीन वैष्णववादिता से अलग है। उनके काव्य में जो भक्ति निरूपण है, उसका स्वरूप व्यापक आंदोलन या सामाजिक व्याप्ति में न होकर सीमित तथा संकीर्ण व्यक्तिगत निष्ठा पर है। त्रिपाठी जी की भक्ति भावना में आस्था का संप्रदायिक रूप नहीं है। उनकी भक्ति भावना में सगुन निर्गुण सभी एकाकार है। उनके जीवन की राममय झांकी प्रस्तुत है:-

रामनाम जपत अनेक धर्म सिद्ध होत, रामनाम जपत यमन तर जात है।

रामनाम जपत खपत कलिमल सब, रामनाम जपत कीर तिफरात है।

रामनाम श्रवण करत युक्ति मुक्ति होत, रामनाम सुनत कलुष महरत है।

रामप्रताप शिव नपित है आपु रामनाम लेत द्विजहीरा हर्षित है।

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रचना, आलेख एवं प्रस्तुति,

प्रो. अश्विनी केशरवानी

राघव, डागा कालोनी

चांपा-495671 (छत्तीसगढ़)

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