मंगलवार, 3 जून 2008

अशोक कुमार वशिष्ट का लघु आलेख : दिशा

 

दिशा

-अशोक कुमार वशिष्ट

 

सोचता हूं कि मानव की असली खोज की दिशा‚ धरती से चांद की नहीं। बल्कि शरीर से आत्मा की है और होनी चाहिए। मंदिर से मनके अंदर की है और होनी चाहिए। सुख‚ शांति और आनंद का भंडार तो आत्मा में है‚ न कि चांद‚ सूरज और ग्रहों में। न कि मंदिर और तीर्थ स्थानों पर। जिस तरह प्रभु को प्यार करने वाला‚ अपनी यात्रा मंदिर से शुरू करता है। पर जैसे जैसे वो ज्ञान को प्राप्त करता जाता है‚ वैसे वैसे वो समझने लग जाता है कि प्रभु का वास तो हर स्थान पर है। वो एक दिन मंदिर जाना ही छोड़, देता है। उसके लिए हर स्थान ही मंदिर जैसा हो जाता है। हर समय ही प्रार्थना का समय हो जाता है। और वो हर पल ही सुख‚ शांति और आनंद महसूस करता है। फिर उसकी सारी खोज खत्म हो जाती है। यही वो कला है‚ जो मानव को सीखनी है। यही वो विद्या है‚ जिसे मानव को प्राप्त करना है। इसके बिना हर कला बेअर्थ है। इसके बिना हर विद्या बेकार है। आज इस कला और विद्या को समझने‚ सीखने और ग्रहण करने वाले बहुत ही कम हैं।

 

हर देश का अपना धर्म होता है। हर देश की अपनी सभ्यता और संस्कॄति होती है। हर देश की अपनी भाषा होती है। ये निर्भर करता है उस देश और उस देश के धर्म पर। हर देश के धर्म और भाषा का अपना स्तर होता है‚ अपनी सीमा होती है। एक देश का धर्म और भाषा स्कूल की तरह होती है। दूसरे देश का धर्म और भाषा कालेज की तरह होती है। तीसरे देश का धर्म और भाषा यूनीवर्सिटी की तरह होती है। जिस देश का धर्म और भाषा स्कूल की अवस्था में हैं‚ वो अपने बच्चों को कालेज या यूनीवर्सिटी की शिक्षा या विद्या नहीं दे सकता।

स्कूल के विद्यार्थी को‚ यूनीवर्सिटी के विद्यार्थी तक पहुंचने के लिए एक लम्बे समय और कठिन परिश्रम की आवश्यकता होती है। लेकिन आज न तो कोई समय निकालना चाहता है और न ही कोई इतनी मेहनत करनी चाहता है। फिर भी हर मानव चाहता है कि उसे तुरंत‚ बिना परिश्रम किए सबकुछ मिल जाए। जो कि असंभव है। इसीलिए मानव शोर्टकट ढूंढता है। चांद पर पहुंचना बहुत आसान है‚ पर मन तक पहुंचना बहुत मुश्किल है। चांद पर पहुंचने वाला बहुत कुछ खोकर भी कुछ नहीं पाता। लेकिन मन तक पहुंचने वाला बिना कुछ खोए‚ सबकुछ पा जाता है। सबकुछ जीत जाता है।

इसीलिए गुरू नानक देव ने कहा है: मन जित्तो जग जीत।

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